बॉलीवुड की चमक-दमक के पीछे कई ऐसी कहानियां छिपी होती हैं. जो दिल तोड़ देती हैं. 1950 के दशक के एक सुपरस्टार की कहानी भी कुछ ऐसी ही रही है. कभी जिनका नाम दिलीप कुमार और राज कपूर जैसे दिग्गजों के साथ लिया जाता था. वही कलाकार जिंदगी के आखिरी दौर में अकेलेपन और आर्थिक तंगी से जूझत नजर आया. अमिताभ बच्चन ने भी एक बार उन्हें मुंबई में बस स्टॉप पर अकेले खड़े देखा था. एक सुपरस्टार का ये हाल देखकर वो काफी इमोशनल भी हुए. कहा जाता है कि उनके अंतिम संस्कार में सिर्फ 8 लोग ही पहुंचे थे.
सुपरस्टार से आर्थिक तंगी तक का सफर
हम बात कर रहे हैं भरत भूषण की. जिन्होंने ‘बैजू बावरा', ‘बरसात की रात' और ‘मिर्जा गालिब' जैसी हिट फिल्मों से बड़ा नाम कमाया था. 1950 के दशक में वो इंडस्ट्री के टॉप स्टार्स में गिने जाते थे. लेकिन बाद में उन्होंने अपने पैसों से फिल्में प्रोड्यूस करने का फैसला लिया. जो उनके लिए भारी नुकसान का कारण बना. धीरे-धीरे उनकी जमापूंजी घटती गई और उन्हें अपने बंगले तक बेचने पड़े. एक समय जो स्टार आलीशान जिंदगी जी रहा था. वो बाद में मुंबई के बाहरी इलाके में छोटे फ्लैट में रहने को मजबूर हो गया. फिर भी उन्होंने काम करना नहीं छोड़ा और छोटे-छोटे रोल निभाते रहे.
बॉलीवुड के मशूहर एक्टर थे भारत भूषण
अमिताभ बच्चन हुए इमोशनल
उनका हाल देखकर एक बार अमिताभ बच्चन भी इमोशनल हो गए थे. अमिताभ बच्चन ने 2008 में एक ब्लॉग में भारत भूषण से जुड़े एक किस्से को शेयर किया था. उन्होंने बताया था कि एक सुबह वह सांता क्रूज से जा रहे थे, तभी उन्होंने एक बुजुर्ग शख्स को खामोशी के साथ बस स्टाप की लाइन पर खड़े देखा. वे भारत भूषण थे. ये देखकर वो हैरान रह गए कि इतना बड़ा स्टार आज आम लोगों की तरह अकेला खड़ा था और कोई उसे पहचान भी नहीं रहा था. वो उन्हें कार में लिफ्ट देना चाहते थे, लेकिन हिम्मत नहीं जुटा पाए ताकि उन्हें शर्मिंदगी न हो.
बैजू बावरा थी भारत भूषण की मशहूर फिल्म
आशीर्वाद बंगले के थे मालिक
भारत भूषण का बांद्रा में शानदार बंगला था. जिसका नाम था आशीर्वाद. भारत भूषण ने इस बंगले को राजेंद्र कुमार को बेचा था और उन्होंने इसे राजेश खन्ना को बेच दिया था. भारत भूषण को पढ़ने लिखने का भी बहुत शौक था. लेकिन मुफलिसी की दिनों मे जिस तरह से उनका बंगला और कार बिक गईं, उसी तरह उन्हें अपनी किताबें भी बेचनी पड़ीं.
भारत भूषण के निधन के बाद भी उनकी स्थिति बेहद दुखद रही. बताया जाता है कि उनके अंतिम संस्कार में सिर्फ 8 लोग ही शामिल हुए. हालांकि उनकी बेटी ने बाद में कहा कि उन्होंने जीवन सम्मान के साथ जिया और आखिरी समय तक काम करते रहे. भरत भूषण 1992 में दिल का दौरा पड़ने से चल बसे थे.