Opinion: मामूली कार्यकर्ता से CM की कुर्सी तक...20 साल के उतार-चढ़ाव के बाद क्यों सियासी 'मायके' लौटे रेवंत रेड्डी
रेवंत विरोधियों और पत्रकारों पर उनके तीखे हमले हमेशा चर्चा में रहते हैं. लेकिन आने वाले दिन उनके लिए मुश्किल भरे होंगे.
सियासत में वक्त का पहिया जब घूमता है, तो मंजर कितना बदल जाता है, इसकी जिंदा मिसाल आज महबूबनगर के मिदजिल में देखने को मिली. ठीक 20 बरस पहले, 4 जुलाई को जिस शख्स ने एक अदने से स्थानीय निकाय सदस्य (ZPTC) के तौर पर अपने राजनीतिक सफर का पहला कदम रखा था, आज वो पूरे ठाठ-बाठ और लाव-लश्कर के साथ तेलंगाना का मुख्यमंत्री बनकर अपनी उसी सियासी जन्मभूमि पर वापस लौटा है.
मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी का शनिवार (4 जुलाई 2026) को मिदजिल का यह दौरा कोई सरकारी वजह से नहीं था . ये दौरा जनता को शुक्रिया अदा करने का एक भावुक जरिया था. ये वो जगह ही है जिसने दो दशक पहले सियासत में जीत का पहला सेहरा बांधा था.

मिदजिल से मिला वजूद, अब कर्ज चुकाने की बारी
एक दौर था जब रेवंत रेड्डी छात्र राजनीति में सक्रिय थे और आरएसएस के छात्र संगठन एबीवीपी (ABVP) से जुड़े थे. लेकिन साल 2006 में उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर मिदजिल जेडपीटीसी सीट से किस्मत आजमाई और जीत दर्ज की. वहां से शुरू हुआ यह सफर एमएलसी, दो बार कोडांगल से विधायक, मल्कजगिरी से सांसद, तेलंगाना कांग्रेस अध्यक्ष और आखिरकार 2023 में राज्य के मुख्यमंत्री की कुर्सी तक जा पहुंचा.
अपनी इस भावुक घर-वापसी पर मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने NDTV से खास बातचीत में अपने दिल की बात साझा की. उन्होंने बेहद बेहज भावुक अंदाज में कहा, "मैं आज उस जगह को देखने जा रहा हूं, जिसने मुझे एक राजनेता के रूप में मेरी असल पहचान दी. उस वक्त (2006 में) मुझे हमेशा यह मलाल रहता था कि मैं इस इलाके के लिए कुछ बड़ा नहीं कर सका. लेकिन आज मैं बतौर मुख्यमंत्री यहां आ रहा हूं. अब मैं इस कर्ज को चुकाऊंगा और मिदजिल के हर गांव के लिए 100 करोड़ रुपये और उससे भी ज्यादा के कल्याणकारी कामों का ऐलान करूंगा."

जेल जाना पड़ा था
रेवंत रेड्डी का 56 साल का यह जीवन और उनका सियासी सफर कोई आसान नहीं रहा है. टीडीपी (TDP) में शामिल होने के बाद वो पार्टी सुप्रीमो चंद्रबाबू नायडू के बेहद करीबी सिपहसालार बने. लेकिन उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा इम्तिहान तब आया, जब उनका नाम मशहूर 'कैश फॉर वोट' घोटाले में उछला. इस मामले में उन्हें 31 दिनों तक जेल की सलाखों के पीछे भी काटना पड़ा.
कड़े इम्तिहानों और तमाम तरह के आरोपों के बाद भी रेवंत सियासत में जमे रहे. 2017 में उन्होंने कांग्रेस का दामन थामा और अपनी आक्रामक और बेबाक सियासत के दम पर 2021 में तेलंगाना कांग्रेस (TPCC) की कमान संभाल ली. आखिरकार, उनकी अगुवाई में कांग्रेस ने 2023 के विधानसभा चुनावों में ऐतिहासिक जीत हासिल की और उन्होंने मुख्यमंत्री पद हासिल कर लिया.

तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी
तीखे तेवर, 'बड़े भाई' और हिटलर का जिक्र
मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने के बाद भी रेवंत रेड्डी अपने बेबाक बयानों और आक्रामक तेवरों को लेकर लगातार सुर्खियों और विवादों में रहे हैं. विपक्ष तो छोड़िए, खुद उनकी अपनी पार्टी के कुछ सीनियर लीडर उनकी इस कार्यशैली और फैसलों से खफा नजर आते हैं, हालांकि आलाकमान और गांधी परिवार का उन पर भरोसा कायम है.
उनके कुछ हालिया बयानों ने सियासी गलियारों में खूब हंगामा मचाया. जब उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मंच से 'बड़े भाई' कहकर पुकारा और तेलंगाना के विकास के लिए केंद्र से मदद मांगी, तो सब हैरान रह गए.

Photo Credit: Rahul gandhi/X
सामने पड़ा है चुनौतियों का समंदर
मुख्यमंत्री के तौर पर रेवंत रेड्डी ने अपने कार्यकाल के करीब पौने तीन साल पूरे कर लिए हैं. लेकिन आने वाले दिन उनके लिए मुश्किल भरे होंगे. उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती राज्य के खजाने पर बिना बोझ डाले कांग्रेस के बड़े-बड़े लोक-कल्याणकारी वादों को पूरा करना है.

इसके साथ ही राज्य के बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को पूरा करना, केंद्र सरकार के साथ तालमेल बिठाना और सूबे में दोबारा पैर पसार रही बीआरएस (BRS) और बीजेपी (BJP) जैसी मजबूत विपक्षी ताकतों से लोहा लेना शामिल है. बहरहाल, आज की तारीख उनके लिए अपनी सियासी जड़ों को चूमने और वहां से आगे के लंबे सफर के लिए नई ऊर्जा समेटने का दिन है.
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