Explainer: क्यों सबसे ज्यादा आबादी होने के बाद भी पंजाब में कमजोर हैं दलित, राजनीति में तो किनारे ही लगे

आखिर पंजाब की आबादी में एक तिहाई हिस्सेदारी होने के बाद भी दलित राजनीति कमजोर क्यों है. आइए जानते हैं, इसकी वजहें...

उत्तर प्रदेश, बिहार जैसे राज्यों में दलित राजनीति का अपना एक वर्चस्व रहा है. पिछली पीढ़ी के कांशीराम, रामविलास पासवान और मायावती जैसे नेता हों या फिर चंद्रशेखर आजाद और चिराग पासवान जैसे नई जनरेशन के लीडर हों. इन नेताओं की अपनी एक अपील रही है और इसके कारण दलित वोटों की भी बिहार में अहमियत रही है. वहीं दलित आबादी के अनुपात के लिहाज से देश के सबसे अग्रणी राज्यों में से एक पंजाब में ऐसी स्थिति नहीं है. यह देश भर के लोगों के लिए कौतूहल का विषय रहा है कि आखिर 32 फीसदी दलित आबादी वाले राज्य में राजनीति के केंद्र में यह समुदाय क्यों नहीं है. 

यही नहीं शिक्षा, सामाजिक प्रभाव और आर्थिक स्थिति के मामले में भी दलित यहां कमजोर स्थिति में हैं. पंजाब सरकार के कैबिनेट में भी उनकी भागीदारी कम रही है. पंजाब के 96.6 फीसदी दलित ऐसे हैं, जिनके पास कोई कृषि भूमि नहीं है. इनमें से करीब 60 फीसदी ऐसे हैं, जो सिख पंथ को मानते हैं फिर भी वे अछूत हैं और उन्हें भेदभाव का सामना करना पड़ता है. राज्य में कुल 117 विधानसभाएं हैं और इनमें से 34 सीटें दलितों के लिए आरक्षित हैं. दलित समुदाय के विधायकों की संख्या विधानसभा में मायने रखती है और किसी भी सरकार के लिए अहम है. फिर भी उन्होंने कभी पंजाब पर शासन नहीं किया. 

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ऐसा इसलिए क्योंकि इनकी आबादी भी अलग-अलग जातियों में विभाजित है. इसके अलावा हिंदू और सिख का भेद भी है. एक तरफ दलित वोटों का विभाजन है तो वहीं पंजाब में जट सिखों की सामाजिक व्यवस्था पर मजबूत पकड़ है. ऐसा इसलिए क्योंकि खेती की ज्यादातर जमीनें उनके नियंत्रण में हैं. इसके अलावा गुरुद्वारों समेत तमाम संस्थानों और ग्रामीण व्यवस्था पर भी उनकी पकड़ अधिक है. भगवंत मान की कैबिनेट में 5 दलित नेता शामिल हैं. इनमें हरपाल सिंह चीमा, डॉ. बलजीत कौर, लालचंद कटारुचक, रवजोत सिंह और मोहिंदर भगत शामिल हैं. यह आंकड़ा कैबिनेट के कुल 18 मंत्रियों के 27 फीसदी के बराबर है. 

इससे पहले कांग्रेस की सरकार में तीन मंत्री थे. हालांकि एक तथ्य यह भी है कि चरणजीत सिंह चन्नी को सीएम बनाया गया था और वह राज्य के पहले दलित सीएम थे. वहीं 2017 तक चली अकाली-भाजपा सरकार में भी दलित मंत्रियों की संख्या तीन थी. फिर चन्नी को 2022 में कांग्रेस ने सीएम ही बना दिया था, लेकिन इससे वह दलित वोटों को भी एक हद से ज्यादा साध नहीं पाई. उसे 31 फीसदी दलितों के ही वोट मिले, जबकि AAP को 38 फीसदी दलितों के मत मिले थे. पंजाब एक एकमात्र दलित सीएम चरणजीत सिंह चन्नी के नेतृत्व में कांग्रेस को हार मिली थी और अब भी वह ऐसी स्थिति में नहीं हैं कि यह कहा जाए कि आगामी चुनाव में वही पंजाब कांग्रेस का नेतृत्व करेंगे.

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वहीं जाट समुदाय की पंजाब में 22 से 22 फीसदी की ही आबादी है, लेकिन उनका प्रतिनिधित्व अच्छा खासा है. रोचक बात यह भी है कि बसपा की शुरुआत पंजाब से ही हुई थी और कांशीराम भी यहीं के रहने वाले थे. लेकिन बसपा कभी भी पंजाब में बहुत मजबूत नहीं रही. यहां दलित समुदाय के लोग मुख्य तौर पर अलग-अलग पार्टियों को वोट देते रहे हैं. इनमें कांग्रेस, अकाली दल और अब आम आदमी पार्टी शामिल हैं. बसपा को तो यहां 2022 में 2 फीसदी से भी कम वोट मिले थे. 

32 फीसदी आबादी के बाद भी दलितों का राजनीतिक वर्चस्व क्यों नहीं

पंजाब में भले ही दलित आबादी 32 फीसदी है, लेकिन उनके पास कुल जमीन में 3.5 फीसदी ही हिस्सेदारी है. पंजाब विलेज कॉमन लैंड एक्ट, 1964 के अनुसार शामलात भूमि यानी ग्राम समाज की एक तिहाई जमीन दलितों के लिए तय की गई है. लेकिन यह प्रावधान कागजों पर ही है. जमीन पर यह ढंग से लागू नहीं हो सका है. भूमिहीन होने के चलते दलितों का विकास होने में मुश्किल आई है. गांवों में रहने वाले दलितों का 73 फीसदी हिस्सा  भूमिहीन है. यही नहीं जमीनें आदि न होने के चलते इनकी कमाई कम है और अन्य समुदायों की तरह बच्चों के विदेश जाने की संभावनाएं भी नहीं हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि उनके पास कमाई के साधन ही कम हैं. एक सच यह भी है कि भले ही सिख पंथ में समानता की बात होती है, लेकिन जातिवाद यहां भी एक सच्चाई है. जाट सिखों या फिर अन्य उच्च जातियों द्वारा स्थापित गुरुद्वारों में इनको प्रवेश नहीं मिल पाता. एक स्टडी के अनुसार सिख बने दलितों ने ही 10 हजार गुरुद्वारे स्थापित किए हैं और रविदास डेरे बनाए हैं. ऐसा इसलिए कि कम से कम मजहबी मामलों में उनकी स्वायत्तता रहे. यही नहीं दलितों का बड़ी संख्या में ईसाइयत में भी कन्वर्जन हो रहा है. 

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दोआबा के दलितों की बात अलग, विदेश भी जा रहे बच्चे

भले ही पंजाब के ज्यादातर हिस्सों में दलितों की स्थिति कमजोर है, लेकिन दोआबा क्षेत्र का माहौल अलग है. यहां कई गांव ऐसे हैं, जहां दलितों की आबादी 40 से 65 फीसदी तक है. इसके अलावा शहरी जिंदगी का एक्सपोजर, रोजगार के चलते वे मजबूत हैं. यही नहीं यहां से विदेश जाने वाले दलितों की भी अच्छी खासी संख्या है. इसके चलते वे खेती कम होने के बाद भी मजबूत स्थिति में हैं. हालांकि चुनावी राजनीति में इसका असर कम दिखता है. ऐसा इसलिए क्योंकि दलित समाज यहां जाति और धर्म में भी बंटा है.