जिंदा रहने की जद्दोजहद में जलालत झेलती जिंदगियां, नोएडा की मजदूर बस्तियों से ग्राउंड रिपोर्ट
तीन दिनों की हड़ताल में यह मजदूर सिर्फ वेतन बढ़ाने की मांग नहीं कर रहे. ये अपनी जिंदगी में थोड़ा सा सम्मान भी मांग रहे हैं. इतनी कमाई मांग रहे हैं कि बच्चा स्कूल जा सके. मां-बाप की दवा आ सके. कमरे में एक और पंखा लग सके. तनख्वाह वक्त पर मिल सके. पढ़ें नोएडा के वर्कर्स के घर से NDTV की खास ग्राउंड रिपोर्ट...
13 अप्रैल को देश ने टीवी न्यूज चैनलों पर नोएडा के ऐसे विजुअल चलते देखे जिसके लिए राजधानी दिल्ली से सटा ये हाईटेक शहर जाना नहीं जाता. सेक्टर 62, 63,64, 65 और अन्य इंडस्ट्रियल इलाकों में सड़कों पर उतरी मजदूरों की भीड़ ने जबर्दस्त हंगामा किया. ये मजदूर अपने लिए काम के बेहतर हालात और ज्यादा वेतन की मांग कर रहे थे. ये वो मजदूर थे जो विकास के कुलांचे भरते इस शहर की रफ्तार को अपनी जिंदगी हर रोज थोड़ी-थोड़ी घिसकर जिंदा रखते हैं.
फर्रुखाबाद से आई वर्षा की कहानी सुनिए. सुबह 9 बजे सिलाई मशीन पर बैठने वाली वर्षा रात 9 बजे तक काम करती हैं. जब घर लौटती हैं, तब तक उनकी कमर ही नहीं बल्कि लगभग सारा शरीर जवाब दे चुका होता है. लेकिन घर पहुंचकर भी आराम नहीं मिलता बल्कि गैस पर चढ़ा बर्तन उनका इंतजार कर रहा होता है. सुकून उनके हिस्से में कभी पूरा नहीं आया.
वर्षा की उंगलियां कपड़ों की सिलाई में इतनी तेज हो चुकी हैं कि आंख बंद करके भी धागा डाल दें, लेकिन जिंदगी की उधेड़बुन उनसे नहीं हो पा रही. वो कहती हैं, 'दिनभर मशीन पर सिर झुकाए रहो, आंखें जलती हैं, पीठ टूटती है, लेकिन महीने के आखिर में हाथ खाली के खाली रह जाते हैं. 500 रुपये दिहाड़ी में क्या बचता है? कमरा, राशन, दवाई, किराया…सब कुछ निगल जाता है.'

गीता (बीच में) और वर्षा (दाएं)
इस सवाल में शिकायत भी है, गुस्सा भी है, चिंता भी है और बेबसी भी. जैसे पहले से पता हो कि होना कुछ नहीं है, बदलना कुछ नहीं है. रोना भी उनको अब एक फिजूल खर्च लगने लगा है. वर्षा बताती हैं कि तनख्वाह वक्त पर न मिलना सबसे बड़ा जख्म है. 7 तारीख को पैसा मिलना चाहिए, लेकिन 15 तक अटक जाता है तब तक उधार मांगो, दुकानदार की आंखें झेलो, कमरे के मालिक की डांट सुनो. कई बार तो लगता है कि इस शहर में गरीब आदमी का सबसे बड़ा कसूर गरीब होना ही है.
वर्षा की आंखों में एक अजीब सी खाली जगह है. जैसे बहुत पहले उन्होंने सपने देखना बंद कर दिया हो. अब उनके लिए जिंदगी बस अगले महीने तक पहुंचने का नाम है. वर्षा के पास बैठी गीता की कहानी तो और भी ज्यादा कलेजा चीरती है. फिरोजाबाद से नोएडा आईं गीता की सबसे बड़ी लड़ाई महंगाई से नहीं, अपने बच्चे की आंखों से है. वो कहती हैं, 'मेरा बच्चा हर बार पूछता है, मम्मी स्कूल कब जाऊंगा? मैं हर बार कोई नया बहाना बना देती हूं. कभी कहती हूं अगले महीने, कभी कहती हूं जल्दी. लेकिन सच ये है कि 600 रुपये की फीस भी अब मेरे लिए पहाड़ है.'

गीता के घर की रसोई.
गीता जब यह कहती हैं, तो उनकी आवाज टूट जाती है. उनकी आंखें सड़क की धूल में कहीं खो जाती हैं. शायद वहां उन्हें अपने बच्चे का चेहरा दिखता होगा. 'कई बार सोचना पड़ता है. गैस भरवाऊं या बच्चे की फीस दूं? राशन लाऊं या दवाई खरीदूं? कमरे का किराया दूं या घर पैसे भेजूं? हर महीने ऐसा लगता है जैसे जिंदगी कोई इम्तिहान ले रही हो… और हम हर बार फेल हो रहे हों.'
वो कहती हैं, 'हमसे मशीन की तरह काम लिया जाता है, लेकिन मशीन खराब हो जाए तो उसे ठीक किया जाता है. हम बीमार पड़ जाएं, तो कहा जाता है, कल से मत आना.'

मुकेश (बीच में) और अजीत (दाएं)
इसी तरह का दर्द हरदोई के मुकेश कुमार का भी है. उनकी आंखों के नीचे काले घेरे हैं. जैसे कई रातों से नींद उनका पता भूल गई हो. उनके साथ रहने वाले अजीत कुमार हमें उनका कमरा दिखाते हैं. वो कमरा कम, किसी बंद डिब्बे जैसा ज्यादा लगता है. इतनी छोटी जगह कि सांस भी सोच-समझकर लेनी पड़े. दीवारों पर सीलन है, दीवारें गर्मी में तपती हैं और छत पर लटका पंखा गर्म हवा को बस इधर से उधर करता रहता है.
कमरे में एक बल्ब जल रहा है. वही उनके दिन का सूरज और रात का चंद्रमा है. उसी रोशनी में खाना बनता है, कपड़े सूखते हैं, फोन पर घर बात होती है, और उसी रोशनी में अगले दिन की चिंता भी पलती है. अजीत कहते हैं, 'इस कमरे में धूप नहीं आती. कभी-कभी लगता है कि हम लोग नहीं, बस सामान रख दिया गया है.' यह वाक्य सुनकर कमरे की दीवारें भी जैसे और सिकुड़ जाती हैं.
इस छोटे से कमरे में तीन-चार लोग रहते हैं. एक बिस्तर पर कई लोगों की थकान बारी-बारी से उतरती है. कोई रात की शिफ्ट से लौटकर लेटता है, तो दूसरा उठकर फैक्ट्री चला जाता है. यहां बिस्तर भी अपना नहीं, नींद भी पूरी नहीं.
मुकेश बताते हैं, 'पहले 11 हजार मिलते थे. PF कटकर 9 हजार हाथ में आते थे. अब हड़ताल के बाद 13,690 हो गए, लेकिन हाथ में 11,500 के आसपास ही आएंगे. इससे क्या बदल जाएगा?' वो हंसने की कोशिश करते हैं, लेकिन चेहरे पर सिर्फ बेबसी उतरती है. कमरे का 6000 किराया है. बिजली का 800-900 बिल आ जाता है. पंखा और बल्ब ही तो है. फिर भी मकान मालिक 10-11 रुपये यूनिट लेता है. RO का पानी खरीदो, गैस भरो, राशन लाओ… महीने की पहली तारीख से ही डर लगने लगता है.

मजदूरों के विरोध प्रदर्शन के बाद फैक्ट्रियों के बाहर लगे वेतन वृद्धि के पोस्टर.
मुकेश जब गांव की बात करते हैं, तो उनकी आवाज धीमी हो जाती है. बूढ़े मां-बाप गांव में हैं. पिता खेती करते हैं, लेकिन उससे घर नहीं चलता. हर महीने पैसे भेजना जरूरी है. मां फोन पर पूछती हैं, बेटा, खाना खा लिया? मैं हां बोल देता हूं… लेकिन कई बार खुद आधा पेट ही सोया हूं. उनकी यह बात हवा में देर तक ठहर जाती है.
मुकेश बताते हैं कि फैक्ट्री में खाना भी ऐसा मिलता है कि कई बार लोग भूखे रहना बेहतर समझते हैं. खाने में बाल, कीड़े तक मिले. शिकायत की तो HR ने कहा कि खाना है तो खाओ, नहीं तो मत खाओ. यह सिर्फ एक जवाब नहीं, यह उस पूरी व्यवस्था की सच्चाई है जहां मजदूर की मेहनत की कीमत है, लेकिन उसकी तकलीफ की नहीं.
तीन दिनों की हड़ताल में यह मजदूर सिर्फ वेतन बढ़ाने की मांग नहीं कर रहे. ये अपनी जिंदगी में थोड़ा सा सम्मान भी मांग रहे हैं. इतनी कमाई मांग रहे हैं कि बच्चा स्कूल जा सके. मां-बाप की दवा आ सके. कमरे में एक और पंखा लग सके. तनख्वाह वक्त पर मिल सके. सरकार के आदेश के बाद कुछ फैक्ट्रियों ने तो तनख्वाह बढ़ाने के नोटिस चिपका दिए हैं, जबकि कई फैक्ट्रियों ने मजदूरों की ही छुट्टी कर दी. उन्हें 5 दिन के लिए न आने को कह दिया है.
जब रोटी छोटी पड़ जाती है, तो इंसान की खामोशी सबसे पहले टूटती है और जब खामोशी टूटती है, तो आवाज कम, शोर ज्यादा निकलता है. नोएडा पिछले तीन दिनों से इस शोर को महसूस कर रहा है, तभी भी जब वो भीड़ को उत्पात मचाते देखता है, तब भी जब घंटों जाम में फंसा रहता है और तब भी जब टीवी चैनलों पर मजदूरों के इस गुस्से के विजुअल चलते देखता है.
-
अगर चुनाव फिक्स हैं तो कांग्रेस बहिष्कार क्यों नहीं करती? राहुल के 'ध्यान भटकाने' वाले जवाब में कितना लॉजिक
चुनाव बॉयकॉट की जबरदस्त मांग 'कॉकरोच जनता पार्टी' की तरफ से आई है. लेकिन क्या बॉयकॉट से कोई फायदा होता है? रिसर्च, उदाहरण और एक्सपर्ट्स का एनालिसिस हमें इस बारे में क्या बताते हैं, आइए जानते हैं.
-
हवा में टेरर, भारतीय पायलट बना फाइटर… समझिए Flydubai की फ्लाइट में क्या-क्या हुआ था?
Flydubai की फ्लाइट FZ1073 में एक को-पायलट ने भारतीय कैप्टन पर चाकू से हमला कर दिया. वह प्लेन को अपने कब्जे में लेना चाहता था, ताकि उसे क्रैश कर सके.
-
गांव की ताकत समझो और तरक्की करो- कारोबारियों ने समझ लिया वित्त मंत्री का मंत्र तो हो सकते हैं मालामाल
The Rural India Consumption Story: वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कंपनियों से गांव और ग्रामीण ग्राहकों पर फोकस करने को क्यों कहा? आइए, कंजप्शन, FMCG, ऑटो सेल्स, इनकम और क्रेडिट के आंकड़ों के आधार पर रुरल इंडिया की 'पावर' समझने की कोशिश करते हैं .
-
नाबालिग मुस्लिम लड़कियों को HC के फैसले से कैसे मिली ढाल? बालिकाओं को वधू बनने से रोक पाएगा ये फैसला
दिल्ली हाई कोर्ट ने साफ कर दिया है कि अगर मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत शादी वैध है भी तब भी नाबालिग पत्नी से बनाए गए संबंध POCSO के दायरे में आएंगे.
-
ज्ञानेश कुमार के पास है गिरफ्तारी का 'सुरक्षा कवच', फिर ऐसा क्यों कहा जा रहा कि बच नहीं पाएंगे?
मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार एक बार फिर विपक्ष के निशाने पर आ गए हैं. उनकी गिरफ्तारी की मांग भी हो रही है. लेकिन ज्ञानेश कुमार के पास कानून का सुरक्षा कवच भी है.
-
जिस 'पितृसत्ता' पर हमलावर रहते हैं राहुल, वह शब्द आया कहां से? क्या होता है इसका मतलब
जमुई की घटना को राहुल गांधी ने 'पितृसत्ता' से जोड़ दिया. लेकिन ये 'पितृसत्ता' शब्द आया कहां से और इसका मतलब क्या होता है? जानते हैं.
-
EXCLUSIVE: ऑपरेशन सिंदूर के 16 महीने बाद भी पाकिस्तान उस रनवे को ठीक कर रहा है, जिसपर भारत ने दागी थी मिसाइल
भारतीय वायु सेना ने मुशफ पर किए गए हमलों में इस्तेमाल हथियारों के बारे में कोई टिप्पणी नहीं की है, लेकिन गड्ढे का आकार और गहराई देखकर ऐसा लगता है कि सुखोई-30 MKI विमान से छोड़ी जाने वाली हवा से जमीन पर मार करने वाली ब्रह्मोस मिसाइल का इस्तेमाल किया गया था.
-
उत्तर प्रदेश में इंसानों-जानवरों के बीच क्यों बढ़ रहा टकराव? मुरादाबाद-बिजनौर में बार-बार दिखे तेंदुए
उत्तर प्रदेश के बिजनौर और मुरादाबाद में तेंदुओं के हमलों से किसान दहशत में हैं. गन्ने के खेत तेंदुओं के ठिकाने बन गए हैं. पिछले दिनों CM योगी ने माना कि सूबे में ह्यूमन-वाइल्डलाइफ कॉन्फ्लिक्ट में 4000 से ज्यादा मौतें हुई हैं.
-
जब इस्लाम की सबसे पवित्र जगह 15 दिन के लिए थी हाईजैक, मक्का पर हमले की कोशिश ने याद दिलाया 1979 का अटैक
हूतियों के साथ चल रहे संघर्ष के बीच सऊदी अरब ने पहली बार पवित्र शहर मक्का में हवाई हमले का अलर्ट जारी किया. लेकिन साल 1979 में इस्लाम की सबसे पवित्र जगह पर चरमपंथियों ने अचानक हमला कर दिया था. इसके बाद दो हफ्तों तक ऑपरेशन चला था.