1950 में जब देश आजादी के शुरुआती दौर से गुजर रहा था, तब हिंदी सिनेमा में देशभक्ति, रोमांस और विदेशी संगीत का अनोखा मेल देखने को मिला. फिल्म ‘समाधि' का गाना ‘गोरे गोरे ओ बांके छोरे' इसी दौर की एक दिलचस्प मिसाल है. लता मंगेशकर और अमीरबाई कर्नाटकी की आवाज में सजा यह गीत आज भी पुराने हिंदी फिल्म संगीत के चाहने वालों को खूब पसंद आता है. इसकी खासियत सिर्फ इसकी चुलबुली धुन नहीं, बल्कि यह भी है कि इसका संगीत एक विदेशी गीत से प्रेरित था. 1950 में रिलीज हुई इस फिल्म और इसके संगीत ने हिंदी सिनेमा के स्वर्णिम दौर में अपनी खास पहचान बनाई.
विदेशी धुन से बनी भारतीय पहचान
‘गोरे गोरे ओ बांके छोरे' की धुन को 1945 की अमेरिकी फिल्म ‘डॉल फेस' के गीत ‘चिको चिको' से प्रेरित बताया जाता है. इस गीत का संगीत सी. रामचंद्र ने तैयार किया था, जबकि बोल राजेंद्र कृष्ण ने लिखे थे. विदेशी धुन को भारतीय अंदाज में ढालकर तैयार किया गया यह गाना उस दौर के हिंदी फिल्म संगीत की वैश्विक पहुंच को दिखाता है. गाने में लता मंगेशकर और अमीरबाई कर्नाटकी की आवाजें साथ सुनाई देती हैं. दोनों की गायकी का अंदाज अलग था, लेकिन इस गीत में उनकी जुगलबंदी ने इसे खास बना दिया. गाने के बोलों में एक लड़की अपने पसंदीदा नौजवान को अपनी गली में आने का न्योता देती है. यही चुलबुलापन इसे सुनने में हल्का-फुल्का और यादगार बनाता है.
‘समाधि' में ऐसे फिल्माया गया था गाना
यह गाना फिल्म ‘समाधि' का हिस्सा था, जिसका निर्देशन रमेश सहगल ने किया था. फिल्म में अशोक कुमार, नलिनी जयवंत, कुलदीप कौर और श्याम जैसे कलाकार नजर आए थे. कहानी आजाद हिंद फौज और सुभाष चंद्र बोस के संघर्ष की पृष्ठभूमि पर आधारित थी. फिल्म की कहानी में यह गीत एक मंचीय प्रस्तुति के रूप में आता है. नलिनी जयवंत और कुलदीप कौर पर फिल्माए गए इस गाने में कॉलेज की लड़कियां सैनिकों का मनोरंजन करती नजर आती हैं. फिल्म के गंभीर देशभक्ति वाले माहौल के बीच यह गीत एक अलग रंग लेकर आता है.
गाना देखने के लिए यहां क्लिक करें
बॉक्स ऑफिस पर भी रही बड़ी कामयाबी
‘समाधि' सिर्फ अपने गानों के लिए ही नहीं, बल्कि बॉक्स ऑफिस पर अपनी सफलता के लिए भी जानी जाती है. रिपोर्ट्स के अनुसार, यह 1950 की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्मों में शामिल थी. फिल्म का अनुमानित ग्रॉस कलेक्शन 1.35 करोड़ रुपये और नेट कलेक्शन 75 लाख रुपये बताया गया है. आज भी ‘गोरे गोरे ओ बाँके छोरे' को सुनते हुए उस दौर की चुलबुली गायकी, विदेशी धुन और भारतीय संगीत की खूबसूरत जुगलबंदी याद आती है. यही वजह है कि 76 साल बाद भी यह गीत पुराने हिंदी फिल्म संगीत के चाहने वालों के बीच अपनी जगह बनाए हुए है.