युवाओं को लुभाना, जातियों को साधना... नितिन नवीन की टीम के सामने 5 चैलेंज
अब नितिन नवीन ने लंबे समय बाद, कई दौर के मंथन के बाद अपनी नई टीम का ऐलान जरूर कर दिया है. लेकिन उनके सामने अभी भी पांच ऐसी चुनौतियां हैं जिससे पार पाना जरूरी है.
बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन ने अपनी नई टीम का ऐलान कर दिया है. इस नई टीम में युवाओं को तवज्जो दी गई है, जातीय समीकरण साधे गए हैं और चुनावों को भी ध्यान में रखा गया है. नितिन नवीन की इस टीम में कुल 13 राष्ट्रीय उपाध्यक्षों में से 6 महिलाओं को भी जगह दी गई है. स्मृति ईरानी और राम माधव जैसे पुराने नेताओं की भी वापस एंट्री हुई है.
अब नितिन नवीन ने लंबे समय बाद, कई दौर के मंथन के बाद अपनी नई टीम का ऐलान जरूर कर दिया है. लेकिन उनके सामने अभी भी पांच ऐसी चुनौतियां हैं जिससे पार पाना जरूरी है. यहां युवा वोटरों को लुभाने से लेकर आलाकमान और संगठन स्तर पर तालमेल बैठाने तक कई पहलू शामिल हैं-
चुनौती नंबर 1- युवा वोटरों को लुभाना
बीजेपी को केंद्र की सत्ता में रहते हुए 12 साल हो चुके हैं. इन 12 सालों में किसान आंदोलन से लेकर सीएए कानून के विरोध प्रदर्शन के रूप में कई मौकों पर सरकार ने नाराजगी का सामना किया है. लेकिन 12 सालों में यह पहली बार है जब देश की जेन जी आबादी, जब देश के युवा भी सड़क पर उतरे हैं. इस साल हुए नीट पेपर लीक मामले ने सरकार को कई मुश्किलों में फंसाया है.
कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर बड़ी भीड़ को एकजुट किया, कई युवा साथ आए और उसी वजह से धर्मेंद्र प्रधान को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा. नेरेटिव सेट किया गया कि देश की जेन जी आबादी के आगे सरकार को झुकना पड़ा. ऐसे में अब नितिन नवीन की नई टीम को इसी जेन जी वोटर, युवा वोटर को फिर अपने पाले में लाना है.
यहां समझने वाली बात यह है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में एनडीए को इंडिया गठबंधन की तुलना में 18 से 25 साल के उम्र के लोगों का ज्यादा वोट मिला था. सीडीएस लोकनीति सर्वे के मुताबिक 2024 के लोकसभा चुनाव में एनडीए को इस एज ग्रुप का 46 फीसदी वोट हासिल हुआ था, वहीं इंडिया गठबंधन को 33 फीसदी वोट मिले थे. अब इसी आबादी को अपने पाले में रखने के लिए नितिन नवीन की नई टीम को अपनी रणनीति को धार देनी पड़ेगी.
चुनौती नंबर 2: अगड़ों को मनाना, पिछड़ों को साथ रखना
भारतीय जनता पार्टी को एक समय अगड़ों की पार्टी माना जाता था, लेकिन समय के साथ उसने ओबीसी वोटबैंक का एक बड़ा हिस्सा भी अपने पाले में लाया है. लेकिन बिहार के बांकीपुर में हुए उपचुनाव ने उसकी इस रणनीति पर गंभीर सवाल उठाए हैं. नितिन नवीन के ही सबसे मजबूत गढ़ में प्रशांत किशोर ने बड़ी जीत दर्ज कर सभी को चौका दिया.
बिहरा में बीजेपी का सबसे मजबूत आधार ब्राह्मण, राजपूत, भूमिहार, कायस्थ जैसी ऊंची जातियों का वोट रहा है. कहने को राज्य में इनकी आबादी करीब 11 फीसदी है, लेकिन बिहार चुनाव में यह हमेशा निर्णायक साबित हुए हैं. एक ट्रेंड तो यहां तक बताता है कि 2009 के बाद से बिहार की 40 में से 17 सीटे ऐसी हैं जहां हमेशा एक ही जाति का उम्मीदवार जीत दर्ज करता है, यहां भी 8 सीटों पर ऊंची जातियों का वर्चस्व रहता है. लेकिन बांकीपुर उपचुनाव ने इसी परंपरा को तोड़ा है, कहा जा रहा है कि इस चुनावी हार का एक कारण यह है कि बीजेपी के ऊंची जातियों के वोटबैंक में कुछ सेंधमारी हुई है.
इसके ऊपर ओबीसी वर्ग से आए सम्राट चौधरी को बिहार का मुख्यमंत्री बनाना भी कई समीकरणों को बदल गया है. बीजेपी के ही अगड़े समाज के नेता और उनके समर्थक सवाल उठा रहे हैं कि आखिर ओबीसी नेतृत्व के मजबूत होने के बीच उनका राजनीतिक वजन कितना रह गया है? यही नितिन नवीन और उनकी टीम की नई चुनौती है- आखिर इन दो जातियों के बीच में सही तालमेल कैसे बैठाया जाए.
चुनौती नंबर 3: राम मंदिर चंदा चोरी का मुद्दा
हिंदुत्व की पिच पर हमेशा मजबूत बैटिंग करने वाली भारतीय जनता पार्टी के लिए राम मंदिर चंदा चोरी का मामला गले की फांस बन गया है. उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं, उससे ठीक पहले इस मुद्दे ने एक बड़ी हिंदू आबादी की आस्था को चोट पहुंचाई है. जिस तरह से समाजवादी पार्टी ने भी इस मुद्दे को उठाया है, फिर चाहे बात संसद के बाहर विरोध प्रदर्शन की हो या फिर सोशल मीडिया पर नेरेटिव सेट करने की, बीजेपी की चुनौतियां बढ़ी हैं.
ये भी पढ़ें- बीजेपी की 'नवीन' टीम से कितने पुराने चेहरे गायब?
सपा तो चाहती है कि वो अब बीजेपी के सबसे बड़े हथियार को उसी के खिलाफ इस्तेमाल करे. बीजेपी के लिए राम मंदिर सिर्फ आस्था का विषय नहीं है बल्कि इसके जरिए उसने अपनी हिंदुत्व की राजनीति को भी काफी मजबूत किया है. इसी वजह से चंदा चोरी मामले ने एक तरफ विपक्ष को नया मौका दिया है तो वहीं बीजेपी को कुछ हद तक बैकफुट पर लाया है. अब इस नेरेटिव को कैसे बदला जाए, एक बार फिर हिंदू वोटरों को साधा जाए, नितिन नवीन और उनकी टीम के लिए यह चुनौती का सबब रहेगा.
चुनौती नंबर 4: दक्षिण भारत में बीजेपी को मजबूत करना
दक्षिण भारत में बीजेपी को अभी भी अपना आधार मजबूत करना है. अगर कर्नाटक, तेलंगाना को छोड़ दिया जाए तो बीजेपी को अभी जूझना पड़ता है. तमाम प्रयासों के बाद भी केरल और तमिलनाडु में भी बीजेपी को वो सफलता नहीं मिल पाई है जिसकी उम्मीद वो लगाए बैठी है. तमिलनाडु में तो द्रविड आंदोलन, भाषा और सामाजिक न्याय की राजनीति ने बीजेपी की हिंदुत्व विचारधारा को वहां फलने-फूलने नहीं दिया है. इसके ऊपर अब विजय फैक्टर ने भी जमीन पर कई समीकरणों को बदला है. केरल में भी वामपंथ और कांग्रेस के प्रभुत्व के बीच बीजेपी कहीं फंस सी गई है, उसका वोट शेयर जरूर बढ़ा है, लेकिन वो सीटों में तब्दील नहीं हो पा रहा.
ऐसे में नितिन नवीन का फोकस दक्षिण पर भी रहने वाला है. पश्चिम बंगाल में तो जरूर पहली बार बीजेपी की सरकार बन चुकी है, लेकिन अब इस विस्तार को दक्षिण भारत लेकर जाना है. जानकार मानते हैं कि नितिन नवीन की नई टीम तत्कालिक चुनावी लाभ की बजाय दीर्घकालिक संगठन निर्माण पर ध्यान देने वाली है.
चुनौती नंबर 5: 2029 लोकसभा चुनाव की तैयारी
नितिन नवीन और उनकी टीम का सबसे बड़ा लक्ष्य 2029 का लोकसभा चुनाव रहने वाला है. कई राज्यों में होने वाले आगामी विधानसभा चुनावों की तैयारी तो करनी ही है, लेकिन बड़ा लक्ष्य 2029 का लोकसभा चुनाव है. पिछले लोकसभा चुनाव में जिस तरह से बीजेपी अपने दम पर बहुमत से दूर रह गई थी, उसे देखते हुए नितिन नवीन को और ठोस रणनीति पर काम करना होगा. फिर चाहे बात संगठन को मजबूत करना हो, पार्टी के सामाजिक और क्षेत्रीय आधार को बढ़ाना हो.
इसके अलावा किस तरह से उनकी टीम एनडीए सहयोगियों को साथ लेकर चलेगी, उनकी प्राथमिकताओं को ध्यान में रखेगी, इस पर भी काफी कुछ निर्भर रहने वाला है.
ये भी पढ़ें- भाजपा पर कैसे मजबूत हो रही RSS की पकड़
-
Opinion: भारत को बार बार इतने हल्के में क्यों ले रहा है अमेरिका, 'ब्रेकअप' आसान होगा या नहीं?
क्या अमेरिका में लोकल टैलेंट पूरी तरह से भारतीय टैलेंट की जगह ले सकता है? US भारत में ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर बनाने में सबसे आगे क्यों है.
-
12 दिन से भूख हड़ताल पर JNU छात्र; जेंडर न्यूट्रल वॉशरूम, ट्रांसजेंडर्स के लिए हॉस्टल सहित NTA से दूरी भी है डिमांड लिस्ट में
जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में छात्रों की अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल जारी है. 3 अक्टूबर से JNUSU प्रेसिडेंट अदिति मिश्रा सहित 17 स्टूडेंट्स 'साबरमती टी पॉइंट' पर कई मांगों के साथ प्रोटेस्ट कर रहे हैं.
-
रनवे भी नहीं, कामचलाऊ प्लेन... जब वायुसेना ने कश्मीर बचाने के लिए हथियारों से नहीं, जिगर से लड़ा था युद्ध
8 अक्टूबर 1932 को भारतीय वायुसेना का गठन हुआ था. आज 94 साल हो गए हैं. ऐसे में जानते हैं वायुसेना के उस ऑपरेशन के बारे में जिसने कश्मीर को बचाया.
-
40 साल पहले जिस जुनून को दुनिया ने कहा 'पागलपन', आज उसी पर फ्रांसिस हैल्जेन को मिला फिजिक्स का नोबेल
फिजिक्स का नोबेल 2026 प्रोफेसर फ्रांसिस हैल्जेन को ब्रह्मांडीय न्यूट्रिनो की खोज और आइसक्यूब न्यूट्रिनो ऑब्जरवेट्री की स्थापना में अहम योगदान के लिए मिला है. इस खोज ने ब्रह्मांड को समझने का नया रास्ता खोला है.
-
AMU में भी 'जंतर-मंतर', 17 दिन से भूख हड़ताल पर क्यों बैठे हैं यासिर, जबरन हटाने की कोशिश पर रात भर हंगामा
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में 21 सितंबर से छात्रों का प्रदर्शन 17वें दिन भी जारी है. उर्दू विभाग के यासिर फहद अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर हैं और 18 छात्रों पर FIR दर्ज हुई है.
-
जब पाकिस्तान में घुसा भारतीय खुफिया जेट, स्पीड ऐसी कि कुछ कर न सकी पाक वायुसेना- पायलट ने पहली बार सुनाई कहानी
भारतीय वायु सेना के मिग 25 की कहानी जिसने पाकिस्तान और चीन की सीमा में घुसकर वहां से तय की गई जगहों की तस्वीरें लेकर आया था. लेकिन पड़ोसी देश उसका बाल भी बांका नहीं कर पाए थे.
-
बिखरा मलबा, अधूरी टूटी बिल्डिंग, छात्र गायब और दुकानदारों का धंधा चौपट... हादसे के एक महीने बाद ऐसा है सत्य निकेतन - ग्राउंड रिपोर्ट
दिल्ली के सत्य निकेतन में पांच मंजिला PG इमारत गिरने से हुई 7 मौतों के एक महीने बाद भी मौके पर मलबा पड़ा है, आधी टूटी इमारत से खतरा बरकरार है और 50 फीसदी छात्र इलाका छोड़ चुके हैं.
-
KVS-NVS शिक्षक भर्ती: जाति प्रमाण पत्र पर लगी शर्तों से अधर में लटका सैकड़ों का भविष्य, अभ्यर्थियों ने सुनाई दर्द भरी दास्तां
नवोदय और केंद्रीय विद्यालयों के 15 हजार पदों की शिक्षक भर्ती में OBC-NCL सर्टिफिकेट के लिए जारी की गई शर्त से हजारों अभ्यर्थियों के सामने चुनौती खड़ी हो गई है.
-
अगर चुनाव फिक्स हैं तो कांग्रेस बहिष्कार क्यों नहीं करती? राहुल के 'ध्यान भटकाने' वाले जवाब में कितना लॉजिक
चुनाव बॉयकॉट की जबरदस्त मांग 'कॉकरोच जनता पार्टी' की तरफ से आई है. लेकिन क्या बॉयकॉट से कोई फायदा होता है? रिसर्च, उदाहरण और एक्सपर्ट्स का एनालिसिस हमें इस बारे में क्या बताते हैं, आइए जानते हैं.
-
हवा में टेरर, भारतीय पायलट बना फाइटर… समझिए Flydubai की फ्लाइट में क्या-क्या हुआ था?
Flydubai की फ्लाइट FZ1073 में एक को-पायलट ने भारतीय कैप्टन पर चाकू से हमला कर दिया. वह प्लेन को अपने कब्जे में लेना चाहता था, ताकि उसे क्रैश कर सके.