Opinion: Gen-Z से उनकी भाषा में बात करने की शुरुआत, लेकिन चुनौती बड़ी
छात्रों के आंदोलन के बीच सरकार ने संवाद की नई रणनीति अपनाई है. हालांकि Gen-Z की भाषा और अपेक्षाओं को समझना अभी लंबी प्रक्रिया है.
छात्रों के प्रदर्शन के बाद सरकार हरकत में है. नया बिल आ रहा है. शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए टास्कफोर्स बनाई गई है. सरकार यूथ से उनकी भाषा में उनके प्लेटफॉर्म पर बात करने की कोशिश कर रही है. लेकिन ये यात्रा लंबी है.
छात्रों का प्रदर्शन जब बेकाबू होने लगा तो प्रधानमंत्री ने खुद मोर्चा संभाला. उन्होंने उस भाषा में और उस माध्यम पर छात्रों से बात की, जो उनको समझ आती है. उन्होंने तीन रील बनाए और इंस्टाग्राम पर अपलोड किया. पहली रील को 392 मिलियन लोग देख चुके हैं. दूसरे को 269 मिलियन और तीसरे वीडियो को 145 मिलियन.
इन रील्स की एक खास बात ये है कि ये सेल्फ शॉट लगते हैं. लास्ट के दो वीडियो में पीएम खुद से वीडियो शुरू करते हैं, जैसे कि कैमरा ऑन कर रहे हों. वर्टिकल वीडियो हैं, कैंडिड स्टाइल में हैं, जैसे कि इंस्टा रील होते हैं. पीएम बच्चों को फ्रेंडस कहकर संबोधित करते हैं. हालांकि सिर्फ पीएम के प्रयास से काम नहीं चलने वाला. पूरी सरकार को अपनी शैली बदलनी होगी. पीएम की तुलना में इंस्टाग्राम पर बाकी मंत्रियों का हाल देख लीजिए.

जेन-जी से उन्हीं की भाषा में बात करना इतना आसान भी नहीं है. एनडीटीवी प्रॉफिट बिजनेस लीडर्स अवॉर्ड में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से पूछा गया कि सरकार इंस्टा, मीम, जेन-जी और उनकी भाषा में कैसे संवाद करेगी, कैसे गवर्नेंस में बदलाव लाएगी? उन्होंने माना कि ये वक्त की जरूरत है लेकिन सरकार के लिए ऐसा करना इतना आसान भी नहीं.

निर्मला सीतारमन, वित्त मंत्री
जाहिर है कि ये मुश्किल काम है. लेकिन अच्छी बात ये है कि सरकार इस दिशा में काम कर रही है. पीएम की रील के अलावा भी कुछ कदम हैं जो सरकार ने उठाए हैं. जैसे कि लोकसभा में संबंधित बिल पर युवा सांसदों को बोलने देने के लिए आगे करना.
जैसे शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए जो टास्क फोर्स बनाया गया है उसमें नंदन निलेकनी और डोमेन एक्सपर्ट हैं. इस टास्कफोर्स को सिर्फ सरकारी अधिकारियों से नहीं भर दिया गया है.
हाई-पावर्ड टास्क फोर्स के सदस्य
नंदन नीलेकणी – टेक्नोलॉजी एक्सपर्ट और इन्फोसिस के को-फाउंडर (अध्यक्ष)
डॉ. एस. सोमनाथ – इसरो (ISRO) के एक्स चेयरमैन
तपन डेका – इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) के पूर्व निदेशक
प्रो. वी. कामकोटि – आईआईटी मद्रास के निदेशक
अनीता करवाल – पूर्व शिक्षा सचिव
अमृत लाल मीणा – लॉजिस्टिक्स और प्रशासनिक मामलों के विशेषज्ञ
दिल्ली बीजेपी अब जेन-जी तक अपनी पहुंच बढ़ाने पर जोर दे रही है. पार्टी ने अपने युवा मोर्चा को ABVP के साथ मिलकर दिल्ली यूनिवर्सिटी के नॉर्थ और साउथ कैंपस में छात्रों के साथ जुड़ाव बढ़ाने का काम सौंपा है. साथ ही, पार्टी मंत्रियों से भी कहा गया है कि वे छात्रों और युवा समूहों के साथ सीधे बातचीत बढ़ाएं.
शासन की भाषा Vs सेवक की भाषा
ये समस्या सिर्फ जेन-जी से संवाद को लेकर नहीं है. हमारे तमाम विभाग पारिभाषिक शब्दावली से दबे हैं. आप अपने शहर में सरकारी विभागों के बोर्ड पर लिखे विभागों और पद के नाम देख लीजिए. अधिशासी अभियंता, अपर मुख्य सचिव, राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण, केंद्रीय सचिवालय राजभाषा सेवा संवर्ग. अगर आपको संदर्भ न पता हो ये भाषा आपको एलियन लग सकती है. और जहां तक जेन-जी की बात है तो उनके लिए तो एक अलग ही यूनिवर्स है.
जिस भाषा में पढ़ाई होती है, जिस भाषा में किताब हैं और जो आम बोलचाल की भाषा है उसमें आसमान जमीन का अंतर है. नतीजा ये कि ज्यादा ऊर्जा खपत हो जाती है शब्दार्थ समझने में, भावार्थ तक जाते-जाते ऊर्जा सूख जाती है.
कुल मिलाकर शासक से सेवक वाला जो घोषित भाव है उसे एक्शन में लाना है तो सिर्फ अपनी नहीं कहनी होगी, जिनकी सेवा करनी है उनकी सुननी होगी और वो सुनने और समझने के लिए उनकी भाषा अपनानी होगी.
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