मॉनसून सत्र का लेखा-जोखा- सबकी जीत हुई, संसद की हार हुई
पिछले कुछ दशकों के रुझान बताते हैं कि राजनीतिक पार्टियां लोकतांत्रिक ढांचे के सबसे ऊपरी हिस्से, यानी संसद को कमजोर करने की साजिश में चुपचाप शामिल हो गई हैं. उन्होंने जवाबदेह लोकतंत्र के इस मंदिर को दरकिनार करना सीख लिया है और दूसरे तरीकों से चुनाव जीत रही हैं.
भारतीय संसद का कामकाज एक चिंताजनक ढर्रे पर चलने लगा है. संविधान बनाने वालों ने इसे ऐसी बहसों के लिए बनाया था, जो वोट देने वालों की भलाई पर केंद्रित हों और ऐसे कानूनों के लिए जो हर चुने हुए सांसद की समझ-बूझ की कसौटी पर खरे उतरें.
बृहस्पतिवार को ठीक सुबह 11 बजे लोकसभा स्पीकर ओम बिरला अपनी कुर्सी पर आए. विपक्ष के सांसदों ने कार्यवाही में बाधा डालने के लिए अपनी पूरी ताकत के साथ शोर-शराबा शुरू कर दिया, जैसा कि अब आम बात हो गई है.
बिरला ने उन्हें बैठने के लिए नहीं कहा. उन्होंने उन्हें शांत होने के लिए भी नहीं कहा. उन्होंने सभी से राष्ट्रगीत के सम्मान में खड़े होने को कहा. कुछ मिनटों तक सदन में 'वंदे मातरम' की शांतिपूर्ण गूंज सुनाई दी. और फिर स्पीकर ने सदन की कार्यवाही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दी, जिससे संसद का मॉनसून सत्र तय समय से 6-7 घंटे पहले ही समाप्त हो गया.
'ग्लेडिएटर' की तरह जीत के दावे
संसद में लगभग 250 वर्ग फुट का पारदर्शी विनाइल दीवारों वाला पोर्टा-केबिन "मीडिया हट" पुरानी संसद की इमारत के गेट नंबर 1 (जो पहले सांसदों के आने-जाने का रास्ता था) और नई इमारत के प्रवेश द्वार 'मकर द्वार' से बिल्कुल बराबर दूरी पर स्थित है. यहां से यह साफ दिखता है कि समय के साथ चीजें कैसे बदली हैं और उनमें कैसे गिरावट आई है. सदनों की कार्यवाही के 29वें दिन या 19वीं बैठक के दौरान, बिना ज्यादा काम किए सांसदों को बाहर निकलते हुए देखकर मुझे डायरेक्टर रिडले स्कॉट की शानदार एडवेंचर ड्रामा फिल्म 'ग्लेडिएटर' में सीनेटर ग्रैचस की कही बात याद आ गई. ग्रैचस ने रोमन राजनीति के बारे में एक निराशावादी नजरिया पेश करते हुए कहा था कि "रोम का धड़कता हुआ दिल सीनेट का संगमरमर नहीं, बल्कि कोलोसियम की रेत है".

मॉनसून सत्र 2026 का हर दिन हंगामे की वजह से लगभग बर्बाद हो गया. रोज दोनों तरफ के सांसद मकर द्वार से ऐसे बाहर निकलते थे, जैसे कोलोसियम से ग्लेडिएटर जीत का दावा करते हुए निकलते हों. लेकिन थोड़ा रुककर और सोच-समझकर यह पता चलता है कि अलग-अलग खेमों में बंटी सभी पार्टियां और समूह अपनी बात मनवाने में कामयाब रहे हैं और इसमें सिर्फ एक ही हारने वाला है - वोटर. इससे फिर साबित होता है कि राजनीतिक जवाबदेही और कामकाज के मुकाबले तमाशे के जरिए ध्यान भटकाना ज्यादा असरदार होता है.
आत्मविश्वास का अंदाज
संसद के मॉनसून सत्र को कवर करने वाले किसी भी पत्रकार से पूछिए कि इस सत्र की सबसे खास बात क्या रही. वे आपको बताएंगे कि महीने भर चलने वाले इस सत्र के दूसरे हिस्से में सबसे खास बात विपक्ष के नेता राहुल गांधी का संसद के अंदर और बाहर एक विजेता की तरह आत्मविश्वास के साथ चलना रहा. यह आत्मविश्वास ज्यादातर कांग्रेसी नेताओं में भी दिखा. कांग्रेसी मानते हैं कि यह सत्र के पहले हिस्से से बिल्कुल अलग था, क्योंकि तब वे नहीं, बल्कि CJP (कॉकरोच जनता पार्टी) सुर्खियों में छाई रही. इस व्यंग्यात्मक प्लेटफॉर्म ने वह कर दिखाया जो मोदी सरकार के 12 सालों के शासन में पूरे विपक्ष के लिए नामुमकिन था. Gen Z के गुस्से की वजह से BJP नेतृत्व को संसद सत्र के बीच में ही एक मंत्री को हटाना पड़ा. कांग्रेस शुरू में विरोध प्रदर्शनों से दूर रही थी. इसलिए, धर्मेंद्र प्रधान को हटाए जाने का श्रेय वे नहीं ले सके.
राहुल गांधी ने PM के घर के बाहर धरना देने की नाकाम कोशिश के साथ देर से इस मामले में एंट्री की. फिर उन्होंने अपना मकसद बदल लिया. कांग्रेसियों के लिए इस बदलाव से जीत का एहसास और आत्मविश्वास आया.

CJP की कामयाबी शिक्षा मंत्री का इस्तीफा थी. राहुल गांधी और कांग्रेस को कुछ ऐसा चाहिए था जो ज्यादा साफ तौर पर दिखे और असरदार हो. उन्होंने पैलेट गन से घायल प्रदर्शनकारियों, प्रदर्शनकारियों पर की गई सख्त कार्रवाई, दिल्ली पुलिस की गलतियों और इन सब पर गृह मंत्री अमित शाह की चुप्पी को मुद्दा बनाकर एक नैरेटिव तैयार किया कि वे "गायब" हैं.
वह चाहते थे कि शाह सदन को बताएं कि सख्त कार्रवाई और पुलिस की कार्रवाई को बढ़ाने का आदेश किसने दिया था.
सरकार अपनी बात पर अड़ी रही. उसके नेताओं ने शाह के बयान के लिए नियम तय कर दिए. हंगामा जारी रहने तक कोई बातचीत नहीं होगी.
DMK के अलग होने और TMC के साथ छोड़ने के बाद कमजोर पड़े INDIA गठबंधन को इस जान-बूझकर बनाए गए गतिरोध की अहमियत समझ आ गई. उनका निशाना शाह थे - जिन्हें BJP ने "चाणक्य" का दर्जा दिया है. वही शाह जिन्होंने आर्टिकल 370 की गुत्थी सुलझाई और नक्सली खतरे को खत्म किया.
मॉनसून सत्र के खत्म होने के करीब आते ही, राहुल गांधी को उनकी पार्टी उस नेता के तौर पर पेश कर रही है जिसने शाह को बेचैन कर दिया. गर्व से भरे एक सीनियर कांग्रेस नेता ने मुझसे कहा, "शाह का दबदबा खत्म हो गया है." यही वह जीत की ट्रॉफी है, जिसके साथ विपक्ष ने सत्र से विदाई ली.
क्या सरकार हार गई है?
2026 का मॉनसून सत्र सरकार के लिए ऐसा रहा जिसे वह भूलना चाहेगी. पहले ही दिन, संसद तक पहुंचने के लिए सड़कों पर प्रदर्शनकारियों की भीड़ से जूझना पड़ा. कुछ ही दिनों में प्रधान को हटाना पड़ा. परिसीमन बिल को दोबारा पेश करने के लिए जरूरी संख्या जुटाने की कोशिशें कामयाब नहीं हो पाईं. विदेशी चंदे को लेकर सरकार का रुख सख्त है; FCRA बिल को अंदरूनी विरोध, बाहरी प्रदर्शनों और इस पर दोबारा विचार करने के लिए दुनिया की बड़ी ताकतों के दबाव का सामना करना पड़ा है.
लेकिन क्या विपक्ष की जीत का मतलब सरकार की हार है?

इसका जवाब सत्र के घटनाक्रम में छिपा है. आज के दौर में, अगर सरकार का कोई अहम बिल गिर जाता है या सत्र पूरी तरह बेकार चला जाता है और कोई बिल पास नहीं हो पाता, तो विपक्ष को विजेता माना जा सकता है.
इन पैमानों को कागज पर उतारिए. सेशन के आंकड़ों को आमने-सामने रखिए. और तस्वीर धुंधली हो जाती है. जीत और हार के बीच का फर्क मिटने लगता है. भले ही सरकार जीत के जोश में न दिख रही हो, लेकिन इस सत्र से उसे कुछ कामयाबियां जरूर मिली हैं. हो सकता है कि संसद का मॉनसून सत्र विपक्ष के हंगामे की वजह से रुका रहा हो, लेकिन यह पूरी तरह बेकार नहीं गया.
भले ही FCRA या परिसीमन (डिलिमिटेशन) जैसे बड़े बिल पेश नहीं हो पाए, लेकिन सरकार हंगामे के बावजूद लगभग 20 बिल या कानून पास कराने में कामयाब रही. सत्र की शुरुआत में पेश किए जाने के लिए लिस्ट में शामिल लगभग हर बिल पास हो गया.
इसे देखिए. इस सेशन का मुख्य मकसद 'जेन Z' (Gen Z) को लुभाने के लिए एक नया राजनीतिक फॉर्मूला तैयार करना था. इस खास डेमोग्राफी पर ध्यान देते हुए, विपक्ष 'पब्लिक एग्जामिनेशन्स (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन बिल' को पास होने से नहीं रोक पाया. एग्जाम पेपर लीक के खिलाफ सख्त नियम लाकर सरकार ने 'जेन Z' को खुश करने की कोशिश की. चूंकि विपक्ष पर जनता की नजर थी, इसलिए इस बिल पर लोकसभा में 11 घंटे और राज्यसभा में 7 घंटे 14 मिनट तक बहस हुई. सरकार केरल का नाम बदलकर 'केरलम' करने वाला बिल पास कराने में सफल रही.
विपक्ष बीजेपी के पसंदीदा 'राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) बिल, 2026' को नहीं रोक पाया; यह बिल 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा में डॉ. राजेंद्र प्रसाद के उस बयान पर आधारित है, जिसमें कहा गया था कि 'वंदे मातरम' को 'जन गण मन' के बराबर दर्जा प्राप्त है. सुप्रीम कोर्ट में जजों की कमी है. सरकार का 'सुप्रीम कोर्ट (जजों की संख्या) संशोधन एक्ट, 2026' आसानी से पास हो गया, जिसके तहत भारत के सुप्रीम कोर्ट में जजों की मंजूर संख्या 34 से बढ़ाकर 38 (भारत के मुख्य न्यायाधीश सहित) कर दी गई है.
लेकिन हार किसकी हुई और कैसे?
20 जुलाई को हुए विरोध-प्रदर्शन और झड़पों के बाद सरकार ने प्रधान को हटाने में 4 दिन का समय लिया. विपक्ष का कहना था कि उनके पास हंगामा करने की वजह थी. फिर बात का रुख बदलते हुए राहुल गांधी ने अमित शाह से जवाब देने को कहा.
आखिरी से एक दिन पहले, गृह मंत्री ने बात रखी. उन्होंने विपक्ष को चुनौती दी कि वे दोपहर 2 बजे तक बहस के लिए स्पीकर को पत्र सौंपें. "मैं पुलिस की कार्रवाई पर विपक्ष के सवालों का जवाब देने के लिए तैयार हूं." विपक्ष ने शाह के प्रस्ताव को ठुकरा दिया और कहा कि उन्हें गृह मंत्री के "भाषणों" में कोई दिलचस्पी नहीं है.
इस मुद्दे के हल न हो पाने के कुछ कारण थे. विपक्ष शाह के जवाब में दिलचस्पी नहीं रखता था, क्योंकि इससे उनका "कमजोर गृह मंत्री" वाला कैंपेन कमजोर पड़ जाता. सरकार इतने दिनों तक गृह मंत्री को सामने लाने से हिचकिचा रही थी, क्योंकि उन्हें पता था कि जैसे ही शाह बोलेंगे, विपक्ष की अगली मांग प्रधानमंत्री से माफी की होगी.

इसलिए यह गतिरोध संसदीय नहीं, बल्कि राजनीतिक था. लेकिन गतिरोध और हंगामे के साथ-साथ एक और बात यह भी है कि इस सत्र में लगभग 20 बिल पास हुए. विपक्ष के हंगामे और शोर-शराबे के बावजूद ये बिल आसानी से पास हो गए.
शुरुआत में विपक्ष की रणनीति बिल पेश होने या पास होने के दौरान नारेबाजी करने और प्लेकार्ड दिखाने की थी. लेकिन विपक्ष को एहसास हुआ कि सदन में उनके शोर-शराबे से ज्यादा सरकार की संख्या बल मायने रखता है और हंगामे के बावजूद बिल आगे बढ़ाए और पास किए जा रहे थे. सत्र के आखिरी समय में विपक्ष ने अपनी रणनीति बदल दी. उन्होंने नारेबाजी के बाद राज्यसभा से वॉकआउट करना शुरू कर दिया.
यह सरकार और विपक्ष, दोनों के लिए काम कर गया. सरकार को अपने बिल मिल गए और विपक्ष को अपना तमाशा.
लेकिन जब संसद के अंदर सड़क वाली होड़ भरी राजनीति होती है, तो किसी न किसी को नुकसान उठाना ही पड़ता है या कोई न कोई हारता ही है.
कौन हारा, यह पता लगाने और साबित करने के लिए ठोस आंकड़े मौजूद हैं.
जैसा कि मैंने कहा, संसद का मतलब है बहस और बातचीत. कानूनों को बनाने के लिए सांसदों की समझदारी और सोच-विचार की जरूरत होती है. सांसदों के सवालों के जरिए सरकार को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए.
लेकिन क्या बिलों पर बहस हुई? क्या सवाल पूछे गए?
संसद सत्र ट्रैकर के आंकड़े एक चिंताजनक तस्वीर पेश करते हैं.
आइए, एक झलक देखते हैं.
इस आर्टिकल के लिए पब्लिश बटन दबाए जाने तक कुल मिलाकर लगभग 20 बिल पास हो चुके थे.
अगर यह मान लिया जाए कि संसद रोजाना छह घंटे काम करती है, तो 19 बैठकों में कुल 116 घंटे काम होना चाहिए था. लेकिन आखिर में लोकसभा की प्रोडक्टिविटी 15% और राज्यसभा की 33% रही. इसका मतलब है कि सेशन के आखिरी से ठीक पहले वाले दिन तक लोकसभा ने सिर्फ 17.5 घंटे और राज्यसभा ने सिर्फ 37.4 घंटे काम किया.

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तो, लोकसभा में 17 घंटों में लगभग 20 बिल पास किए गए. असल और चिंताजनक तस्वीर दिखाने से पहले, आइए एक मोटा-मोटा हिसाब लगा लें. डेटा बताता है कि लोकसभा को एक बिल पास करने में औसतन 51 मिनट लगे और राज्यसभा को सिर्फ 99 मिनट.
अब आइए PRS इंडिया के इकट्ठा किए गए सेशन के डेटा या सेशन को कवर करने वाले पत्रकारों के नोट्स पर नजर डालते हैं.
एक दिन ऐसा भी था जब सिर्फ 36 मिनट में सात बिल पास कर दिए गए - यानी हर पांच मिनट में एक बिल.
'पब्लिक एग्जामिनेशन्स (प्रिवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) अमेंडमेंट बिल, 2026' 29 जुलाई को पेश किया गया था. दोनों सदनों में इस पर 17 घंटे 34 मिनट तक बहस हुई.
लेकिन 'प्रिवेंशन ऑफ इंसल्ट्स टू नेशनल ऑनर (अमेंडमेंट) बिल, 2026', जिसे 30 जुलाई को लोकसभा में पेश किया गया था, उस पर लोकसभा में सिर्फ 14 मिनट और राज्यसभा में एक घंटे तक ही बहस हुई.
सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 को 3 अगस्त को लोकसभा में पेश किया गया था. यह निचले सदन में सिर्फ 4 मिनट और ऊपरी सदन में 21 मिनट में पास हो गया.
7 अगस्त को लोकसभा ने सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम विकास (संशोधन) विधेयक, 2026 को पास करने में 3 मिनट का समय लिया. कराधान और अन्य कानून (संशोधन) विधेयक, 2026 का भी यही हाल रहा. लोकसभा में 6 अगस्त को पेश किए जाने के बाद यह 3 मिनट में पास हो गया.
बैंकर्स बुक्स एविडेंस बिल, 2026, ट्रिब्यूनल रिफॉर्म्स बिल, 2026, केरल (नाम परिवर्तन) बिल, 2026 और राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (संशोधन) बिल, 2026 को लोकसभा में क्रमशः 5, 4, 12 और 10 मिनट में पास किया गया.
ऊपर बताए गए आखिरी दो बिल राज्यसभा में क्रमशः 4 और 10 मिनट में पास हुए.
यह सिलसिला सिर्फ संसद के दोनों सदनों के खराब कामकाज या दोस्तों के ग्रुप के खाने की जगह तय करने में लगने वाले समय से भी तेजी से कानून पास होने तक ही सीमित नहीं है.

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'प्रश्न काल' (Question Hour) जनता का समय होता है, जब अलग-अलग सांसद नागरिकों की समस्याओं और मुद्दों को सदन में उठा सकते हैं और सरकार से सवाल पूछ सकते हैं.
प्रश्न काल न होने का मतलब है कि सदस्यों को सवाल पूछने का मौका नहीं मिला.
लोकसभा में अब तक 12 मिनट में सिर्फ 2 सवाल पूछे गए हैं. ये दो सवाल 20 और 22 जुलाई को पूछे गए थे. उसके बाद से निचले सदन में एक भी सवाल नहीं पूछा गया है. राज्यसभा में 2.3 घंटे में सिर्फ 16 सवाल पूछे गए हैं. सबसे अच्छा प्रदर्शन 30 जुलाई को रहा, जब राज्यसभा में 6 सवाल पूछे गए और लोकसभा में एक भी नहीं.
इसका मतलब है कि अब तक लोकसभा में प्रश्नकाल के 18 घंटों में से 17 घंटे 48 मिनट बर्बाद हो चुके हैं. राज्यसभा में 15.3 घंटे बर्बाद हुए हैं.
मैं यहां उस भारी-भरकम खर्च का जिक्र नहीं करूंगा, जो सरकार को सत्र चलाने के लिए उठाना पड़ता है.
तो कुल मिलाकर कौन जीता और कौन हारा? विपक्ष ने कामकाज में रुकावट डालने में जीत हासिल की, तो सरकार ने कानून पास करवा लिए. आखिर में, किसी की भी हार नहीं हुई.
विजेता या खराब प्रदर्शन करने वाले?
1996 में पी. साईनाथ ने "एवरीबडी लव्स ए गुड ड्राउट" (हर कोई अच्छे सूखे को पसंद करता है) नाम की एक किताब लिखी थी. यह किताब उन 84 लेखों का संग्रह थी, जो उन्होंने 1990 से 1992 के बीच भारत के सुदूर और सबसे गरीब गांवों में रहते हुए 'टाइम्स ऑफ इंडिया' के लिए लिखे थे. 1995 से संसद की कार्यवाही को देखने के बाद, मैं यह कह सकता हूं कि अब हर पार्टी को 'अच्छा हंगामा' (यानी कामकाज में रुकावट) पसंद है.
विपक्ष कामकाज में रुकावट डालकर और गतिरोध पैदा करके अपने राजनीतिक समर्थकों तक अपनी बात पहुंचाता रहा है. वहीं सरकार ऐसे कानून पास करके अपनी मनमानी करती है जिन पर भले ही संसद की मुहर लगी हो, लेकिन उनमें सदन की आम सहमति या भावना की कमी हो सकती है.
वोटरों को इन दोनों के बीच का अंतर पता होना चाहिए. उन्हें यह समझना होगा कि ठीक से काम न करने वाली संसद लोकतंत्र के लिए खतरा है. उन्हें इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि भारतीय संसद में सालाना बैठक के दिनों की औसत संख्या में भारी गिरावट आई है; पहली लोकसभा (1952–57) के दौरान यह संख्या लगभग 135 दिन थी, जो हाल के कार्यकाल में घटकर सालाना लगभग 55 से 68 दिन रह गई है. परीक्षा का पेपर लीक रोकने वाले बिल पर हुई 17 घंटे की बहस यह दिखाती है कि जब जनता देख रही होती है, तो राजनीतिक पार्टियाँ कानूनों पर बहस करने के लिए मजबूर होती हैं.

आम धारणा यह है कि बिलों से चुनाव नहीं जीते जाते. लेकिन संसद का काम सिर्फ कानून बनाना नहीं है. यह जवाबदेही तय करने और समाज के हर वर्ग व वोटर की उम्मीदों और जरूरतों को शामिल करने के बारे में भी है.
सरकार को अपनी वैधता संसद के भरोसे से मिलती है और वह संसद के प्रति जवाबदेह भी होती है. जवाबदेही का यह पहलू सांसद के सरकार से सवाल पूछने के अधिकार और सरकार की उन सवालों का जवाब देने की संवैधानिक जिम्मेदारी से गहराई से जुड़ा है. लोकसभा की एक हैंडबुक में कहा गया है कि "प्रश्न काल के दौरान सरकार की असली परीक्षा होती है".
वोटर्स को पूछे जाने वाले सवालों की संख्या में कमी पर सवाल उठाने की जरूरत महसूस नहीं होती, क्योंकि उन्हें यह पता ही नहीं है कि पहले प्रश्न काल घोटालों का पर्दाफाश करने में कितना अहम रहा है. आजाद भारत का पहला बड़ा वित्तीय घोटाला, मुंध्रा घोटाला, 4 सितंबर 1957 को रायबरेली के सांसद फिरोज गांधी द्वारा प्रश्न काल में उठाए गए सवालों के बाद ही सामने आया था. ऐतिहासिक रूप से सरकारें प्रश्न काल को टालना पसंद करती रही हैं. 1954 में नेहरू सरकार ने 'हिंदू विवाह और तलाक बिल, 1952' के लिए समय निकालने के लिए इसे सस्पेंड कर दिया था. 1976 में तमिलनाडु और नागालैंड में राष्ट्रपति शासन को मंजूरी देने के लिए इसे हटा दिया गया था. 2010 और 2012 में, महंगाई की स्थिति और मल्टी-ब्रांड रिटेल सेक्टर में FDI से जुड़े प्रस्ताव पर चर्चा के लिए समय निकालने के मकसद से इसे नहीं होने दिया गया था.

हो सकता है कि विपक्ष के विरोध के बावजूद कानून पास करवा लेने पर सरकार को संतुष्टि महसूस हो. लेकिन कानून संसद में बहुमत की इच्छा का खतरनाक रूप नहीं हो सकते. वे देश के भले के लिए होते हैं. लोकतंत्र कई स्तरों से बनी व्यवस्था है. इसमें वोटर सबसे नीचे और संसद सबसे ऊपर होती है.
पिछले कुछ दशकों के रुझान बताते हैं कि राजनीतिक पार्टियां लोकतांत्रिक ढांचे के सबसे ऊपरी हिस्से, यानी संसद को कमजोर करने की साजिश में चुपचाप शामिल हो गई हैं. उन्होंने जवाबदेह लोकतंत्र के इस मंदिर को दरकिनार करना सीख लिया है और दूसरे तरीकों से चुनाव जीत रही हैं.
20 अप्रैल, 1653 को ब्रिटिश गृह युद्ध के दौरान संसदीय कमांडर लेफ्टिनेंट-जनरल ओलिवर क्रॉमवेल ने लंदन में 'रम्प पार्लियामेंट' को जबरन भंग कर दिया था. वे हथियारों से लैस सैनिकों के साथ अंदर गए और सांसदों से यह कहते हुए चले जाने का आदेश दिया: "आप यहां बहुत लंबे समय से बैठे हैं, जबकि आपने कोई खास अच्छा काम नहीं किया है. मैं कहता हूं, चले जाइए और हमें आपसे छुटकारा पाने दीजिए. भगवान के नाम पर, चले जाइए."
हमें अपनी संसद में भी ओलिवर क्रॉमवेल जैसे किसी पल की जरूरत है.
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