OTT पर छाई एलन रिच्सन की War Machine, 1 घंटे 49 मिनट की फिल्म में हैं रूह कंपाने वाले खतरनाक सीन

War Machine एक ऐसी कहानी है, जिसमें वर्दी पहने अमेरिकी सैनिक नायक होते हैं और उनकी मौत शहादत बन जाती है, लेकिन इसी कहानी के मलबे के नीचे एक और दुनिया दफन है.

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OTT पर छाई एलन रिच्सन की War Machine
नई दिल्ली:

नेटफ्लिक्स पर हॉलीवुड की फिल्म War Machine की इन दिनों चर्चा हो रही है और उसका कारण यह है कि फिल्म अमेरिकी सैनिकों और मशीन के बीच युद्ध को लेकर बनाई गई है. Israel, America, Iran युद्ध के समय फिल्म एक खास विषय को लेकर ध्यान खींचती है, दशकों से हॉलीवुड युद्ध को सैन्य कार्रवाई की जगह नैतिक कहानी के रूप में पेश करता रहा है. यह ऐसी कहानी होती हैं जिसमें वर्दी पहने अमेरिकी सैनिक नायक होते हैं और उनकी मौत शहादत बन जाती है, लेकिन इसी कहानी के मलबे के नीचे एक और दुनिया दफन है. वहां ईरान के स्कूल में दफन हुए 165 बच्चों की लाशें हैं जो कभी किसी सेना या राजनीति का हिस्सा नहीं थे.

नैरेटिव की राजनीति: ‘नायक' बनाम ‘कोलेटरल डैमेज'

हमेशा से सिनेमा सिर्फ मनोरंजन नहीं है. यह धारणाएं बनाने का सबसे असरदार जरिया भी रहा है. हॉलीवुड ने दुनिया के सामने युद्ध का एक अलग नैरेटिव रचा है. इस नैरेटिव में अगर कोई पश्चिमी सैनिक मरता है तो उसे 'शहीद' का दर्जा मिलता है. उस पर फिल्में बनती हैं और वह पूरी दुनिया की सामूहिक सहानुभूति बटोरी जाती है. शहीदों का सम्मान होना गलत भी नहीं है लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू भयावह है. ईरान या गाजा के युद्धग्रस्त इलाकों में जब मिसाइलें मासूमों के घरों पर गिरती हैं तो वहां मारे गए बच्चों को मात्र दो शब्दों के तकनीकी शब्द में समेट दिया जाता है और वह है ‘कोलेटरल डैमेज'. यानी युद्ध की प्रक्रिया में हुआ एक मामूली और अनचाहा नुकसान. संसाधनों की कमी के कारण इन घटनाओं पर कभी कोई शानदार फिल्म नहीं बन पाती और बनती भी हैं तो उनकी इतनी चर्चा नहीं होती.

पक्षपाती कैमरा और ‘अदृश्य' बचपन

जेंडर और रिप्रजेंटेशन के नजरिए से देखें तो यह भेदभाव और भी गहरा दिखाई देता है. युद्ध फिल्मों में अक्सर वर्दीधारी पुरुष को 'रक्षक' के रूप में पेश किया जाता है जिसके लिए जान देना एक गौरवशाली काम है. वहीं दूसरी तरफ दुश्मन देश के नागरिक और खासकर बच्चे महज बैकग्राउंड की तरह इस्तेमाल होते हैं. उनकी कोई व्यक्तिगत कहानी नहीं होती. उनका कोई चेहरा नहीं होता.
हमने शायद ही कभी किसी हॉलीवुड फिल्म के क्लोज-अप शॉट में गाजा, अफगानिस्तान, इराक के बच्चों के उन सपनों को देखा हो जो अमेरिकी मिसाइल के फटने से पहले उसकी आंखों में झलकते थे. युद्ध का कैमरा अक्सर एक तरफ की पीड़ा को बहुत करीब से दिखाता है और यहीं से सिनेमा की पक्षपाती नजरिया शुरू हो जाता है...

सफेद पर्दे का ‘ब्लैकआउट'

ईरान से सामूहिक कब्रों की जो तस्वीरें सामने आईं हैं, वे रूह कंपा देने वाली हैं. जब तक वैश्विक सिनेमा सिर्फ वर्दी वाली मौतों को 'शहादत' मानेगा और मलबे में दबे बच्चों को 'आकस्मिक क्षति' समझकर नजरअंदाज करेगा तब तक वह कला नहीं बल्कि प्रोपेगेंडा का हिस्सा कहलाएगा क्योंकि असली त्रासदी तो उन मासूम जिंदगियों की है जो बिना किसी गलती के पावर पॉलिटिक्स की आग में झोंक दी गई हैं.
 

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