कश्मीर मामले में कोई तीसरा दखल क्यों नहीं दे सकता है? शिमला एग्रीमेंट की शर्तों में छिपा है सारा राज

पिछले पांच दशक से भारत इसी शिमला समझौते के जरिए किसी तीसरे पक्ष को कश्मीर मुद्दे पर दखल देने से रोकता रहा है.

कश्मीर मामले में कोई तीसरा दखल क्यों नहीं दे सकता है? शिमला एग्रीमेंट की शर्तों में छिपा है सारा राज
हिमाचल प्रदेश के शिमला में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति ज़ुल्फिकार अली भुट्टो ने शिमला समझौते पर हस्ताक्षर किया था.

कश्मीर पर भारत और पाकिस्तान के बीच जब भी संयुक्त राष्ट्र या किसी तीसरे देश की मध्यस्थता की बात उठती है, भारत एक ही दस्तावेज का हवाला देता है. ये दस्तावेज शिमला समझौता है. 2 जुलाई 1972 को हिमाचल प्रदेश के शिमला में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति ज़ुल्फिकार अली भुट्टो ने जिस समझौते पर दस्तखत किए थे, वही आज भी दोनों देशों के रिश्तों और कश्मीर विवाद की बुनियाद माने जाने वाले सबसे अहम दस्तावेज़ों में शामिल है. 

दिलचस्प बात ये है कि साल 2025 में पाकिस्तान के कुछ बयानों ने इस समझौते को फिर से सुर्खियों में ला दिया है, लेकिन भारत अब भी इसे पूरी तरह से प्रभावी मानता है. 

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1971 की जंग के बाद हुआ था शिमला समझौता

शिमला समझौता ऐसे वक्त हुआ, जब 1971 की जंग में पाकिस्तान को बड़ी शिकस्त मिली थी. पूर्वी पाकिस्तान अलग होकर बांग्लादेश बन चुका था और भारत के पास करीब 93,000 पाकिस्तानी सैनिक और नागरिक युद्धबंदी थे.

इसके बावजूद भारत ने जंग में जीतने वाले की तरह कठोर शर्तें नहीं थोपीं. लड़ाई के दौरान कब्जे में आए पाकिस्तान के 13,000 वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र को भारत ने वापस कर दिया. सिर्फ कुछ ऐसे इलाके अपने पास रखे, जिन्हें उसने रणनीतिक नजरिए से अहम माना. उस समय ज़ुल्फिकार अली भुट्टो पाकिस्तान के राष्ट्रपति थे. 1973 का नया संविधान लागू होने के बाद वह प्रधानमंत्री बने.

समझौते की सबसे अहम शर्त क्या थी?

शिमला समझौते की सबसे अहम बात यह थी कि भारत और पाकिस्तान ने अपने सभी विवाद आपसी बातचीत के ज़रिए सुलझाने पर सहमति जताई. इसमें कश्मीर का मुद्दा भी शामिल था.

समझौते में कहा गया कि दोनों देश अपने मतभेदों का समाधान शांतिपूर्ण तरीके से करेंगे, द्विपक्षीय बातचीत के माध्यम से या फिर ऐसे किसी अन्य शांतिपूर्ण तरीके से विवादों को सुलाझाया जा सके, जिस पर दोनों की आपसी रजामंदी हो.

कागज पर यह प्रावधान कुछ गुंजाइश छोड़ता है, लेकिन व्यवहार में भारत पिछले पांच दशकों से इसी शर्त का हवाला देकर किसी भी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता को खारिज करता आया है.

1949 की युद्धविराम रेखा की जगह आई LoC

समझौते में 1971 की जंग के बाद बनी नई ज़मीनी स्थिति को भी स्वीकार किया गया. दोनों देशों ने 17 दिसंबर 1971 की युद्धविराम स्थिति के आधार पर बनी लाइन ऑफ कंट्रोल (LoC) का सम्मान करने पर सहमति दी. इसके साथ ही यह भी तय हुआ कि कोई भी पक्ष बल प्रयोग करके इस रेखा को बदलने की कोशिश नहीं करेगा.

इस तरह 1949 के कराची समझौते के तहत बनी पुरानी सीजफायर लाइन की जगह LoC ने ले ली. हालांकि दोनों देशों ने अपने-अपने दावों से पीछे हटने की बात नहीं मानी.

भारत क्यों कहता है कि कश्मीर पर UN की भूमिका खत्म हो गई?

भारत का रुख शुरू से साफ रहा है कि शिमला समझौते के बाद कश्मीर विवाद का समाधान सिर्फ भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत से ही होगा. इसी आधार पर भारत का विदेश मंत्रालय 1972 से लगातार यह कहता रहा है कि संयुक्त राष्ट्र की 1948 और 1949 की प्रक्रिया अब व्यावहारिक रूप से पीछे छूट चुकी है. यही वजह है कि जब भी संयुक्त राष्ट्र या कोई अन्य देश कश्मीर पर मध्यस्थता की पेशकश करता है, नई दिल्ली शिमला समझौते का हवाला देती है.

UNMOGIP पर आज भी दोनों देशों की अलग-अलग राय

एक मसला ऐसा भी है, जिस पर शिमला समझौता पूरी तरह स्पष्ट समाधान नहीं दे सका. संयुक्त राष्ट्र का UN Military Observer Group in India and Pakistan (UNMOGIP) 1949 से युद्धविराम रेखा की निगरानी करता रहा है.

भारत का मानना है कि पुरानी सीजफायर लाइन खत्म होकर LoC बनने के बाद UNMOGIP का मकसद भी खत्म हो गया. इसलिए अब वह प्रभावी नहीं रह गया है.

दूसरी ओर पाकिस्तान आज भी युद्धविराम उल्लंघन की शिकायतें UNMOGIP के पास दर्ज कराता है. संयुक्त राष्ट्र महासचिव का दफ्तर यह कह चुका है कि किसी मिशन को समाप्त करने का अधिकार सिर्फ सुरक्षा परिषद के पास है. चूंकि सुरक्षा परिषद ने UNMOGIP को कभी औपचारिक रूप से समाप्त नहीं किया, इसलिए यह मिशन अब तक जारी है.

2025 में पाकिस्तान ने क्या कहा?

अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने सिंधु जल संधि को निलंबित कर दिया. इसके कुछ दिन बाद, 24 अप्रैल 2025 को प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की अध्यक्षता में पाकिस्तान की राष्ट्रीय सुरक्षा समिति की बैठक हुई. बैठक के बाद पाकिस्तान ने घोषणा की कि वह भारत के साथ हुए सभी द्विपक्षीय समझौतों को फिलहाल स्थगित रखेगा. इसमें शिमला समझौता भी शामिल है.

इसके बाद 4 जून 2025 को पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने एक टीवी इंटरव्यू में शिमला समझौते को 'दम तोड़ चुका दस्तावेज' बताया और कहा कि पाकिस्तान कश्मीर पर अपने 1948 वाले रुख पर लौट आया है.

हालांकि अगले ही दिन पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने स्थिति साफ करते हुए कहा कि किसी भी द्विपक्षीय समझौते को औपचारिक तौर से रद्द करने का कोई फैसला नहीं लिया गया है और मौजूदा संधियां अब भी प्रभावी हैं.

भारत का रुख अब भी नहीं बदला

भारत का कहना है कि शिमला समझौते में कहीं भी इससे बाहर निकलने का कोई प्रावधान नहीं है. इसके अलावा पाकिस्तान ने कूटनीतिक माध्यम से भारत को समझौता समाप्त करने की कोई औपचारिक सूचना भी नहीं दी है.

इसी वजह से भारत का विदेश मंत्रालय आज भी यही मानता है कि शिमला समझौता पूरी तरह लागू है और कश्मीर समेत सभी विवादों को द्विपक्षीय बातचीत के जरिए सुलझाने की शर्त अब भी दोनों देशों पर बराबर लागू होती है.