वंदे मातरम् पर क्यों आमने-सामने हैं बीजेपी और कांग्रेस, कितना पुराना है राष्ट्रीय गीत पर विवाद
कांग्रेस मुख्यालय में 15 अगस्त को वंदे मातरम् गाने का वीडियो वायरल होने के बाद राष्ट्रीय गीत पर एक बार फिर विवाद हो गया है. इसके गायन को लेकर कब कैसी हुई सियासत बता रहे हैं राहुल श्रीवास्तव.
अंग्रेजों के शासनकाल में जिस गीत ने भारत को एकजुट करने में बड़ी भूमिका निभाई, वही गीत आज आजाद भारत में राजनीतिक विवाद का कारण बन गया है. केंद्र सरकार ने इसकी गरिमा बनाए रखने के लिए एक कानून भी बनाया है. मातृभूमि की प्रशंसा में लिखे गए इस गीत को अब फिर राजनीति के दलदल में खींचा जा रहा है. करीब 90 साल बाद भी 'वंदे मातरम्' सम्मान और विवाद के बीच खड़ा है.
वंदे मातरम् को लेकर विवाद पिछले साल संसद के शीतकालीन सत्र से ही चल रहा था. गीत की 150वीं वर्षगांठ के मौके पर यह विवाद और तेज हो गया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने कांग्रेस पर वोट बैंक की राजनीति के दबाव में आने और वंदे मातरम् के कुछ हिस्सों को हटाने का आरोप लगाया.
हाल ही में खत्म हुए संसद के मानसून सत्र में राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण (संशोधन) विधेयक, 2026 को पारित किया गया. सरकार ने पहली बार वंदे मातरम् के पूरे गीत को गाने के आधिकारिक नियम जारी किए. गीत में बाधा डालने या उसका अपमान करने पर सजा का प्रावधान है.
कांग्रेस क्यों असहज हुई
कांग्रेस इस विधेयक को पारित होने से रोक नहीं सकी. लेकिन उसने संसद के बाहर भी इसके खिलाफ कोई बड़ा विरोध नहीं किया. इसके बाद 15 अगस्त को कांग्रेस मुख्यालय का करीब साढ़े चार मिनट का एक वीडियो सामने आया. इस वीडियो ने वंदे मातरम् को लेकर कांग्रेस की असहजता, विरोध और आगे की रणनीति को साफ कर दिया. कांग्रेस इसे थोपी गई श्रद्धा बता रही है.
कानून ने इस विवाद को जन्म दिया और कांग्रेस की प्रतिक्रिया ने इसे राजनीतिक मौके में बदल दिया. कांग्रेस मुख्यालय में राष्ट्रीय ध्वज फहराने के कार्यक्रम के दौरान वंदे मातरम् बजाया जा रहा था. शुरुआती दो अंतरों के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और सोनिया गांधी दोनों को गीत के साथ गाते हुए देखा गया. कैमरे चल रहे थे. सभी को इसकी जानकारी थी. लेकिन जैसे ही तीसरा अंतरा शुरू हुआ तो न खरगे और न ही राहुल गांधी ने गाना जारी रखा. सबसे पहले सोनिया गांधी असहज नजर आईं. उन्होंने खरगे की ओर देखा और हाथ के इशारों से कुछ आपत्ति जताती हुई दिखाई दीं. राहुल गांधी ने भी उनकी असहजता को देखा. इसके बाद कांग्रेस के इन तीनों बड़े नेताओं के बीच कुछ देर बातचीत हुई.

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कांग्रेस ने सफाई दी कि सोनिया गांधी केवल 80 साल से अधिक उम्र के पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के लिए कुर्सी मांग रही थीं. लेकिन उस दिन एक ऐतिहासिक घटना भी हुई. साल 1937 के बाद पहली बार किसी कांग्रेस कार्यक्रम में वंदे मातरम् का पूरा संस्करण बजाया गया. इसके बाद मामला और साफ हो गया. बुधवार को 'खरगे के लिए कुर्सी'वाली सफाई कमजोर पड़ गई. कांग्रेस कार्यसमिति यानी सीडब्ल्यूसी ने फैसला किया कि भविष्य में कांग्रेस के कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के केवल दो अंतरे ही गाए या बजाए जाएंगे.
क्या कांग्रेस कानून को चुनौती देगी
इस तरह कांग्रेस ने देश में लागू कानून को चुनौती देने का संकेत दिया. अभिषेक मनु सिंघवी जैसे कांग्रेसी नेताओं की कानूनी राय में भी कानून और सार्वजनिक तथा निजी कार्यक्रमों के बीच अंतर की बात कही गई थी. लेकिन राजनीति में बहुत कुछ सीधे कहने के बजाय संकेतों को समझने पर भी निर्भर करता है.
बीजेपी कई दशकों से कांग्रेस को वंदे मातरम् के मुद्दे पर घेरती रही है. कांग्रेस की प्रतिक्रिया से उसे लगा कि उसका राजनीतिक संदेश काम कर गया है. इस बार बीजेपी को बड़ा राजनीतिक फायदा इसलिए भी मिला क्योंकि पूरे वंदे मातरम् की गरिमा की रक्षा करने वाला कानून लागू हो चुका है. इस मुद्दे पर सोनिया गांधी कैमरे में दिखाई दीं और कांग्रेस की सीडब्ल्यूसी ने केवल दो अंतरे गाने का आधिकारिक फैसला कर दिया.
गृह मंत्री अमित शाह ने गुरुवार को कांग्रेस पर तुष्टीकरण की नीति को आगे बढ़ाने का आरोप लगाया. शाह ने कहा कि कांग्रेस का यह फैसला एक ऐतिहासिक गलती को दोहराना है, जिसने भारत के विभाजन में भूमिका निभाई थी. अब बीजेपी का तर्क यह है कि कांग्रेस बदली नहीं है. बीजेपी के मुताबिक कांग्रेस ने 89 साल पहले मुस्लिम वोटों के लिए वंदे मातरम् के कुछ हिस्से हटाए थे और आज भी वही कर रही है. इस तरह इतिहास से जुड़ा पुराना विवाद आज की राजनीति में फिर लौट आया है.
मुस्लिम वोट की राजनीति
वंदे मातरम् अब कांग्रेस और बीजेपी दोनों के लिए एक ऐसा मुद्दा बन गया है, जो समाज में ध्रुवीकरण पैदा कर सकता है.
कुछ कांग्रेस नेताओं का कहना है कि इस मामले को अधिक समझदारी और संतुलन के साथ संभालने की जरूरत थी. उनका कहना है कि कांग्रेस शासित तीन राज्यों हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक और तेलंगाना में वंदे मातरम् पूरा गाया गया है. लेकिन कांग्रेस की रणनीति 15 अगस्त को अचानक नहीं बनी थी.
15 अगस्त से काफी पहले केरल सरकार ने फैसला किया था कि मुख्यमंत्री वीडी सतीशन के नेतृत्व वाले आधिकारिक स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम में वंदे मातरम् नहीं बजाया जाएगा. केरल में कांग्रेस की सरकार है. प्रियंका गांधी वाड्रा वायनाड से सांसद हैं. राहुल गांधी के करीबी और महासचिव (संगठन) केसी वेणुगोपाल भी केरल से हैं. इसलिए सवाल उठता है कि क्या केरल सरकार ने केंद्रीय गृह मंत्रालय के निर्देश को जानबूझकर नजरअंदाज किया था? या फिर यह फैसला कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व की जानकारी के बिना लिया गया था? एक सवाल यह भी है कि क्या खरगे के लिए 'कुर्सी मांगने' वाला 15 अगस्त का क्षण पहले से तैयार राजनीतिक रणनीति का हिस्सा था?
1937 का कांग्रेस कार्यसमिति का प्रस्ताव क्या कहता है
बीजेपी और कांग्रेस के बीच हिंदू-मुस्लिम विभाजन को लेकर जो राजनीतिक लड़ाई दिखाई दे रही है, उसकी जड़ें वंदे मातरम् के जटिल इतिहास में हैं. विडंबना यह है कि करीब 130 साल पहले इसी कांग्रेस ने वंदे मातरम् को अपनाया और उसका प्रचार किया था. साल 1896 में रवींद्रनाथ टैगोर ने इसकी धुन तैयार की और कांग्रेस के एक अधिवेशन में इसे गाया. 1905 में लॉर्ड कर्जन द्वारा बंगाल का विभाजन किए जाने के बाद वंदे मातरम् बंगाल के स्वदेशी आंदोलन का प्रमुख नारा बन गया.आम भारतीय भी इसे गाने लगे. इसलिए सात सितंबर 1905 को वाराणसी में कांग्रेस ने अपने अखिल भारतीय कार्यक्रमों के लिए वंदे मातरम् को औपचारिक रूप से अपना लिया.

दिसंबर 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति ने वंदे मातरम् के पहले दो अंतरों को गाने का प्रस्ताव पारित किया था.
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1906 में बारीसाल में एक ऐतिहासिक मौके पर 10 हजार से ज्यादा हिंदू और मुसलमान वंदे मातरम् का नारा लगाते हुए एक साथ मार्च कर रहे थे. लाला लाजपत राय ने लाहौर से 'वंदे मातरम्' नाम का उर्दू साप्ताहिक शुरू किया था. बिपिन चंद्र पाल ने भी 1905 में 'वंदे मातरम्' नाम से एक अखबार शुरू किया था. मैडम भीकाजी कामा ने लंदन में वंदे मातरम् लिखा हुआ झंडा फहराया था. लेकिन 1908 के आसपास कुछ मुस्लिम नेताओं ने वंदे मातरम् का विरोध शुरू कर दिया. निशाने पर कांग्रेस थी. 30 दिसंबर 1908 को अमृतसर में मुस्लिम लीग के दूसरे अखिल भारतीय अधिवेशन में सैयद अली इमाम ने कहा कि भारत में राष्ट्रवाद की आड़ में हिंदू राष्ट्रवाद को बढ़ावा दिया जा रहा है. वंदे मातरम् को एक सांप्रदायिक नारा बताया गया. इसके बावजूद 1915 में मद्रास में एक बैठक की शुरुआत वंदे मातरम् के पूरे गायन से हुई. इस बैठक में महात्मा गांधी भी मौजूद थे.
लखनऊ में मुस्लिम लीग के 25वें अधिवेशन में, जिसमें मोहम्मद अली जिन्ना भी मौजूद थे, एक प्रस्ताव पारित किया गया. इसमें वंदे मातरम् को पूरी तरह इस्लाम विरोधी और मूर्तिपूजा से प्रेरित बताया गया. 17 अक्टूबर 1937 को बंगाल के मुख्यमंत्री के फजलुल हक ने कहा था कि कांग्रेस भारत में हिंदू राज स्थापित करने की कोशिश कर रही है. वंदे मातरम् को लेकर हिंदुत्व से जुड़ा आरोप बढ़ने लगा. इससे कांग्रेस को डर था कि मुस्लिम वोट मुस्लिम लीग की ओर जा सकते हैं. इसलिए कांग्रेस ने अपनी रणनीति पर दोबारा विचार किया. 20 अक्टूबर 1937 को जवाहरलाल नेहरू ने इलाहाबाद से सुभाष चंद्र बोस को लिखे पत्र में 'मुस्लिम फैक्टर' यानी मुस्लिम पक्ष का जिक्र किया. नेहरू ने लिखा कि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास 'आनंद मठ' को पढ़ने के बाद उन्हें गीत की पृष्ठभूमि समझ में आई. उन्होंने माना कि यह गीत मुसलमानों को परेशान कर सकता है. उन्होंने यह भी कहा कि वंदे मातरम् के खिलाफ चल रहा विरोध काफी हद तक सांप्रदायिक ताकतों द्वारा खड़ा किया गया है, लेकिन इसमें कुछ वास्तविक भावनाएं भी मौजूद हैं.
उसी महीने के अंत में नेहरू ने कलकत्ता में रवींद्रनाथ टैगोर से मुलाकात की. इसके बाद दिसंबर 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति ने बहुत सोच-समझकर एक प्रस्ताव पारित किया. गांधी ने भी माना कि इस विषय पर उनकी समझ पूरी नहीं थी और उन्होंने अपना रुख बदला. कांग्रेस कार्यसमिति के प्रस्ताव में वंदे मातरम् के राष्ट्रीय स्तर पर इस्तेमाल को पहले दो अंतरों तक सीमित कर दिया गया. इसका उद्देश्य गीत से जुड़ी भावनाओं और अलग-अलग समुदायों की संवेदनशीलता के बीच संतुलन बनाना था.
संविधान सभा में वंदे मातरम् पर फैसला
इसके ठीक 10 साल बाद वंदे मातरम् का मुद्दा संविधान सभा में भी आया. 31 जुलाई 1947 को स्वतंत्रता सेनानी बने आईसीएस अधिकारी एचवी कामथ ने संविधान सभा के आधिकारिक एजेंडे में वंदे मातरम् को शामिल करने की मांग की. 14 अगस्त 1947 की रात, जब सत्ता हस्तांतरण का समारोह हुआ, तब सुचेता कृपलानी ने वंदे मातरम् का पहला अंतरा गाकर कार्यक्रम की शुरुआत की. दिलचस्प बात यह है कि 1948 की एक कैबिनेट नोट में नेहरू ने वंदे मातरम् के बारे में लिखा था कि अपनी सुंदरता और ऐतिहासिक महत्व के बावजूद इसे ऑर्केस्ट्रा या बैंड के जरिए बजाना आसान नहीं है. उनके अनुसार इसकी धुन कुछ उदास और बार-बार दोहराई जाने वाली है.
संविधान सभा के सदस्य सेठ गोविंद दास, विश्वनाथ दास और सतीश चंद्र जैसे नेताओं ने वंदे मातरम् को राष्ट्रगान बनाने का समर्थन किया. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे बंगाली नेताओं ने वंदे मातरम् को लेकर विशेष गर्व का प्रदर्शन किया. वकील और स्वतंत्रता सेनानी रोहिणी कुमार चौधरी ने कहा कि भारत का स्वतंत्रता आंदोलन देवी की प्रार्थना के साथ शुरू हुआ था.
आखिरकार जनवरी 1950 में संविधान लागू होने से दो दिन पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने वंदे मातरम् को राष्ट्रगान के बराबर दर्जा दिया. हालांकि इसके आधिकारिक इस्तेमाल को 1937 के कांग्रेस कार्यसमिति के फैसले के आधार पर पहले दो अंतरों तक सीमित रखा गया.
एक विवाद जो कभी खत्म नहीं हुआ
वंदे मातरम् को लेकर विवाद खत्म नहीं हुआ. हिंदू पहचान की राजनीति के बढ़ने और बीजेपी के उभरने के साथ यह मुद्दा फिर तेज हो गया. उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में नगर निगमों और स्कूलों में वंदे मातरम् गाना अनिवार्य किया गया. राजनीतिक नारे भी सामने आए जैसे'हिंदुस्तान में रहना होगा, वंदे मातरम् कहना होगा' राजनीतिक तनाव और सांप्रदायिक विवादों के दौरान वंदे मातरम् एक उकसाने वाले राजनीतिक नारे की तरह इस्तेमाल होने लगा, ठीक वैसे ही जैसे 'अल्लाह-ओ-अकबर' का इस्तेमाल राजनीतिक और धार्मिक नारों के रूप में होता रहा है.
स्थिति धीरे-धीरे और तनावपूर्ण होती गई और समाज में ध्रुवीकरण बढ़ने लगा. 1998 से 2004 के बीच केंद्र में बीजेपी की सरकार को लेकर मुस्लिम धार्मिक नेताओं में चिंता बढ़ी. 2006 में राष्ट्रीय गीत की 100वीं वर्षगांठ मनाने की तैयारी के दौरान इस्लामी शिक्षण संस्थान दारुल उलूम के फतवा विभाग ने वंदे मातरम् गाने को इस्लाम विरोधी बताया. 30 नवंबर 2009 को देवबंद में जमीयत उलेमा-ए-हिंद के 30वें आम अधिवेशन में एक प्रस्ताव पारित कर मुसलमानों से राष्ट्रीय गीत न गाने की अपील की गई.
फतवा और यह प्रस्ताव इस्लाम मानने वाले आम लोगों से ज्यादा उन राजनीतिक दलों के लिए महत्वपूर्ण बन गए, जो मुस्लिम वोट हासिल करना चाहते थे. साल 2013 में बहुजन समाज पार्टी के सांसद शफीकुर्रहमान ने लोकसभा में वंदे मातरम् बजाए जाने के दौरान सदन से बाहर चले गए थे.

वंदे मातरम् के गायन को लेकर कांग्रेस के खिलाफ वाराणसी में प्रदर्शन करते भाजयुमो के कार्यकर्ता.
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वंदे मातरम् पर राजनीतिक विवाद
कांग्रेस के पास अपने 1937 के फैसले पर कायम रहने के कई स्पष्ट राजनीतिक कारण हैं. पूरे भारत में कांग्रेस के कमजोर होने का एक कारण मुस्लिम मतदाताओं के बीच उसका घटता समर्थन भी माना जाता है. आने वाले समय में पार्टी कई महत्वपूर्ण विधानसभा चुनावों का सामना करेगी, खासकर उत्तर प्रदेश में, जहां वह अल्पसंख्यक वोटों के लिए समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी से मुकाबला करती है. अगर मुस्लिम समुदाय के बीच कांग्रेस का समर्थन बढ़ता है तो गठबंधन की राजनीति में पार्टी अधिक सीटों की मांग कर सकती है. साल 2027 से 2029 के बीच गुजरात, मध्य प्रदेश, राजस्थान और कर्नाटक में कांग्रेस और बीजेपी के बीच सीधा मुकाबले होने की संभावना है. इन सभी राज्यों में मुस्लिम वोट चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं. अगर कांग्रेस और उसके सहयोगी वंदे मातरम् के मुद्दे पर अल्पसंख्यक वोटों को एकजुट करने की कोशिश करते हैं, तो बीजेपी को कांग्रेस पर 'तुष्टीकरण' का आरोप लगाने का और मौका मिल सकता है.
वंदे मातरम् के इतिहास से यह समझा जा सकता है कि समय-समय पर इस गीत का समर्थन और विरोध दोनों ही सांप्रदायिक और राजनीतिक हितों से प्रभावित रहे हैं. अब बड़ा सवाल यह है कि भारत अपनी विविधता को कैसे स्वीकार करें और यह कैसे सुनिश्चित करें कि हर नागरिक खुद को देश का हिस्सा और प्रतिनिधित्व पाने वाला महसूस करे? क्या नागरिकों को राजनीतिक खेमों में बांटने के बजाय ऐसे मुद्दों पर आपसी समझ और समझौता किया जा सकता है? इसका समाधान निकालना जरूरी है, क्योंकि 1900 के दशक से लेकर आज तक हर पीढ़ी को वंदे मातरम् जैसे देश को जोड़ने वाले गीत को लेकर पुराने विवादों का सामना करना पड़ रहा है.
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