स्कूलों को मुद्दा बना रही कॉकरोच जनता पार्टी, आंकड़ों में देश की शिक्षा का पूरा हाल
अब जब सरकारी स्कूलों की इतनी चर्चा हो रही है, यह जानना जरूरी हो जाता है कि असल में देश में शिक्षा का हाल क्या है. आंकड़ों के जरिए इस तस्वीर को बेहतर तरीके से समझा जा सकता है
कॉकरोज जनता पार्टी ने 16 अगस्त से देशभर में 'स्कूल ठीक करो' मुहिम शुरू की हुई है. इसके तहत सरकारी स्कूलों में बेहतर सुविधा देने और सरकार की जवाबदेही तय करने पर जोर दिया जा रहा है. यूपी से लेकर राजस्थान के स्कूलों का दौरा किया गया है. अब जब सरकारी स्कूलों की इतनी चर्चा हो रही है, यह जानना जरूरी हो जाता है कि असल में देश में शिक्षा का हाल क्या है. आंकड़ों के जरिए इस तस्वीर को बेहतर तरीके से समझा जा सकता है-
भारत में कितने स्कूल हैं?
शिक्षा मंत्रालय के यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इनफॉर्मेशन सिस्टम के के मुताबिक वर्तमान में भारत में कुल स्कूलों की संख्या 14.67 लाख है. यहां भी शहर में 2.64 लाख और ग्रामीण में 12.03 लाख स्कूल हैं. सरकारी स्कूलों की संख्या 10.05 लाख है. अगर कुल छात्रों की बात करें तो यह आंकड़ा 24.72 करोड़ बैठता है, वहीं इसके अनुपात में शिक्षकों की संख्या 1.02 करोड़ है. दूसरे शब्दों में कहें तो भारत में हर 100 स्कूलों में करीब 69 सरकारी स्कूल हैं.

कितना बच्चे करते हैं स्कूल पूरा (रिटेंशन रेट)
रिटेंशन रेट का मतलब होता है कि कितने छात्र अपनी स्कूली शिक्षा पूरी करते हैं. UDISE+ 2025-26 की रिपोर्ट एक चिंताजनक ट्रेंड पेश करती है. छोटी कक्षाओं में तो 98.5 फीसदी बच्चे स्कूल में टिके रहते हैं, वहीं तीसरी से चौथी कक्षा आते-आतें आंकड़ा 91.1 फीसदी पहुंच जाता है. वहीं फिर छठी से आठवीं कक्षा तक स्थिति 83.7 फीसदी पहुंच जाती है और 9वीं से 12वीं तक तो गिरकर 51.9 फीसदी.
इसका सीधा मतलब है कि उन छात्रों की संख्या कम है जो अपनी पूरी स्कूली शिक्षा कर रहे हों. शुरुआत जरूर मजबूत रहती है, लेकिन जैसे-जैसे स्कूली शिक्षा आगे बढ़ती है, छात्रों की संख्या कम होती चली जाती है. इसी रिपोर्ट का एक आंकड़ा बताता है कि कक्षा पांच से छठी तक 91.5 फीसदी छात्र आगे बढ़ते हैं, वहीं 93 फीसदी छात्राएं रहती हैं. इसी तरह कक्षा आठवीं से नौवीं तक 85.9 फीसदी छात्र पहुंचते हैं और छात्राओं की संख्या 87.3 फीसदी रहती है. कक्षा 10वीं से 11वीं तक की स्थिति देखें तो 72.4 फीसदी छात्र पहुंचते हैं, वहीं छात्राओं में यह संख्या 75.11 फीसदी रहती है.
ड्रॉपआउट रेट की क्या स्थिति है?
ड्रॉपआउट रेट का मतलब होता है कितने बच्चों ने पूरी तरह से किसी कक्षा के बाद या कक्षा के दौरान ही स्कूल छोड़ दिया हो. यहां भी स्थिति काफी हद तक रिटेंशन रेट जैसी ही दिखाई देती है. छोटी स्कूलों में ड्रॉप आउट कम देखने को मिल रहा है, लेकिन जैसे ही कक्षा बड़ी होती है, ड्रॉप आउट रेट भी ज्यादा देखने को मिलता है.
UDISE+ की ही ताजा रिपोर्ट बताती है कि कक्षा 1 से 5 तक 100 में से सिर्फ 0.3 बच्चे स्कूल छोड़ते हैं. कक्षा 6 से 8 तक यह संख्या बढ़कर 3.5 हो जाती है और फिर कक्षा 9-10 तक तो हर 100 में से 12 बच्चे स्कूल छोड़ते हैं.

स्कूल पहुंच रहे बच्चे, पढ़ कितने पा रहे?
देश में बात चाहे सरकारी स्कूल की हो या फिर निजी स्कूल ही, शिक्षा की गुणवक्ता एक चिंता का पहलू रहती है. कितने बच्चे स्कूल आ रहे हैं, यह जरूरी है, लेकिन कितने सही तरीके से पढ़ पा रहे हैं, यह समझना भी जरूरी है. इसी सवाल का जवाब The Annual Status of Education Report (ASER) 2024 में मिलता है. इसकी ताजा रिपोर्ट हमें सरकारी और निजी दोनों स्कूलों की स्थिति स्पष्ट बताती है.
इस रिपोर्ट में एक सर्वे किया गया, कक्षा तीन, कक्षा पांच और कक्षा आठ के छात्रों को दूसरी कक्षा का एक पाढ़ पढ़ने के लिए दिया गया. अब यहां चौंकाने वाली स्थिति सामने आई. कक्षा तीन के सरकारी स्कूल के 23.4 फीसदी बच्चे ही दूसरी कक्षा का पाठ पढ़ पाए. निजी स्कूलों में यह संख्या 35.5 फीसदी रही. इसी तरह कक्षा पांच के 44.8 फीसदी बच्चे कक्षा दो का पाठ पढ़ पाए, वहीं निजी स्कूलों में यह आंकड़ा 59.3 फीसदी रहा. कक्षा आठवीं की बात करें तो यहां सरकारी स्कूलों में 67.5 फीसदी बच्चे दूसरी कक्षा का पाठ पढ़ पाए, वहीं निजी स्कूलों में यह संख्या 80 प्रतिशत रही.
अगर 2014 से 2024 की स्थिति का विश्लेषण किया जाए तब भी एक चिंताजनक ट्रेंड समझ में आता है. उदाहरण के लिए कक्षा 8 के छात्र 2014 में सरकारी स्कूलों में 71.5 फीसदी दूसरी कक्षा का पाठ पढ़ पा रहे थे, वहीं 2024 में यह आंकड़ा 67.5 फीसदी रह गया, यानी कि यहां गिरावट देखने को मिली. इसी तरह प्राइवेट स्कूलों में भी 2014 में आठवीं कक्षा के 82.4 फीसदी बच्चे दूसरी कक्षा का पाठ पढ़ पा रहे थे, लेकिन 10 साल बाद संख्या गिरकर 80 फीसदी हो गई.
बुनियादी सुविधाओं को लेकर क्या स्थिति?
ASER की रिपोर्ट में बुनियादी स्कूली सुविधाओं को लेकर भी जानकारी मिलती है. उदाहरण के लिए बालिकाओं के लिये उपयोग योग्य शौचालयों की संख्या वर्ष 2018 में 66.4% फीसदी थी जो 2024 आते-आते 72% दर्ज की गई. इसी तरह स्कूलों में पेयजल की स्थिति में भी सुधार देखने को मिला है. 2018 में जो संख्या 74.8 फीसदी थी वो 2024 में 77.7 फीसदी हो गई.
नीति आयोग की अपनी ताजा रिपोर्ट भी बुनियादी सुविधाओं को लेकर कई बातें बताती है. देश में अभी भी 1.19 लाख स्कूल ऐसे हैं जहां बिजली नहीं पहुंच पाई है. इसी तरह 98592 ऐसे स्कूल मौजूद हैं जहां लड़कियों के लिए इस्तेमाल करने लायक टॉयलेट मौजूद नहीं है. इसी तरह 14,505 स्कूलों में आज भी पानी की सुविधा नहीं है और 59,829 स्कूलों में हाथ धोने की सुविधा नहीं है.
नीति आयोग के मुताबिक वर्तमान में देश में 1,04125 स्कूल ऐसे हैं जहां सिर्फ एक ही शिक्षक पढ़ाता है. यहां भी 89 फीसदी ऐसे स्कूल तो ग्रामीण क्षेत्रों में है. यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इंफॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन (UDISE+ 2025-26) की रिपोर्ट भी इसी दिशा में कुछ अहम जानकारी देती है. वर्तमान में देश में कई ऐसे स्कूल मौजूद हैं जहां टीचर तो है, लेकिन पढ़ने वाला एक भी छात्र नहीं. वर्तमान में देश में जीरो एनरोलमेंट वाले 5663 स्कूल हैं. यहां भी सबसे खराब हाल पश्चिम बंगाल का है जहां 2,200 ऐसे स्कूल मौजूद हैं. दूसरे पायदान पर तेलंगाना आता है जहां 1400 ऐसे स्कूल हैं, इसके बाद मध्य प्रदेश आता है जहां 380, फिर यूपी में 65 ऐसे स्कूल उपस्थित हैं. रिपोर्ट के मुताबिक यह स्थिति अभी भी चिंताजनक जरूर है, लेकिन धीरे-धीरे सुधार भी हो रहा है. 2022-23 में जहां ये संख्या 10,294 थी वहीं, 2025-26 में घटकर 5,663 दर्ज की गई है.

शिक्षकों के कितने पद खाली?
UDISE के मुताबिक प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्कूलों में आज भी 7.5 लाख पद खाली पड़े हैं. वहीं बात जब माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर की आती है तो यहां भी विषय विशेषज्ञ शिक्षकों की कमी है, संख्या 4.09 लाख से भी ज्यादा है. इसी तरह केंद्रीय विद्यालयों (KVs) में शिक्षण स्टाफ के लगभग 13.1% पद और नवोदय विद्यालयों (NVs) में 24.8% पद खाली चल रहे हैं.
शिक्षकों की सैलरी पर कितना खर्च?
UDISE की रिपोर्ट के अनुसार 2024-25 की तुलना में 2025-26 में शिक्षकों की सैलरी पर 25.13 फीसदी कम खर्च किया गया है. 2024-25 में जो आंकड़ा 8.133.91 करोड़ रुपए ती, 2025-26 में वो घटकर 13,576.20 करोड़ रुपए हो चुका है.
स्कूली इंफ्रास्ट्रक्चर पर कितना खर्च?
अब शिक्षकों की सैलरी में जरूर कटौती हुई है, लेकिन इंफ्रास्ट्रक्चर पर पैसे बढ़ा दिए गए हैं. रिपोर्ट के मुताबिक इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च 2024-25 में 2,645.98 करोड़ रुपए से बढ़कर 2025-26 में 4,629.52 करोड़ रुपए पहुंच चुका है. यह सीधे-सीधे 74.96% की बड़ी बढ़ोतरी है.

मोदी सरकार में शिक्षा बजट
शिक्षा के क्षेत्र कई जगह सकारात्मक परिवर्तन देखने को मिले हैं, लेकिन बात अगर शिक्षा बजट की आए तो यहां पर पिछले 12 सालों का ट्रेंड एक अलग कहानी बयां करता है. 2013-14 में कुल बजट में शिक्षा की हिस्सेदारी 4.6 फीसदी दर्ज की गई थी, यह संख्या 2025-26 में घटकर 2.5 फीसदी हो चुकी है. इसका मतलब है कि पिछले 12 सालों में 46 फीसदी की कमी आ चुकी है.
अगर शिक्षा बजट को ही और ज्यादा विस्तृत तरीके से समझें तो पता चलता है कि स्कूल शिक्षा विभाग का बजट 2013-14 की तुलना में अब आधे से भी कम रह चुका है. उच्च शिक्षा विभाग की बात करें तो यहां भी हिस्सेदारी 40 फीसदी तक कम हुई है.
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