OPINION: बांकीपुर की जीत से प्रशांत किशोर को क्या मिला, भाजपा के लिए तो चिंताजनक संकेत

प्रशांत किशोर की चुनाव लड़ाने की पेशेवर योग्यता अब उनके काम आ रही है. वह जनता के मन को पढ़ने में माहिर हैं.

OPINION: बांकीपुर की जीत से प्रशांत किशोर को क्या मिला, भाजपा के लिए तो चिंताजनक संकेत

चुनावों के बारे में कई बार उनका आकलन छोटे या बड़े के आधार पर गलत हो जाता है. लोकसभा चुनाव के नतीजे को लोग ऐतिहासिक मान लेते हैं, लेकिन उपचुनाव को स्थानीय असंतोष या सफलता के रूप में माना जाता है. लेकिन राजनीति के संदेश यहीं तक सीमित नहीं रहते. इसके मायने कई बार गहरे होते हैं और चुनाव जिस क्षेत्र में हो रहा होता है, उससे भी परे होते हैं. कई बार एक ही सीट से निकला राजनीतिक संदेश बड़े क्षेत्र में असर डालता है. बिहार की बांकीपुर विधानसभा सीट ऐसी ही है. सोमवार को प्रशांत किशोर को बांकीपुर से 19 हजार वोटों से जीत मिली है. इससे बिहार विधानसभा का गणित नहीं बदलेगा. इसके अलावा किसी एक उपचुनाव के नतीजे को केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के लिए जनमत के तौर पर देखा जा सकता. विपक्ष के भविष्य का आकलन भी इससे नहीं हो सकता. लेकिन इसके मायने फिर भी काफी अधिक हैं.

यदि हम दतिया सीट के नतीजे को भी इससे जोड़ लें तो फिर दिखता है कि कैसे हिंदी बेल्ट में भाजपा को झटका लगा है. विशेष तौर पर अमित शाह, नरेंद्र मोदी और नितिन नवीन की तिकड़ी के लिए यह झटका है. दतिया की पूर्वी सीमा यूपी के झांसी से लगती है. ऐसे में इसका असर यूपी चुनाव पर भी पड़ेगा. इसलिए यह भले ही शुरुआती संकेत हैं, लेकिन दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी के लिए चिंताजनक हैं. दतिया सीट की हार के लिए भाजपा आंतरिक कलह को वजह नहीं बता सकती. ऐसा इसलिए क्योंकि कांग्रेस में भी ऐसी स्थिति थी. यहां तो पूर्व विधायक राजेंद्र भारती को कांग्रेस ने निलंबित ही कर दिया है. 

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इसी तरह बांकीपुर के नतीजे ने प्रशांत किशोर की राजनीतिक पहचान को बदल दिया है. अब तक वह जीत के पीछे रहने वाले शख्स थे. हार, जीत, नारे, समीकरण, कैंपेन आदि में उनकी भूमिका रहती थी. वह बताया करते थे कि कोई क्यों जीता और क्यों हारा. अब उन्होंने अपना सामर्थ्य चुनावी समर में दिखाया है. यह बदलाव मायने रखता है. भारत की राजनीति में सलाहकारों की कमी है, लेकिन चुनाव लड़ना अलग बात है. प्रशांत किशोर ने अब उस रेखा को पार किया है. वह उस जगह पहुंचे हैं, जहां उन्होंने खुद को चुनाव में साबित किया है. बांकीपुर से उन्हें सिर्फ विधायकी नहीं मिली है बल्कि एक आधार मिला है.  

कुछ महीनों में पीके ने क्या बदल डाला, जिसकी सुनाई देगी धमक

बांकीपुर के चुनावी इतिहास को देखते हुए इस नतीजे की अहमियत और बढ़ जाती है. 1995 से ही भाजपा का यहां कब्जा रहा है. तब इसका ज़्यादातर हिस्सा पटना वेस्ट विधानसभा क्षेत्र का हिस्सा था. नितिन नवीन ने 2025 के बिहार चुनाव में लगातार पांचवीं बार बांकीपुर सीट जीती थी. उन्हें 98,299 वोट मिले और उन्होंने RJD की रेखा कुमारी को 51,936 वोटों से हराया था। जन सुराज की वंदना कुमारी सिर्फ़ 7,717 वोटों के साथ काफ़ी पीछे तीसरे स्थान पर रही थीं. अब उसी बांकीपुर से पीके ने बड़ी जीत पा ली है. नितिन नवीन को 2020 में 59% वोट यहां मिले थे. उन्होंने कांग्रेस उम्मीदवार लव सिन्हा को 39,036 वोटों से हराया था. इससे पहले 2015 में वह 39,767 वोटों से जीते थे. ये जीतें विपक्ष के वोटों के बंटवारे की वजह से नहीं मिली थीं। ये भाजपा और बांकीपुर के शहरी, मध्यम-वर्गीय और पारंपरिक रूप से भाजपा समर्थक मतदाताओं के बीच बने मज़बूत रिश्ते को दिखाती थीं। लेकिन प्रशांत किशोर ने बिहार विधानसभा चुनाव में जन सुराज की करारी हार के नौ महीने के भीतर ही उस रिश्ते को बदल दिया. उनकी पार्टी ने 2025 में 238 सीटों पर चुनाव लड़ा था और एक पर भी जीत नहीं मिली थी. उसे पूरे स्टेट में 3.44% वोट ही मिले थे और 68 सीटों पर तो NOTA उससे आगे था. 

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नितिन नवीन जैसा चुनाव क्यों नहीं लड़ पाए नीरज सिन्हा

अब उस चुनाव को कुछ ही महीने बीते हैं और बांकीपुर ने रातों-रात चीजें बदल दी हैं. बेशक, कुछ बातों पर ध्यान देना ज़रूरी है। उपचुनाव में वोटिंग प्रतिशत 34.3% रहा, जबकि 2025 के विधानसभा चुनाव में यह 41.45% था। कम वोटिंग वाले चुनावों में ज़बरदस्त कोशिश, बेहतर संगठन और उम्मीदवार के लिए खास उत्साह का फ़ायदा मिलता है। भाजपा नितिन नवीन के बिना भी अपनी सीट बचाने की कोशिश कर रही थी, जिनका निजी नेटवर्क पार्टी के संगठन से इतर भी था. इस बार उसकी कमी दिखी. फिर पार्टी ने अचानक उम्मीदवार बदलकर नीरज कुमार सिन्हा को मैदान में उतारा, लेकिन उनके पास न तो नितिन नवीन जैसी पहचान थी और न ही किशोर जैसी राष्ट्रीय स्तर की शोहरत. 

प्रशांत किशोर की दूर हुई एक शिकायत

प्रशांत किशोर की चुनाव लड़ाने की पेशेवर योग्यता अब उनके काम आ रही है. वह जनता के मन को पढ़ने में माहिर हैं. वह समझते हैं कि कैसे 2014 का नरेंद्र मोदी का चुनाव भाजपा से बड़ा हो गया था. कैसे 2015 में नीतीश कुमार ने चुनाव को क्षेत्रीय अस्मिता का सवाल बना दिया था. इसके बाद उन्होंने अमरिंदर सिंह, जगनमोहन रेड्डी, अरविंद केजरीवाल, ममता बनर्जी और एमके स्टालिन के साथ चुनाव लड़ा था. पीके ने इन सभी लोगों के साथ काम वैचारिक समानता के चलते नहीं किया था बल्कि एक स्पष्टता थी. वह जानते थे कि जनता से कैसे संवाद करना है. संगठन कैसे खड़ा करना है और उससे कैसे सफलता पानी है. हालांकि फिर भी एक नेता को सलाह देना आसान होता है. प्रशांत किशोर ने इस बार उस चुनौती से पार पाया है. हालांकि एक बहाना भी उनका खत्म हो गया है कि वह संसाधनों की कमी और नए चेहरों के चलते जीत नहीं पा रहे थे. अब भविष्य में जन सुराज के उम्मीदवार ऐसी शिकायत नहीं कर सकेंगे कि उन्हें कोई जानता नहीं है. उन पर पीके की सफलता को दोहराने का दबाव होगा. 

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बांकीपुर की हार भाजपा के लिए अलर्ट

बांकीपुर की डेमोग्राफी भी अहम है, जिस पर ध्यान देने की जरूरत है. यहां के अनुमानित 3.79 लाख वोटरों में से लगभग एक-तिहाई 18 से 29 साल की उम्र के हैं. यह एक शहरी निर्वाचन क्षेत्र है, जिसमें छात्र, कोचिंग सेंटरों में तैयारी करने वाले, पहली नौकरी की तलाश करने वाले, निम्न-मध्यम वर्गीय परिवार और युवा पेशेवर शामिल हैं. ये लोग सरकारी संस्थानों के करीब तो रहते हैं, लेकिन अकसर उनके फायदों से खुद को दूर महसूस करते हैं.
उनकी नाराज़गी अब सिर्फ़ सुनी-सुनाई बातें नहीं रह गई हैं. पिछले साल भारत में युवाओं की आधिकारिक बेरोज़गारी दर 9.9% थी, जो कुल बेरोज़गारी दर (3.1%) से तीन गुना ज़्यादा है. फिर पेपर लीक, रुकी हुई भर्तियां, महंगी कोचिंग जैसी परेशानियों ने उनके गुस्से को और बढ़ाया है. फिर इसी बीच कॉकरोच पार्टी का आंदोलन हुआ तो वह भी एक संकेत है. ये युवा किसी मजहबी टकराव की बजाय बेहतर शासन के बारे में बात करते हैं. शायद ऐसे लोगों को साधने में पीके ने सफलता पाई है और यह वोटर भाजपा की बजाय उनकी ओर मुड़ गया. अब देखना होगा कि भविष्य में कैसे पीके इन लोगों को अपने साथ साधे रह पाते हैं. 

भाजपा का संगठन मजबूत, मोदी भी लोकप्रिय; पर युवाओं के सवाल अलग

अब बात करें इस नतीजे के संदेश की तो बांकीपुर के चुनाव ने पुराने गणित को तोड़ा है. यह आरजेडी के लिए झटका है तो भाजपा के लिए हार है. बीते कई सालों से बिहार की राजनीति एक खास पैटर्न में फंसी रही है. वोटर एनडीए और आरजेडी के बीच पलटी मारता रहा है. उनके पास विकल्प की कमी रही है और उसी का फायदा उठाकर इतने अरसे तक नीतीश कुमार सीएम रहे थे. अब यह समीकरण बदला है और एक नया विकल्प उभरा है. खासतौर पर शहरी और युवा वोटर के दोनों खेमों से छिटक कर पीके के पास जाने की संभावना है. यही कारण है कि भाजपा की हार के साथ ही यह आरजेडी के लिए भी चैलेंज है. वहीं कांग्रेस के लिए यह मौका है कि वह लालू यादव को छोड़कर पीके के साथ गठजोड़ बना ले. फिर भी भाजपा के लिए यह बड़ी चेतावनी है क्योंकि बांकीपुर जैसी सुरक्षित सीट पर उसे हार मिली है. शहरी, उम्मीदों से भरे, मध्यम-वर्गीय, मज़बूत संगठन वाले और कमल को वोट देने के आदी कहे जाने वाले वर्ग से उसे झटका लगा है. पार्टी का संगठन मजबूत है और पीएम मोदी की लोकप्रियता भी है, लेकिन युवा वोटर की नाराजगी के जवाब नहीं मिल पा रहे. इन लोगों ने डिग्रियां पूरी कर ली हैं. पार्टी का कल्याणकारी ढांचा और पीएम मोदी की लगातार बनी हुई लोकप्रियता अभी भी बहुत मज़बूत है। लेकिन इनमें से कोई भी चीज़ उस पढ़े-लिखे युवा वोटर की नाराज़गी का जवाब नहीं देती, जिसने डिग्री पूरी की है, कोचिंग की फ़ीस भरी है, बार-बार परीक्षाएँ दी हैं और फिर भी उसे लगता है कि सुरक्षित नौकरी पाने की सीढ़ी ही हटा ली गई है.

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नतीजे ने साबित किया- चुनाव जीत सकता है रणनीतिकार

हालांकि विपक्ष के लिए बांकीपुर से तुरंत कोई राष्ट्रीय नेतृत्व नहीं निकलने वाला है. किशोर की विचारधारा में लचीलेपन ने उन्हें एक सफल रणनीतिकार बनने में मदद की, लेकिन यह उनकी राजनीतिक कमजोरी भी बनी हुई है. वोटर जानते हैं कि बिहार में वह किसका विरोध करते हैं. उन्हें हमेशा यह नहीं पता होता कि जब राष्ट्रीय मुद्दों पर ऐसे फ़ैसले लेने की जरूरत होगी, जिन्हें सिर्फ प्रशासनिक क्षमता के आधार पर नहीं आंका जा सकता. तब वह क्या करेंगे. किशोर को इस मौके का इस्तेमाल ऐसी पार्टी बनाने के लिए भी करना चाहिए, जो सिर्फ उनकी बुद्धिमानी का विस्तार न हो. राजनीतिक संगठनों को दूसरे स्तर के नेताओं, आंतरिक विवाद सुलझाने की व्यवस्था, स्थानीय वफादारी और संस्थापक की गैर-मौजूदगी में भी टिके रहने की क्षमता की जरूरत होती है. जन सुराज बिहार में एक गंभीर ताकत नहीं बन सकता अगर हर उम्मीदवार को मुकाबले में आने के लिए किशोर की व्यक्तिगत मौजूदगी की जरूरत पड़े. बांकीपुर ने साबित कर दिया है कि एक रणनीतिकार चुनाव जीत सकता है. इसने यह साबित नहीं किया है कि रणनीतिकार सैकड़ों राजनेता भी बना सकता है. यही वह फर्क है जिस पर उनका भविष्य टिका है. यह नतीजा भारत के नाराज युवा वोटरों को एक संभावित आवाज, बिहार को एक संभावित तीसरी ताकत और भाजपा को उसके सबसे सुरक्षित शहरी इलाकों में से एक से चेतावनी देता है. लेकिन एक सीट का मतलब लहर नहीं होता, ठीक वैसे ही जैसे एक सफल कैंपेन का मतलब संगठन नहीं होता. प्रशांत किशोर ने अपना ज़्यादातर करियर राजनेताओं को यह सिखाने में बिताया है कि राजनीतिक मौके को कैसे पहचाना जाए. बांकीपुर उनके लिए मौका है.