रामायण ट्रेलर: शूर्पणखा को लेकर तुलसीदास और वाल्मीकि ने क्या बताया, कैसी दिखती थी रावण की बहन?

इस बहस का जन्म लेना कि शूर्पणखा, सीता से ज्यादा सुंदर दिखाई दे रही है, यह बताने के लिए काफी है कि रामायण के मेकर्स कहीं तो चूक गए हैं. कहीं ऐसा तो नहीं जाने-अनजाने में मेकर्स ने राक्षसी शूर्पणखा का ज्यादा ही महिमामंडन कर दिया हो?

रामायण ट्रेलर: शूर्पणखा को लेकर तुलसीदास और वाल्मीकि ने क्या बताया, कैसी दिखती थी रावण की बहन?
रामायण ट्रेलर में शूर्पणखा बनीं रकुल प्रीत सिंह

नितेश तिवारी निर्देशित रामायण की चर्चा काफी ज्यादा हो रही है. एक इसका बजट इसे ट्रेंड में ला रहा है, दूसरा इसका रायमण को दर्शाने का अंदाज भी सोशल मीडिया पर नई बहस को जन्म दे चुका है. इस 4000 करोड़ी फिल्म में भव्यता तो दिखाई दे रही है, लेकिन यह तथ्यों से कितनी जुड़ी हुई है, भावनाओं को कितना छू सकती है, इसे लेकर विवाद है. 

इस रामायण में सिर्फ राम और सीता को जिस तरह से दिखाया गया है, इस पर विवाद नही है. लोगों की प्रतिक्रिया से पता चल रहा है कि राक्षसी शूर्पणखा का भी ट्रेलर में जैसा वर्णन किया गया है, उससे सब खुश नहीं है. इस बहस का जन्म लेना कि शूर्पणखा, सीता से ज्यादा सुंदर दिखाई दे रही है, यह बताने के लिए काफी है कि मेकर्स कहीं तो चूक गए हैं. कहीं ऐसा तो नहीं जाने-अनजाने में मेकर्स ने राक्षसी शूर्पणखा का ज्यादा ही महिमामंडन कर दिया हो?

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अब ट्रेलर अपनी जगह है, लेकिन अगर राक्षसी शूर्पणखा का असल चरित्र समझना है तो हमें वाल्मीकि रामयण और तुलसीदास की रामचरितमानस का रुख करना होगा. वहां काफी विस्तृत तरीके से शूर्पणखा के बारे में बताया गया है.

तुलसीदास ने कैसे किया शूर्पणखा का वर्णन?

गोस्वामी तुलसीदास की रामचरितमानस के अरण्य काण्ड में शूर्पणखा का वर्णन मिलता है. इस अध्याय में पिता दशरथ द्वारा वनवास मिलने के बाद श्री राम, अपने भाई लक्ष्मण और पत्नी सीता के साथ वन-वन भटकते हैं. इसी यात्रा के दौरान वे पंचवटी पहुंचते हैं जहां एक कुटिया बना कई साल व्यतीत करते हैं. वो जगह इतनी मनोहर होती है कि वहा किसी अप्रिय घटना के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता.

लेकिन तभी पंचवटी में राक्षसी शूर्पणखा आती है और वो श्रीराम के अद्वितीय सौन्दर्य को देख चकित रह जाती है.तुलसीदास ने शूर्पणखा को अनियंत्रित वासना, अहंकार और छल के रूप में चित्रित किया है. पंचवटी में हुई घटना को लेकर वे लिखते हैं-

सूपनखा रावन कै बहिनी। दुष्ट हृदय दारुन जस अहिनी॥
पंचबटी सो गइ एक बारा। देखि बिकल भइ जुगल कुमारा

अर्थ:शूर्पणखा रावण की एक बहन थी, वो नागिन के समान भयानक और दुष्ट हृदय वाली थी। वो एक बार पंचवटी गई और दोनों राजकुमारों राम और लक्ष्मण को देख काम से पीड़ित हो गई.

 भ्राता पिता पुत्र उरगारी। पुरुष मनोहर निरखत नारी॥
होइ बिकल सक मनहि न रोकी। जिमि रबिमनि द्रव रबिहि बिलोकी

अर्थ: यहां काकभुशुण्डि जी गरुड़ जी को बता रहे हैं कि किसी सुंदर और मनमोहक पुरुष को अगर काम से मोह स्त्रि अगर देख भी ले तो वो भाई, पिता या पुत्र जैसे रिश्तों का भी विचार त्याग देती है और अपने मन को नहीं रोक पाती है.

रुचिर रूप धरि प्रभु पहिं जाई। बोली बचन बहुत मुसुकाई॥
तुम्ह सम पुरुष न मो सम नारी। यह सँजोग बिधि रचा बिचारी॥

अर्थ: शूर्पणखा प्रभु राम के निकट जाती है और मुस्कुराकर बोलती है- न तो तुम्हारे समान कोई पुरुष है, न मेरे समान इस संसार में कोई स्त्री. विधाता ने यह संयोग बहुत सोच-समझकर तैयार किया है.

मम अनुरूप पुरुष जग माहीं। देखेउँ खोजि लोक तिहु नाहीं॥
तातें अब लगि रहिउँ कुमारी। मनु माना कछु तुम्हहि निहारी॥

अर्थ: तुलसीदास यहां बताते हैं कि शूर्पणखा अहंकार से चूर है, उसे अपने आगे कोई दिखाई नहीं देता. वो श्रीराम से कहती है इस संसार में मेरे योग्य पुरुष है ही नहीं, मैंने तीनों लोकों को खोज लिया है. इसी वजह से मैं अब तक अविवाहित रही हूं. लेकिन अब तुमको देख मेरा मन ठहर सा गया है. 

सीतहि चितइ कही प्रभु बाता। अहइ कुआर मोर लघु भ्राता॥
गइ लछिमन रिपु भगिनी जानी। प्रभु बिलोकि बोले मृदु बानी॥

अर्थ: जैसे ही शूर्पणखा अपना विवाह प्रस्ताव श्रीराम के समक्ष रखती है, भगवान माता सीता की ओर देखते हैं और फिर कहते हैं- मेरा छोटा भाई अभी भी अविवाहित है. जैसे ही शूर्पणखा लक्ष्मण के पास गई, लक्ष्मण ने श्रीराम की तरफ देखा और मीठे स्वर में बोला.

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सुंदरि सुनु मैं उन्ह कर दासा। पराधीन नहिं तोर सुपासा॥
प्रभु समर्थ कोसलपुर राजा। जो कछु करहिं उनहि सब छाजा॥7॥

अर्थ: शूर्पणखा को अपने निकट आते देख लक्ष्मण कहते हैं- हे सुंदरी! मैं तो अपने प्रभु का दास मात्र हूं. मैं पराधीन हूं, मैं तुम्हें कोई सुख नहीं दे सकता.मेरे प्रभु समर्थ हैं, वो तो कोसलपुर के राजा हैं, वे जो कुछ करें, उन्हें तो सब फबता है.

सेवक सुख चह मान भिखारी। ब्यसनी धन सुख गति विभिचारी।।
लोभी जसु चह चार गुमानी। नभ दुहि दूध चहत ए प्रानी।।

अर्थ: अब यहां पर लक्ष्मण सिर्फ शूर्पणखा के प्रस्ताव को मना नहीं करते हैं बल्कि सच्चाई का आईना दिखाते हुए छह ऐसे पुरुषों के बारे में बताते हैं जिनकी कुछ इच्छाएं कभी पूरी नहीं हो सकती हैं. लक्ष्मण कहते हैं कि दास, भिखारी, नशा करने वाला, व्यभिचारी, लोभी और अभिमानी पुरुष की सभी इच्छाएं कभी पूरी नहीं होतीं.

पुनि फिरि राम निकट सो आई। प्रभु लछिमन पहिं बहुरि पठाई॥
लछिमन कहा तोहि सो बरई। जो तृन तोरि लाज परिहरई॥9॥

अर्थ: लक्ष्मण की ये बातें सुन शूर्पणखा वापस भगवान राम के पास ही उम्मीद के साथ जाती है, लेकिन वे फिर उसे लक्ष्मण के पास ही भेज देते हैं. उसे वापस आता देख लक्ष्मण व्यंगात्मक तरीके से कह देते हैं- तुम्हें सिर्फ वही अपना सकता है जो अपनी लाज-शर्म को तिनके के समान तोड़कर फेंक देगा.

तब खिसिआनि राम पहिं गई। रूप भयंकर प्रगटत भई॥
सीतहि सभय देखि रघुराई। कहा अनुज सन सयन बुझाई॥10॥

अर्थ: लक्ष्मण जी की बात सुन शूपर्णखा क्रोधित हो गई, उसने अपना असल राक्षसी रूप दिखा दिया. उसका वो भयंकर रूप देख माता सीता भयभीत हो गईं. सीता जी को सहमा देख श्रीराम ने लक्ष्मण को इशारा किया.

लछिमन अति लाघवँ सो नाक कान बिनु कीन्हि।
ताके कर रावन कहँ मनौ चुनौती दीन्हि॥॥

अर्थ: भगवान राम से जैसे ही इशारा मिला, लक्ष्मण जी ने तुरंत अपनी तलवार निकाली और राक्षसी शूर्पणखा के नाक-कान काट दिए. ऐसा प्रतीत हुआ कि उन्होंने सीधे रावण को चुनौती देने का काम किया.

अब गोस्वामी तुलसीदास ने शूर्पणखा का जो चरित्र दिखाया है, वहां उसकी सुंदरता की कोई चर्चा नहीं है बल्कि यह बताने का प्रयास है कि वासना से लिप्त एक क्रूर स्त्रि किस तरह से मर्यादाओं को तार-तार करते हुए किसी भी हद तक जा सकती है.

गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस में शूर्पणखा के चरित्र का वर्णन करते हुए उसकी सुंदरता की चर्चा नहीं की है। इससे उलट एक ऐसी स्त्री के रूप में उसे चित्रित किया गया है जो कामासक्ति और अहंकार से प्रेरित होकर मर्यादाओं का उल्लंघन करने से भी परहेज नहीं करती है. वो अपनी इच्छा की पूर्ति के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार रहती है.

वाल्मीकि रामायण में शूर्पणखा का कैसा वर्णन?

सुमुखं दुर्मुखी रामं वृत्तमध्यं महोदरी॥९॥
विशालाक्षं विरूपाक्षी सुकेशं ताम्रमूर्धजा।
प्रियरूपं विरूपा सा सुस्वरं भैरवस्वना

अर्थ: वाल्मीकि रामयण के अरण्यकाण्ड (सर्ग 17, श्लोक 10) के माध्यम से राक्षसी शूर्पणखा और भगवान राम दोनों की तुलना की गई है। एक तरफ श्रीराम का मुख शीतल और अत्यंत ही सुंदर था, वहीं शूर्पणखा उतनी भद्दी और कुरूप थी. भगवान राम का मध्यभाग क्षीण था, वहीं शूर्पणखा लंबे पेटवाली थी. श्रीराम की आंखें बड़ी और मनोहर प्रतीत हो रही थीं, वहीं शूर्पणखा की उतनी ही डराने वाली थीं. भगवान राम के केश चिकने थे, सुंदर थे, वहीं शूर्पणखा के केश तांबे जैसे लाल हो चुके थे.

तरुणं दारुणा वृद्धा दक्षिणं वामभाषिणी।
न्यायवृत्तं सुदुर्वृत्ता प्रियमप्रियदर्शना॥११॥

अर्थ: वाल्मीकि आगे तुलना करते हुए बताते हैं कि श्रीराम तो बिल्कुल सौम्य स्वभाव के थे, लेकिन शूर्पणखा निशाचरी क्रूर और हजारों वर्षों की एक बढ़िया समान थी. भगवान राम जहां उदार थे, शूर्पणखा कुटिलता से भरी थी.

विकृता च विरूपा च न सेयं सदृशी तव।
अहमेवानुरूपा ते भार्यारूपेण पश्य माम्॥२६॥

अर्थ: जब शूर्पणखा, श्रीराम के पास आती है, वो माता सीता का अपमान करने लगती है. वो भगवान राम से विवाह करने हेतु सीता जी को विकारयुक्त और कुरूपा बता देती है. वो भगवान राम को कहती है कि सीता आपके योग्य नहीं है और आपको मुझे अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लेना चाहिए.

इमां विरूपामसतीं कराला निर्णतोदरीम्।
अनेन सह ते भ्रात्रा भक्षयिष्यामि मानुषीम्॥ २७॥

अर्थ: शूर्पणखा आगे कहती है- मेरी नजर से देखो तो ये सीता कुरूप, ओछी, विकृत, धंसे हए पेटवाली और मानवी प्रतीत होती है, मैं इसे तुम्हारे भाई के साथ ही खा जाऊंगी.

जब श्रीराम ने शूर्पणखा का प्रस्ताव ठुकरा दिया और लक्ष्मण जी ने उपहास उड़ाया, राक्षसी ने क्रोधित होकर माता सीता पर ही हमला किया. इस अध्याय का जिक्र गोस्वामी तुलसीदास जी की रामायण में तो नहीं मिला, लेकिन वाल्मीकि रामायण में जरूर है.

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इमां विरूपामसती कराला निर्णतोदरीम्।
वृद्धां भार्यामवष्टभ्य न मां त्वं बह मन्यसे॥१५॥
अद्येमां भक्षयिष्यामि पश्यतस्तव मानुषीम्।
त्वया सह चरिष्यामि निःसपत्ना यथासुखम्॥ १६॥

अर्थ: शूर्पणखा कहती है- राम! तुम इस कुरूप, ओछी, विकृत का आश्रय लेकर मेरा विशेष आदर नहीं कर रहे हो.इसलिए आज ही तुम्हारे सामने मैं इस मानुषी को खा जाऊंगी. उसकी मौत के बाद मैं तुम्हारे साथ सुखी से जीवन व्यतीत करूंगी.

इत्युक्त्वा मृगशावाक्षीमलातसदृशेक्षणा।
अभ्यगच्छत् सुसंक्रुद्धा महोल्का रोहिणीमिव॥ १७॥

अर्थ: शूर्पणखा ने क्रोध में आकर माता सीता पर हमला किया, उसने उन्हें पकड़ने की कोशिश की. इस घटना की तुलना वाल्मीकि ने भारी उल्का से की जो रोहिणी नामक तारे पर टूट पड़ी.

तां मृत्युपाशप्रतिमामापतन्तीं महाबलः।
विगृह्य रामः कुपितस्ततो लक्ष्मणमब्रवीत्॥ १८॥
क्रूरैरनार्यैः सौमित्रे परिहासः कथंचन।
न कार्यः पश्य वैदेहीं कथंचित् सौम्य जीवतीम्॥ १९॥
इमां विरूपामसतीमतिमत्तां महोदरीम्।
राक्षसी पुरुषव्याघ्र विरूपयितुमर्हसि ॥२०॥

अर्थ: शूर्पणखा को सीता के निकट जाते देख श्रीराम ने लक्ष्मण जी से कहा- क्रूर कर्म करने वाले अनार्यों से किसी प्रकार का परिहास कभी नहीं करना चाहिए. इस कुरूपा, कुलटा, लंबे पेटवाली राक्षसी को किसी अङ्ग से हीन कर देना चाहिए.

इत्युक्तो लक्ष्मणस्तस्याः क्रुद्धो रामस्य पश्यतः।
उद्धृत्य खड्गं चिच्छेद कर्णनासे महाबलः॥ २१॥

अर्थ: भगवान राम के निर्देश मिलते ही आगबबूला लक्ष्मण जी ने अपनी मयान से तलवार निकाली और शूर्पणखा के नाक और कान काट दिए.

अब महर्षि वाल्मीकि ने कहीं भी राक्षसी शूर्पणखा को सुंदर नहीं बताया है, उन्होंने उसे भयानक और कामरूपिणी कहकर संबोधित किया है. इसी तरह गोस्वामी तुलसीदास ने भी शूर्पणखा की क्रूरता का प्रमुखता से वर्णन किया है, उसकी सुंदरता का महिमामंडन कहीं नहीं किया गया है.

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