70 के दशक में राजेश खन्ना हिंदी सिनेमा के सुपरस्टार थे, जिनकी एक झलक देखने के लिए फीमेल फैंस सारी हदें पार कर देती थीं. उनकी फैन-फॉलोविंग को बीट कर पाना किसी के बस की बात नहीं थी, लेकिन एक अभिनेता ऐसे थे जिनसे खुद राजेश खन्ना को इनसिक्योरिटी होने लगी थी और खुद उन्होंने एक इंटरव्यू में जिक्र किया था कि वे उनकी जगह ले सकते हैं. हम बात कर रहे हैं विजय अरोड़ा की, जिन्होंने पहले हिंदी सिनेमा और बाद में टीवी पर ऐतिहासिक किरदार निभाए थे. 2 फरवरी को अभिनेता की पुण्यतिथि है.
पर्सनैलिटी के कारण आसानी से मिलने लगी फिल्में
विजय अरोड़ा ऐसे अभिनेता थे जिन्होंने 70 के दशक में हर बड़ी और खूबसूरत हीरोइन के साथ काम किया था. 1971 में फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया से पढ़ाई पूरी करने के बाद अभिनेता एक्टिंग में अपनी किस्मत आजमाने के लिए मुंबई आए थे. गोरा चेहरा और लंबी कद-काठी की वजह से उन्हें फिल्में आसानी से मिलने लगीं. पहली बार उन्होंने साल 1972 में आई फिल्म 'जरूरत' में रीना रॉय और ‘राखी और हथकड़ी' में आशा पारेख के साथ काम किया था.
राजेश खन्ना से होने लगी थी तुलना
पहली फिल्म पर्दे पर औसत रही, लेकिन फिर आई 'यादों की बारात'. फिल्म ने सफलता के सारे मापदंड पार किए और फिल्म का गाना 'चुरा लिया है तुमने जो दिल को' सुपरहिट साबित हुआ. ये गाना आज भी लोगों की जुबान पर है. अपने चॉकलेटी लुक की वजह से अभिनेता रातों-रात फेमस हो गए और बैक-टू-बैक फिल्में साइन करने लगे. उनकी सफलता का आलम ये रहा कि उनकी तुलना राजेश खन्ना से होने लगी, क्योंकि दोनों की कद-काठी दिखने में एक जैसी थी.
राजेश खन्ना ने कही थी विजय अरोड़ा के लिए ये बात
हर कोई उन्हें दूसरा राजेश खन्ना कहने लगा. खुद राजेश खन्ना ने भी स्वीकार किया था कि अगर कोई उनकी जगह ले सकता है तो वह विजय अरोड़ा हैं. विजय और राजेश खन्ना ने भी साथ में तीन फिल्मों में काम किया था. दोनों स्टार्स को 'निशान', 'रोटी', और 'सौतन' जैसी हिट फिल्मों में साथ देखा गया.
रामायण में निभाया अहम किरदार
अपने करियर में अभिनेता ने 100 से ज्यादा फिल्मों में काम किया और साथ ही टीवी के कई सीरियल्स में दिखे थे. उन्होंने रामानंद सागर के धारावाहिक रामायण में मेघनाथ का रोल निभाया था, जो घर-घर में प्रभु श्रीराम और माता सीता के किरदार जितना ही पसंद किया गया था. अभिनेता ने हिंदी सिनेमा में जितना काम किया, उतना नाम नहीं कमा पाए. अपने करियर के पीक पर वे हिंदी सिनेमा में होने वाली राजनीति का शिकार हुए और उन्होंने खुद इस बात को स्वीकारा था.
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