गुरुदत्त की जिंदगी के अनसुने किस्से, 'लिमोजीन में चलती थी गीता, बस में सफर करते थे गुरुदत्त'

'गीता मशहूर थी, गुरु गुमनाम. मगर अरमान जवाँ थे, रात हसीन थी. ये गुरु की ज़िन्दगी के सबसे ख़ुशी-भरे, सबसे रंगीन दिन थे...ज़िन्दगी अरमानों और उमंगों से भरी हुई थी.' महमूद फारूकी की किताब दास्तान-ए-गुरुदत्त के अंश.

विज्ञापन
Read Time: 9 mins
महमूद फारूकी की किताब है दास्तान-ए-गुरुदत्त
नई दिल्ली:

गुरुदत्त हिंदी सिनेमा के वो डायरेक्टर हैं जिन्होंने अपनी फिल्मों में इश्क, दर्द और आम आदमी की कहानियों को कहा. उन्हीं गुरुदत्त पर महमूद फारूकी की किताब 'दास्तान-ए-गुरुदत्त' हाल ही में राजकमल प्रकाश से रिलीज हुई है. मशहूर दास्तानगो और रंगकर्मी महमूद फारूकी की ये किताब गुरुदत्त के जीवन और उनके समय के भारतीय सिनेमा की गहरी पड़ताल करती है. महमूद फारूकी 'पीपली लाइव' फिल्म के असिस्टेंट डायरेक्टर भी रहे हैं. अब बात करें गुरुदत्त की तो उन्होंने प्यासा, कागज के फूल और साहब बीबी और गुलाम जैसी फिल्में बनाईं जिन्हें सिनेमा की दुनिया में बेजोड़ माना जाता है. गुरुदत्त की इस दास्तान में लेखक ने उनकी जिंदगी की पहेली को सुलझाने की काफी हद तक कोशिश की है. इस किताब में क्लासिक फिल्मों के बनने की कहानी, शादीशुदा जिंदगी के उतार-चढ़ाव, इश्क और शौक के बारे में भी जानकारी दी गई है. 

महमूद फारूकी की किताब 'दास्तान-ए-गुरुदत्त' से यहां कुछ पुस्तक अंश दिए जा रहे हैं जिनमें गीता के साथ उनके इश्क और छोटी-छोटी तकरार को भी महूस किया जा सकता है...

गुरु 26 साल का था—कामयाब था और गीता के इश्क़ में गिरफ़्तार. ‘बाज़ी' का मुहूर्त शॉट गीता के गाने ‘तदबीर से बिगड़ी हुई तक़दीर' से शुरू हुआ था. अरे साहब, उस दिन गाना ही रिकॉर्ड नहीं हुआ—गीता रॉय ख़ुद गुरु के दिल में रिकॉर्ड हो गईं.

गाने की रिकॉर्डिंग और मुहूर्त के बाद उसने गीता को दूसरी बार देव के घर एक पार्टी में देखा. पूरी शाम गुरु दूर बैठा गीता को देखता रहा. गीता रॉय मशहूर सिंगर...जैसे अजन्ता की मूरत हो...साँवली...ख़ूबसूरत...क्या निगाहें उठाती और गिराती थी...

Advertisement

जब हम चलें तो साथ हमारा साया भी न दे 
जब तुम चलो ज़मीन चले आसमाँ चले 
जब हम रुकें तो साथ रुके शम-ए-बेकसी 
जब तुम रुको बहार रुके चाँदनी रुके

दोनों बांग्ला में बात करते. धीरे-धीरे गीता घर आने-जाने लगी. उसका घरेलू, सादा रवैया पूरे घर को मोह गया. वो सबके दिलों में उतर गई. इतनी सादगी से घर में आती, ख़ुद किचन में चली जाती.

Advertisement

एक गाना गुरु को बहुत पसन्द था...बार-बार वह गीता से इसरार करके वही गाने को कहता—
तुमि जदि बोलो भालोबाशा दीते जानो ना 
(तुम कहो अगर कि नहीं आता मुझे प्यार करना)

गीता लगातार काम कर रही थी, मशग़ूल थी- कभी हैदराबाद, कभी मद्रास. गुरु शादी के लिए जल्दी कर रहा था, मगर गीता के घरवाले तैयार नहीं हो रहे थे.

ख़ामोशमिज़ाज गुरु—अलग-थलग, अकेला रहने वाला. और गीता मिलनसार, ख़ुशमिज़ाज. गीता लिमोजिन में चलती थी, गुरु बस में चलता था. गीता मशहूर थी, गुरु गुमनाम. मगर अरमान जवाँ थे, रात हसीन थी. ये गुरु की ज़िन्दगी के सबसे ख़ुशी-भरे, सबसे रंगीन दिन थे...ज़िन्दगी अरमानों और उमंगों से भरी हुई थी.

अक्सर वह माटुंगा की हिन्दू कॉलोनी में गीता को घर छोड़ने जाता. छोटी बहन ललिता या लल्ली साथ होती. कभी-कभी लल्ली के ज़रिये एक-दूसरे को ख़त लिखते. कभी ड्राइव करके पवई चले जाते, कभी लोनावला या खंडाला. दोनों को मछली पकड़ना पसन्द था. दोनों को बारिश पसन्द थी. दोनों को शराब पसन्द थी.

Advertisement

कभी-कभी राज खोसला साथ होते. राज और गीता मिलकर ख़ूब गाने गाते—
ख़यालों में किसी के इस तरह आया नहीं करते...

गीता घर की अकेली कमाने वाली...पूरा घर चलाती थी...बहुत कमसिन थी. गुरु ख़ामोश मगर ग़ुस्से वाला, मूडी, बात-बात पे बिफर जाने वाला. उस वक़्त के गीता को लिखे हुए उसके कुछ ख़त सलामत हैं अभी...

Advertisement

21, अगस्त, 51
क्या तुम्हें अब तक यक़ीन नहीं हुआ है कि मैं तुम्हें कितना चाहता हूँ, अगर मैं तुमसे बोर हो गया होता तो मैं तुम्हें बार-बार शादी के लिए जल्दी क्यों करता हूँ, लेकिन अफ़सोस है कि तुम मुझे अभी तक समझ नहीं सकी हो.

मैं चाहता हूँ कि मेरे लिए नया गाना तुम गातीं तो अच्छा होता, लेकिन मेरे चाहने से क्या होता है.

और क्या लिखूँ, अगर मैं तुम्हें लिखूँ कि जल्दी आओ तो भी तुम नहीं आ सकतीं, इसीलिए मेरा लिखना ही बेकार है, तुम्हारे तो बहुत से बन्धन हैं जिन्हें तुम नहीं तोड़ सकतीं तो मेरा कुछ भी कहना बेकार है, तुम मुझे क्यों बार-बार पूछती रहती हो कि मैं किसी और से प्यार करता हूँ या नहीं और तुम्हें मालूम भी है कि मैं तुम्हें चाहता हूँ, इसीलिए तो तुम मुझे दो साल वेट करने के लिए मजबूर कर रही हो.

तुम्हें तो अभी ख़त में अपना नाम लिखने का डर रहता है, क्यों? तुम बहुत अच्छी हो, कभी-कभी सोचता हूँ कि तुम्हें मुझसे प्यार करके क्या मिला...और क्या मैं तुम्हें सारा जीवन ख़ुश रखूँगा? कभी-कभी मुझे ख़ुद नहीं समझ में आता कि मैं क्या कर रहा हूँ, सच में तुम एक पागल से प्यार करने लगी हो. मैं चाहता हूँ कि तुम जल्दी वापस आ जाओ.

तुम हर दो महीने में मुझे अकेला छोड़ जाती हो, क्या पता किसी दिन मुझे हमेशा के लिए छोड़ के चली जाओ...और क्या लिखूँ, अगर हो सके तो सोते वक़्त मुझे बार-बार याद करना.

*****

‘बाज़ी' के बाद गुरु ने एक और फ़िल्म शुरू की ‘जाल' नाम की. गुरु के भाई और उस वक़्त के असिस्टेंट आत्माराम के मुताबिक़ ‘जाल' 1948 की गिसेपी डे सेंटिस की इटैलियन फ़िल्म ‘राइसो अमारो' यानी ‘बिटर राइस' से तहरीक़ लेकर लिखी गई थी...फ़िल्म यूरोप और अमरीका में हिट हुई थी, कान्स भी गई थी, ऑस्कर भी गई थी.

वी.के. मूर्ति को गुरु ने कैमरे के लिए लिया. प्रोडक्शन गुरुस्वामी ने सँभाला. उनके अंकल बॉम्बे टॉकीज़ का अकाउंट्स डिपार्टमेंट देखते थे. हिमांशु राय की मौत के बाद गुरुस्वामी देविका रानी के प्राइवेट सेक्रेटरी बन गए और सात साल तक उनके साथ काम किया. फिर वो एक बार गुरु के साथ जुड़े तो आख़िर तक जुड़े रहे.

‘जाल' एक स्मगलर, टोनी, की कहानी है. वो बम्बई से भागकर गोवा आता है—सोना स्मगल करने के लिए. यहाँ पुलिस उसकी तलाश में है. वो एक लड़की के घर पनाह लेता है जिसका एक अन्धा भाई है और जिसका मंगेतर राम सिंह, एक मछुआरा है. एक और लड़की है जो उसके साथ जराइम में मुलव्वस है और उससे प्यार करती है, मगर टोनी ने उसके साथ दग़ा की. दरअसल टोनी दोनों में से किसी से प्यार नहीं करता, वो सिर्फ़ इस्तेमाल करता है.

इस तरह का हीरो, जो दरहक़ीक़त विलेन है—जो शौक़ और लालच के लिए जुर्म करता है, हालात से मजबूर होकर नहीं—अभी तक परदे पर नहीं आया था.

टोनी मारिया से कहता है कि जब वो उसको रात में बुलाएगा तो वो ज़रूर आएगी. वो कहती है, ‘वो हरगिज़ नहीं आएगी, उसके दिल में उसके लिए, कोई जज़्बात नहीं है.' टोनी अपनी बात दोहराता है, ‘वो ज़रूर आएगी.'

रात होती है, चाँद आसमान में निकलता है और टोनी का गाना शुरू होता है—
ये रात ये चाँदनी फिर कहाँ, सुन जा दिल की दास्ताँ...

मज़े की बात ये कि जिस रात ये शूटिंग होनी थी, उस रात देव आनन्द ने ज़िन्दगी में पहली बार फेनी पी, चढ़ गई. उनको साहिल पर चलना था, वो समन्दर में चलने लगे...आख़िरकार गिरे और बहुत चोट आई. उनकी महँगी घड़ी ख़राब हो गई, मगर गाना शूट कर लिया गया.

हमकता हुआ समन्दर, ईसाई जमात, गाँव के किरदार—उनका गीत-संगीत फ़िल्म में बहुत अच्छी वाक़े'निगारी के साथ दिखाया गया था. फ़िल्म में मछुआरों की ज़िन्दगी को पहली बार इस तरह पेश किया गया...और मछुआरों के लिए साहिर ने ये गाना लिखा, जो उनका न लगकर शैलेन्द्र का लगता है...
हो ओ ओ ओ आँगन में बैठी
है मच्छेरन तेरी आस लगाए
अरमानों और आशाओं
के लाखों दीप जलाए
भोला बचपन रस्ता देखे
ममता ख़ैर मनाए
जोर लगाके खेंच मछेरे
ढील न आने पाए हैया
जनम-जनम से अपने
सर पे तूफ़ानों के साये
तूफ़ानों के साये
लहरें अपनी हमजोली हैं
और बादल हमसाये
अपनी हिम्मत कभी न
टूटे, रुत आए रुत जाए
ओय जोर लगाके हैया
पैर जमाके हैया
जान लगाके हैया

एक तरफ़ फ़िल्म बन रही थी, दूसरी तरफ़ गुरु गीता को लेकर परेशान था...और नतीजतन उसको परेशान करता रहता था...
14 फ़रवरी, रत्नागिरि में जब वो ‘जाल' की शूटिंग कर रहा था तो उसने गीता को लिखा—
चलो, अब मैं बॉम्बे में नहीं हूँ तो कम से कम तुम मेरे रोज़ाना के ग़ुस्से, डाँट, बदतमीज़ी से तो बची हुई हो...पता नहीं मैं इतना ग़ुस्सा क्यों हो जाता हूँ, मगर तुम मेरा मिज़ाज अब तक कुछ-कुछ समझ गई होंगी.

रत्नागिरि से ही 22 फ़रवरी, 1952 को लिखा— 

मैं जितना ज़िन्दगी को देख रहा हूँ उतना ही तल्ख़ होता जा रहा हूँ...इनसानों से और उनकी फ़ितरत पर से मेरा यक़ीन उठता जा रहा है।
...अभी ये ख़त लिखते-लिखते इस क़दर शिद्दत से तुम याद आ रही हो कि दिल कर रहा है तुम कहीं से आ जाओ और मैं तुम्हें अपनी आग़ोश में ले लूँ और अपनी बाँहों में भर के तुम्हें यहाँ के ख़ूबसूरत साहिल पर ले जाऊँ और वहाँ तुमसे प्यार करूँ और पागलों की तरह तुम्हें चूमूँ...काश, मैं अभी ऐसा कर सकता.

24 मार्च, 1952 को लिखा—

कल रात की मेरी बात का बुरा मत मानना...कई महीनों से मैं सोच रहा हूँ कि मैं ऐसा क्यों हूँ...मगर मैं बेबस हूँ...मैं जैसा हूँ वैसा ही रहूँगा...मैं क्यों तुम्हारी कामयाबी और तरक़्क़ी के रास्ते में हाइल आऊँ...तुम उस शोहरत और कामयाबी की हक़दार हो, उसके लिए तुमने बहुत मेहनत की है...उम्मीद है कल रात की गुफ़्तगू से कोई रास्ता निकलेगा और मैं चीज़ों को बेहतर तरीक़े से देख-समझ सकूँगा...तुम बहुत अच्छी हो और मैं जानता हूँ कि तुम मुझे बहुत चाहती हो...मगर मैं डरता हूँ कि कहीं तुम मुझे छोड़ न दो...ज़िन्दगी भी बहुत अजीब-सी चीज़ है...कभी-कभी जो चीज़ आप बहुत शिद्दत से चाहते हैं, वही आपको नहीं मिलती.
मैं यहाँ ये ख़त लिख रहा हूँ और तुम इस वक़्त आसमानों में पता नहीं कितनी ऊँची उड़ान उड़ रही होगी.काश तुम मुझे मिल जाओ, मैं तुम्हें सताकर ख़ूब प्यार करूँ, तुम्हारे सीने पे सर रखकर रोऊँ.

‘जाल' भी हिट हुई। गीता वाक़ई उसकी ‘लकी चार्म' बन गई थी।

गीता और हेमंत कुमार का गाया हुआ ‘ये रात ये चाँदनी फिर कहाँ' मेगा हिट साबित हुआ. इस फ़िल्म का एक दूसरा गाना ‘पिघला है सोना दूर गगन पर' इस क़दर ख़ूबसूरत था कि बाद में इसको केन्द्रीय विद्यालय की हिन्दी की किताब में शामिल किया गया.

Featured Video Of The Day
Punjab Elections: AAP छोड़ BJP में जाने वालों पर CM Bhagwant Mann का बेबाक जवाब! | NDTV Exclusive
Topics mentioned in this article