13 साल की उम्र में घर छोड़ कर भाग आई मुंबई, डायरेक्टर से बोली-काम दो या दे दूंगी जान, बाद में बनी सिनेमा की पहली फीमेल कॉमेडियन

आज हम आपको एक ऐसी फीमेल कॉमेडियन के बारे में बताने जा रहे हैं जिसके पूरे परिवार की हत्या कर दी गई है, जिसके बाद वह 13 साल की उम्र में मुंबई आई और फिल्म इंडस्ट्री पर छा गई.

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13 साल की उम्र में घर छोड़ कर भाग आई मुंबई
नई दिल्ली:

फिल्मों में अगर कॉमेडी न हो, तो मजा थोड़ा फीका पड़ जाता है.  ऐसे में बॉलीवुड इंडस्ट्री में कई फेमस कॉमेडियन हैं, जो अपने मजाकिया अंदाज से फिल्मों में जान भर देते हैं, लेकिन क्या आप हिंदी सिनेमा की पहली फीमेल कॉमेडियन के बारे में जानते हैं? अगर नहीं तो जान लीजिए. आज हम आपको उन्हीं के बारे में बताने जा रहे हैं...बता दें, हिंदी सिनेमा की पहली महिला हास्य कलाकार टुनटुन थीं, जिनका असली नाम उमा देवी खत्री था. फिल्मों की द्वारा उन्होंने लोगों को जितना हंसाया. बाबुल (1950), मिस्टर एंड मिसेज '55 (1955), पति, पत्नी और वो (1978)  जैसी कई प्रसिद्ध फिल्मों में उन्हें अपनी कॉमेडी टाइमिंग से दर्शकों के दिल में जगह बना ली थी. हालांकि आज वह हमारे संग नहीं है, लेकिन उनका मजाकिया किरदार हमेशा सराहा जाता है..

आसान नहीं था टुनटुन का जीवन

फिल्मों में जितनी खुशमिजाज टुनटुन दिखाई देती थी,  उतना ही उनका जीवन भी त्रासदी से भरा था. साल 1923 में उत्तर प्रदेश के अमरोहा के पास एक छोटे से गांव में उनकी जन्म हुआ था.

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, उमा देवी के परिवार की जमीन विवाद के चलते हत्या कर दी गई थी और वह बहुत कम उम्र में ही अनाथ हो गई थीं. उनके माता-पिता और भाई के चेहरे उनके जेहन में बस धुंधली सी याद बनकर रह गए थे. जब प्रसिद्ध फिल्म समीक्षक शिशिर कृष्ण शर्मा ने उनकी मृत्यु से कुछ दिन पहले उनका इंटरव्यू  लिया, तो उमा ने बताया कि उन्हें याद नहीं कि उनके माता-पिता कैसे दिखते थे और एक दिन उनके भाई की भी हत्या कर दी गई.  बता दें, परिवार के निधन के बाद वह गरीबी और अकेलेपन से जूझ रही थी.

अपने परिवार को खोने के बाद, उमा को उनके रिश्तेदारों ने अपने पास रख लिया, जो उनके साथ नौकरानी की तरह रहते थे. उमा देवी के जीवन में संगीत ही एकमात्र सांत्वना थी. वह गाने सुनती और गाती थीं और एक लोकप्रिय गायिका बनने का सपना देखती थीं. लेकिन उमा की जिंदगी ने तब मोड़ लिया जब उनकी मुलाकात एक्साइज ड्यूटी इंस्पेक्टर अख्तर अब्बास काजी से हुई, जिन्होंने उन्हें गाने के लिए प्रेरित किया था.


डायरेक्टर से कहा- काम नहीं दिया तो दे देगी जान

13 साल की उम्र में, उमा पार्श्व गायन में अपनी किस्मत आजमाने के लिए मुंबई भाग आई थी और संगीतकार नौशाद अली के घर पहुंच गईं. खुद को साबित करने के लिए बेताब, उमा ने नौशाद अली को धमकी दी कि अगर उन्हें ऑडिशन का मौका और काम नहीं मिला, तो वह समुद्र में कूद जाएंगी.

जिसके बाद नौशाद उनकी आवाज से प्रभावित हुए और उन्हें गाने का मौका दिया. उमा ने 1946 में फिल्म "वामिक अजरा" से गायन की शुरुआत की थी, लेकिन फिल्म "दर्द" के गीत "अफसाना लिख रही हूं दिल-ए-बेकरार का" ने उन्हें सफलता दिलाई.


ऐसे बनीं हिन्दी सिनेमा की पहली महिला कॉमेडियन

1950 के दशक में नौशाद ने टुनटुन के हंसमुख स्वभाव के कारण उन्हें कॉमेडी एक्टिंग करने की सलाह दी. जिसके बाद से उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और आज भी उनकी एक्टिंग को खूब याद किया जाता है.

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