ये एक्टर जब FTII का था डायरेक्टर तो ठुकरा दी थी राज कपूर की सिफारिश, शो मैन के घर में छा गया छा मातम

भारतीय सिनेमा और रंगमंच की दुनिया के महान कलाकार गिरीश कारनाड की आज पुण्यतिथि है. उनके संस्मरण खेल खेल में बीता जीवन से राज कपूर वाला वो किस्सा जो उनके रुतबे से कतई नहीं घबराए थे गिरीश.

विज्ञापन
Read Time: 7 mins
ये एक्टर जब FTII का डायरेक्टर था तो राज कपूर की सिफारिश को भी कर दिया था नामंजूर
NDTV
नई दिल्ली:

10 जून को ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता नाटककार, अभिनेता और फिल्मकार गिरीश कारनाड की पुण्यतिथि है. 19 मई 1938 को माथेरान (महाराष्ट्र) में जन्मे कर्नाड ने कन्नड़ साहित्य और भारतीय रंगमंच को नई दिशा दी. ऑक्सफोर्ड से रोड्स स्कॉलर के रूप में पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने 'ययाति' (1961) से नाट्य लेखन की शुरुआत की. 'तुगलक', 'हयवदन' और 'नागमंडल' उनके प्रमुख नाटक हैं. गिरीश कारनाड ने रेखा की फिल्म उत्सव का निर्देशन भी किया. वे 1974-75 में एफटीआईआई के निदेशक रहे. गिरीश कारनाड का 10 जून 2019 को 81 वर्ष की आयु में बेंगलुरु में निधन हो गया. गिरीश कारनाड ने 2011 में कन्नड़ में अपने संस्मरण लिखे जिसका अंग्रेजी अनुवाद 'दिस लाइफ एट प्ले: मेमॉयर्स' शीर्षक से प्रकाशित हुआ. इसका हिंदी अनुवाद राजकमल प्रकाशन से 'खेल-खेल में बीता जीवन' नाम से आया. इसी किताब से पेश है रोचक प्रसंग...

"एफ.टी.आई.आई. में...भारतीय सिनेमा के दिग्गजों में से एक राज कपूर का दुर्लभ दौरा था. उस साल एक्टिंग कोर्स के लिए आवेदकों में दिलीप धवन नाम का एक युवक भी था, नीली आँखों, आकर्षक चेहरे वाला. परन्तु साक्षात्कार के समय उसमें कोई विशेष प्रतिभा दिखाई नहीं दी. वह प्रतिभाशाली नहीं था और निश्चित रूप से उस वर्ष के उम्मीदवारों के बैच के साथ रखने के योग्य नहीं था. प्रोफेसर तनेजा ने उसके पक्ष से दाखिले के लिए प्रतिवाद किया परन्तु उसे दाखिला नहीं मिला. दिलीप के द्वारा भेजे गए आवेदन पत्र के साथ तेरह प्रमुख फ़िल्म निर्माणकर्ताओं के सिफारिश-पत्र संलग्न थे. राज कपूर के द्वारा लिखा हुआ एक अनुशंसा-पत्र भी था.

दिलीप को सीधे तौर पर दाखिला नहीं मिलेगा, मालूम होने पर तनेजा ने मुझे सलाह दी, “इतने वरिष्ठ निर्माताओं ने उसकी अनुशंसा की है. अब उसके दाखिले को खारिज करते हैं तो उन सबका अपमान माना जाएगा. फिर भी उसे प्रतीक्षा सूची में ग्यारहवें स्थान पर रखा तो जा सकता है न!”

संस्थान के उप-निदेशक सी.वी. गोपाल ने मुझे चेतावनी दी, “हम या तो लड़के को स्वीकार कर लें या उसे अस्वीकार कर दें. प्रतीक्षा सूची जैसा अव्यवस्थित नियम लागू न करें तो अच्छा है. उसका नाम हमारे पास की फाइल में रहने दिया जाए. बाहर जाकर कोई घोषणा करने की ज़रूरत नहीं है.”

उन तेरह निर्माताओं से बढ़कर मेरे साथ काम करने वाले तनेजा को राहत पहुँचाने के उद्देश्य से उनकी बातों में आ गया. पहले साल मैं तनेजा द्वारा सुझाई गई बातों से सहमत हो गया लेकिन जाल में फँस गया. हमने एक प्रतीक्षा सूची की घोषणा की, जिसमें दिलीप का नाम सबसे ऊपर था. सूची हमारे नोटिस बोर्ड पर केवल कुछ दिनों के लिए थी. जब शिक्षण स्टाफ के साथ मेरी साप्ताहिक बैठक हो रही थी, मेरे दरवाज़े पर डाबक दौड़ता हुआ आया और बोला, “मिस्टर राज कपूर आए हैं. वे बाहर इन्तज़ार कर रहे हैं.”

Advertisement

राज कपूर का पुणे से थोड़ी दूरी पर लोनी में एक फार्महाउस था, लेकिन संस्थान की स्थापना के तेरह वर्षों में उन्होंने कभी भी यहाँ क़दम रखने की जहमत नहीं उठाई थी. अचानक उनके इस दौरे से अध्यापकों का दल सहम गया. सभा समाप्त होने के पहले ही राज कपूर के स्वागत के लिए बैठक में खड़े हो गए. अपने कागजात इकट्ठा करना शुरू कर दिया. राज कपूर ने अपॉइंटमेंट लेने की जहमत नहीं उठाई थी, मुझे अपने निर्धारित कार्यक्रम में बाधा डालने का कोई कारण नहीं दिख रहा था. मैंने दाबक से कहा, “उनसे कहो, अध्यापकों के साथ मीटिंग चल रही है, मैं तुरन्त नहीं आ सकता. राज कपूर को प्रशासनिक अधिकारी के कमरे में एक कुर्सी दे दो. उन्हें थोड़ी प्रतीक्षा करनी पड़ेगी.”

हमने बैठक आगे बढ़ाई. संस्थान में आगंतुकों के लिए प्रतीक्षालय नहीं था. मीटिंग खत्म हुई. सभी अध्यापक इधर-उधर जाने लगे. सतीश बहादुर ने मुझसे फुसफुसाते हुए, “मुझे आशा है कि आपको एहसास होगा कि आपके पूर्ववर्तियों में से किसी ने भी राज कपूर को इस तरह इन्तज़ार नहीं कराया होगा.”

Advertisement

जैसे ही मैं दफ़्तर पहुँचा, इससे पहले कि मैं उनके आवभगत के बारे में कुछ कहता, उन्होंने हिन्दी में कहना शुरू किया, “यह आपने क्या किया, गिरीश जी? मैं कल दुबई से घर लौटा तो मातम चल रहा था, मातम! घर में किसी की मौत हो जाने की तरह शोक-प्रदर्शन चल रहा था. वह रो रहा था और छाती पीट रहा था.”

मुझे राज कपूर जी के आने का उद्देश्य पहले ही स्पष्ट हो गया था. मैंने कहा, “अभिनय पाठ्यक्रम में केवल दस सीटें हैं, और दिलीप दस सर्वश्रेष्ठ अभ्यर्थियों में से नहीं हैं. उन्हें चुनने के लिए मुझे एक बेहतर उम्मीदवार की कुर्बानी देनी पड़ती. यह अन्याय होता.”

राज कपूर का गम्भीरता से सिर हिलाना, यह दरशा रहा था कि वह मेरे तर्क को पूरी तरह से समझ चुके थे. उन्होंने कहा, “अगर दिलीप के पास बिलकुल भी प्रतिभा नहीं है, तो उसे अस्वीकार कर दें. मैं एक शब्द भी नहीं कहूँगा. लेकिन अगर वह प्रतीक्षा सूची में पहले स्थान पर है, तो निश्चित रूप से आप अपने विचार में थोड़ा उदार हो सकते हैं. कम-से-कम उन निर्माताओं की अनुशंसा का सम्मान करते हुए इसके आवेदन को स्वीकार कर सकते हैं! हम तेरह निर्माताओं का जीवन फिल्म-निर्माण के लिए समर्पत है. यही हमारे वजूद का हिस्सा है. फिल्म-निर्माण के लिए हमने अपना पूरा जीवन दे दिया है, ऐसे में क्या संस्थान को हमारे योगदान पर कुछ विचार नहीं करना चाहिए?” अपमान के दर्द से उनकी आवाज काँप रही थी.

सी.वी. गोपाल की चेतावनी याद आई और खेद होने लगा. राज कपूर की बातों में प्रकट विनम्रता, तार्किकता और नाटकीय वेदना को देखकर मैंने सिर झुका लिया. बातों की रस्साकशी के बीच मैंने उनसे कहा, “राज जी, आप निर्माता हैं, हमारे संस्थान में उम्मीदवारों के आवेदन की सिफारिश करते हैं. जब हम उन सिफारिशों को अनदेखा करते हैं तो आपको व्यथा होती है. यह सहज है. मैं एक बात आपको बताना चाहता हूँ, जब से यह संस्थान आरम्भ हुआ है, तब से पिछले तेरह वर्षों में उन निर्माताओं में से किसी ने भी संस्थान से स्नातक अभ्यर्थी को अपनी फिल्मों में जगह नहीं दी है. आप अनुशंसा करते हैं लेकिन रोजगार नहीं देते हैं.”

Advertisement

राज कपूर बोले, “गिरीश जी, आप जानते हैं कि जिस उद्योग में हम काम करते हैं, वह बेहद उलझा हुआ जाल की तरह है. हम किसी एक को आगे बढ़ाना चाहें तो भी नहीं कर सकते हैं. यहाँ बहुत सारे प्रतिभाशाली हैं, उन्हें मौका देना चाहते हैं लेकिन सिनेमा उद्योग के बेरहम दबाव से बँधे हैं.”

मैंने कहा, “ठीक है, अब इन तेरह निर्माताओं में से कोई भी एक अपनी आने वाली फिल्म में दिलीप धवन को मुख्य पात्र की भूमिका देंगे. मुख्य न दे सकें तो सह पात्र की ही भूमिका दे दें, तब कोई बात नहीं. यदि सहमत हैं तो मैं अभी उसे दाखिला दे दूँगा.”

Advertisement

सुनकर राज कपूर मेरी ओर ताकते रहे. कुर्सी के पीछे देखकर फिर हाथ जोड़कर अत्यन्त सौहार्द भाव से मेरी ओर देखते हुए मुस्कुराने लगे. “मैं जिस काम के लिए यहाँ आया था, मैंने वह काम किया है. आपको जैसा उचित लगे, वैसा कीजिए,” कहते हुए वे उठ गए.

मैं उन्हें उनके वाहन तक पहुँचाने के लिए जाते समय उनसे कहा, “राज कपूर का संस्थान में आना कोई छोटी बात नहीं है. हमें आपकी सद्भावना, आपके मार्गदर्शन की आवश्यकता है. आपके यहाँ आने से हमें खुशी हो रही है. मैं आपको ‘नहीं' नहीं कह सकता. कृपया, दिलीप को बता दें कि उन्हें संस्थान में दाखिला मिल गया है.”

राज कपूर ने मुझे धन्यवाद दिया और चले गए.

बाद में दिलीप ने मुझे बताया कि इस मुलाक़ात के तुरन्त बाद राज कपूर ने उन्हें बुलवाया और कहा, “मैंने तुम्हें संस्थान में भर्ती करा दिया है. अब मेरे पास काम माँगने मत आना.”

जब दिलीप ने अपना कोर्स पूरा किया और बम्बई फिल्म-उद्योग में शामिल हो गए, तो उन निर्माताओं में से एक ने भी उन्हें अपनी फिल्म में नहीं लिया. दिलीप के सहपाठी सईद मिर्जा के द्वारा निर्मित टीवी धारावाहिक ‘नुक्कड़' से दिलीप लोकप्रिय हुए.

मैंने राज कपूर के प्रसंग से अपने संस्थान के अनुभवों की शुरुआत की है क्योंकि उस समय के बाज़ारी परिदृश्य में, इंस्ट्टियूट में किस प्रकार की समस्याएँ रही हैं, उन्हें सामने लाना मेरा उद्देश्य है.

Featured Video Of The Day
कश्मीर को कारगिल और लद्दाख से जोड़ने वाली जोजिला टनल अब खुलने को तैयार | Kachehri
Topics mentioned in this article
Bollywood
Entertainment
Raj Kapoor
Girish Karnad