आरक्षण पर रार: राजभर और मांझी के बयान ने बीजेपी को कैसे दी बड़ी राहत?
अगर पिछड़े और दलित समाज की ही राजनीति करने वाले एनडीए के सहयोगी नेता बीजेपी के साथ खड़े हो जाते हैं तो पार्टी को विपक्ष के नेरेटिव को काउंटर करने में मदद मिल सकती है.
देश की राजनीति में आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ चुका है. आरक्षण एक ऐसा मुद्दा है, जो बीजेपी के लिए सबसे बड़ी चिंता का सबब बनता है. 2015 का बिहार विधानसभा चुनाव हो, जब मोहन भागवत ने आरक्षण की समीक्षा की बात की थी, या फिर बात हो 2024 के लोकसभा चुनाव की, जब इंडिया गठबंधन ने यह नेरेटिव सेट कर दिया था कि अगर बीजेपी 400 से ज्यादा सीटें जीतती है, तो आरक्षण में बदलाव और संविधान को खत्म कर दिया जाएगा.
आरक्षण को लेकर कौन सा विरोध प्रदर्शन?
अब इसी डर के बीच देश में एक बार फिर आरक्षण की समीक्षा का मुद्दा उठ चुका है. राजधानी दिल्ली में जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन हो रहा है. जंतर-मंतर पर सवर्ण समुदाय के युवा और कुछ सामाजिक संगठन मिलकर ‘आरक्षण सुधार सत्याग्रह' चला रहे हैं. ये लोग आरक्षण की व्यवस्था में बदलाव चाहते हैं. जातिगत आरक्षण को समाप्त कर आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की मांग की जा रही है. प्रदर्शनकारी यह भी चाहते हैं कि एससी-एसटी आरक्षण में क्रीमी लेयर का नियम लागू किया जाना चाहिए.
इन मांगों को लेकर प्रदर्शनकारियों की मुलाकात उत्तर प्रदेश के डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक से भी हो चुकी है. उनकी तरफ से आश्वासन दिया गया है कि सवर्ण समाज की मांगों को वे केंद्र के सामने जरूर रखेंगे.
बीजेपी कैसे फंस गई है?
लेकिन डिप्टी सीएम द्वारा दिया गया यही आश्वासन बीजेपी के लिए गले की फांस बन गया है. बात भले ही आरक्षण की समीक्षा की हो रही है, लेकिन विपक्ष में यहां समीक्षा का मतलब आरक्षण को खत्म करने से निकाला जा रहा है. यानी, अगर आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की मांग हो रही है, तो विपक्ष यह दिखाना चाहता है कि बीजेपी और उसके सहयोगी दल असल में आरक्षण को खत्म करना चाहते हैं.
विपक्ष ने क्या नेरेटिव सेट कर दिया?
समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने तो कह दिया है कि ये लोग आरक्षण सुधार के नाम पर आरक्षण को खत्म करने की साजिश रच रहे हैं. बसपा प्रमुख मायावती ने भी नीयत पर सवाल उठा दिए हैं. आजाद समाज पार्टी के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद ने तो चेतावनी दे डाली है कि अगर आरक्षण से किसी भी तरह की छेड़छाड़ की गई, तो इसे बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.
और विपक्ष की ओर से लगातार बनाए जा रहे इस दबाव के बीच बीजेपी के लिए एक राहत की खबर आई है. उसके दो बड़े सहयोगी दलों के नेता खुलकर आरक्षण की समीक्षा की बात कर रहे हैं. एक बड़ी बात यह भी है कि ये दोनों ही नेता उत्तर भारत के दो सबसे प्रमुख राज्यों से आते हैं.
राजभर-मांझी कैसे बने बीजेपी की संजीवनी?
एक हैं ओम प्रकाश राजभर, जो उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बड़े चेहरे के रूप में स्थापित हैं. वहीं दूसरे नेता हैं जीतन राम मांझी, जो बिहार के मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं और वर्तमान में केंद्र में मंत्री हैं.
मीडिया से बात करते हुए ओम प्रकाश राजभर ने कहा है कि वर्तमान में आरक्षण का लाभ वही लोग हासिल कर रहे हैं, जो असल में मजबूत हैं. लेकिन संविधान में जो आरक्षण दिया गया है, वह कमजोरों को ऊपर उठाने के लिए दिया गया, ताकि वे विकास की मुख्यधारा में आ सकें.
राजभर का कहना है कि आज की तारीख में डीएसपी से लेकर मुख्यमंत्री और राष्ट्रपति के बेटे तक आरक्षण का लाभ उठा रहे हैं. हमें इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि जो लोग आरक्षण का फायदा उठाकर मुख्यधारा में आ चुके हैं, उन्हें अलग किया जाए.
ओपी राजभर ने तो यहां तक कहा कि उनकी पार्टी 2002 से ही मांग कर रही है कि आर्थिक आधार पर आरक्षण मिलना चाहिए.
अब दूसरा बयान, जो बीजेपी के लिए संजीवनी साबित हुआ है, वह जीतन राम मांझी का है. मांझी ने कहा है कि आरक्षण का निष्पक्ष मूल्यांकन होना अब जरूरी हो गया है.
वह कहते हैं कि आरक्षित वर्ग के जिन लोगों ने सामाजिक और शैक्षणिक रूप से प्रगति कर ली है, उनके बच्चे लगातार आगे बढ़ रहे हैं. वहीं दूसरी तरफ अति पिछड़े और अत्यंत वंचित तबके के लोग अभी भी पिछड़े हुए हैं. उनकी साक्षरता दर चिंताजनक है.
मांझी ने सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का हवाला देते हुए कहा है कि उनका पालन होना ही चाहिए. बिहार सरकार को आरक्षण में सब-कोटा लागू कर देना चाहिए, जिससे जरूरतमंदों को आरक्षण का फायदा मिल सके.
मांझी ने हरियाणा और पंजाब का उदाहरण तक दिया है. उनके मुताबिक, पहले की व्यवस्था में आरक्षित वर्ग की गिनी-चुनी चार-पांच प्रमुख जातियों को ही 90 से 99 फीसदी तक सरकारी नौकरियों में हिस्सेदारी मिल जाती थी. लेकिन जब से सब-कोटा लागू हुआ, तब से वंचित तबके को 45 से 55 फीसदी तक हिस्सेदारी मिलने लगी. मांझी चाहते हैं कि बिहार और पूरे देश में यही फॉर्मूला लागू होना चाहिए.
विपक्ष की रणनीति का मिल गया तोड़?
ओपी राजभर और मांझी, दोनों के बयानों में एक चीज समान है. वे आरक्षण को खत्म करने की बात नहीं कर रहे, बल्कि बदलते समय के साथ इसमें बदलाव को देखते हुए इसका मूल्यांकन जरूरी मानते हैं. यह मांग उस बयान से अलग है, जो कुछ दिन पहले चिराग पासवान ने कही थी. चिराग पासवान ने तो यहां तक कह दिया था कि आरक्षण कोई खैरात की चीज नहीं है और इसकी समीक्षा पर विचार करना भी गलत है.
लेकिन एक तरफ ओपी राजभर और दूसरी तरफ जीतन राम मांझी ने साफ कर दिया है कि समय के साथ आरक्षण का मूल्यांकन होना भी जरूरी है. बीजेपी इसे अपने लिए एक तरह की राहत के तौर पर देख रही है.
राजभर की ताकत समझें
बात अगर ओपी राजभर की करें, तो पूर्वांचल में उनकी मजबूत उपस्थिति है. वे ओबीसी समाज का भी एक बड़ा चेहरा हैं. 2001 की सामाजिक न्याय समिति की रिपोर्ट बताती है कि उत्तर प्रदेश में राजभर वोटरों की संख्या करीब 2.40 फीसदी है. वहीं, राजभर पूर्वांचल की अंबेडकरनगर, आजमगढ़, बहराइच, देवरिया, चंदौली और बस्ती जैसी करीब तीन दर्जन सीटों पर अपनी मजबूत उपस्थिति रखते हैं.
ऐसे में अगर ओबीसी समाज से आने वाले ओपी राजभर खुलकर आर्थिक आधार पर आरक्षण की बात करते हैं, तो बीजेपी इसे अपने पक्ष में ले सकती है. क्योंकि विपक्ष जब भी ओबीसी समाज को बीजेपी के खिलाफ करने की कोशिश करेगा, जब भी वह यह नेरेटिव सेट करेगा कि बीजेपी आरक्षण को खत्म करना चाहती है, तब ओपी राजभर का यह बयान मायने रखेगा.
अगर ओपी राजभर ओबीसी जाति के एक वर्ग में लोकप्रिय हैं तो उनके बयान का असर भी उस समुदाय पर पड़ सकता है. ऐसे में बीजेपी को आरक्षण के मुद्दे पर जो नुकसान हो सकता है, उसकी कुछ भरपाई ओपी राजभर के बयान से हो सकती है.
मांझी की ताकत समझें
वहीं, बात अगर जीतन राम मांझी की करें तो उनकी हिंदुस्तान आवाम मोर्चा बिहार में दलित वोट बैंक के सहारे अपनी सियासत करती है. वही दलित वोट बैंक उत्तर प्रदेश में भी एक सक्रिय भूमिका निभाता है. यूपी में दलितों की आबादी करीब 22 से 23 फीसदी है और पश्चिमी यूपी की कई सीटों पर वह निर्णायक भी साबित होता है.
ऐसे में दलित राजनीति के एक बड़े चेहरे जीतन राम मांझी का आरक्षण के मूल्यांकन की बात करना बीजेपी की मदद कर सकता है. अगर ओपी राजभर के जरिए ओबीसी समुदाय के एक हिस्से को अपने साथ रखने का प्रयास हो सकता है, तो मांझी भी चुनावी राज्य यूपी में प्रचार कर दलितों के एक तबके को पार्टी के लिए अपने साथ जोड़ सकते हैं. यहां बड़ी बात यह है कि यूपी की 403 विधानसभा सीटों में से 85 सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं.
आरक्षण मुद्दे कैसे आक्रमक होगी बीजेपी?
समझने वाली बात यह भी है कि अगर ओबीसी और दलित राजनीति करने वाले नेता भी बीजेपी का समर्थन कर देते हैं,तो उस स्थिति में बीजेपी अपने परंपरागत सवर्ण वोटरों को भी एकजुट रख सकती है. इस समय आरक्षण के मुद्दे की वजह से सवर्ण समाज में बीजेपी से नाराजगी है. वह मांग कर रहा है कि आर्थिक आधार पर आरक्षण दिया जाए. अभी तक तो बीजेपी ने इस मुद्दे पर खुलकर कोई स्टैंड नहीं लिया था. लेकिन अब जब ओपी राजभर और जीतन राम मांझी जैसे नेता इसके समर्थन में उतर चुके हैं, तो पार्टी के लिए भी स्थिति थोड़ी सहज हो गई है.
एक तरफ बीजेपी अपने कोर वोटर को साथ रख सकती है, तो वहीं दूसरी तरफ गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलितों को भी अपने पाले में खींच सकती है. अभी तक बीजेपी को इस बात की चिंता थी कि आरक्षण के मुद्दे की वजह से एक तरफ उसका कोर वोटर सवर्ण समाज उससे नाराज हो सकता है, वहीं दूसरी तरफ ओबीसी और दलित समाज भी उससे रूठ सकता है.
लेकिन अगर पिछड़े और दलित समाज की ही राजनीति करने वाले एनडीए के सहयोगी नेता बीजेपी के साथ खड़े हो जाते हैं तो पार्टी को विपक्ष के नेरेटिव को काउंटर करने में मदद मिल सकती है.
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