आखिरी फिल्म का नाम गुडबाय, जिस दिन रिलीज हुई उसी दिन दुनिया को अलविदा कह गया था ये सितारा, 75 फिल्में और 25 टीवी शो में किया काम

हम जिस एक्टर की बात कर रहे हैं उन्होंने एक्टिंग की दुनिया में टीवी से लेकर फिल्मों तक में काम किया और अपनी खास जगह बनाई. उनकी जिंदगी का चक्र देखिए कि जिस दिन उनकी फिल्म गुडबाय रिलीज हुई उसी दिन उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया था.

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अरुण बाली की मौत के दिन उनकी आखिरी फिल्म रिलीज हुई थी
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नई दिल्ली:

भारतीय सिनेमा और टेलीविजन की दुनिया में कुछ कलाकार ऐसे होते हैं, जिनकी मौजूदगी भले ही पर्दे पर कुछ मिनटों की हो, लेकिन उनका किरदार लंबे समय तक दर्शकों के जेहन में बना रहता है. अभिनेता अरुण बाली भी ऐसे ही कलाकार थे. उन्होंने अपने लंबे करियर में नायक से ज्यादा कैरेक्टर रोल को महत्व दिया और हर छोटे-बड़े किरदार को अपनी अदाकारी से खास बना दिया. उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें याद करते हुए सबसे ज्यादा चर्चा उनके अभिनय के साथ उस संयोग की होती है, जब उनकी आखिरी फिल्म ‘गुडबाय' सिनेमाघरों में पहुंची और उसी दिन उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया.

अरुण बाली का जन्म 23 दिसंबर 1942 को लाहौर में हुआ था. उन्होंने शायद ही कभी सोचा होगा कि आगे चलकर अभिनय उनकी पहचान बनेगा. अभिनय की दुनिया में कदम रखने से पहले उनका रुझान थिएटर की ओर हुआ. रंगमंच ने उन्हें अभिनय की बारीकियां समझने और अलग-अलग किरदारों को जीने का मौका दिया.

हालांकि, थिएटर के शुरुआती दिनों में उन्हें निराशा का सामना भी करना पड़ा. एक स्टेज परफॉर्मेंस के दौरान वह इतने घबरा गए कि डायलॉग भूल गए. दर्शकों के रिएक्शन भी उनके पक्ष में नहीं थी. इस घटना के बाद वह बेहद निराश हुए और उन्होंने थिएटर छोड़ने तक का मन बना लिया था. लेकिन परिवार से मिले हौसले ने उन्हें दोबारा खड़े होने की ताकत दी. उनके बड़े भाई ने उन्हें समझाया कि किसी सीनियर की डांट को असफलता नहीं, बल्कि सीख के तौर पर लेना चाहिए. यही बात अरुण बाली के लिए आगे का रास्ता तय करने वाली साबित हुई.

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टेलीविजन ने उन्हें घर-घर तक पहुंचाया. वर्ष 1989 में ‘दूसरा केवल' से उनकी टीवी यात्रा शुरू हुई. इसके बाद 1991 के चर्चित धारावाहिक ‘चाणक्य' में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. ‘नीम का पेड़', ‘स्वाभिमान' और ‘कुमकुम' जैसे धारावाहिकों ने उन्हें दर्शकों के बीच मजबूत पहचान दिलाई. टीवी पर उनकी गंभीर आवाज, प्रभावशाली व्यक्तित्व और सहज अभिनय ने उन्हें चरित्र अभिनेता के रूप में अलग मुकाम दिया.

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इसके बाद बड़े पर्दे ने भी उनका स्वागत किया. वर्ष 1991 में आई फिल्म ‘सौगंध' से उन्होंने फिल्मों में कदम रखा. इसके बाद ‘यलगार', ‘राजू बन गया जेंटलमैन', ‘फूल और अंगारे', ‘खलनायक', ‘सत्या' और ‘हे राम' जैसी फिल्मों में उन्होंने अलग-अलग तरह के किरदार निभाए. उनका सफर किसी एक तरह की भूमिका तक सीमित नहीं रहा.

समय के साथ उन्होंने नई पीढ़ी के दर्शकों के बीच भी अपनी जगह बनाई. ‘लगे रहो मुन्नाभाई', ‘3 इडियट्स', ‘बर्फी', ‘पीके', ‘केदारनाथ', ‘पानीपत' और ‘लाल सिंह चड्ढा' जैसी फिल्मों में उनके किरदारों ने उनकी बहुमुखी प्रतिभा को सामने रखा. वह पर्दे पर कम समय के लिए दिखाई देते थे, लेकिन उनके अभिनय में इतनी सहजता होती थी कि किरदार कहानी का महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाता था.

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अरुण बाली की खासियत यह थी कि उन्होंने उम्र बढ़ने के साथ अभिनय से दूरी नहीं बनाई. इसके उलट, जीवन के अंतिम दौर में भी वह लगातार काम करते रहे. उनके लिए अभिनय केवल पेशा नहीं, बल्कि जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका था. उनके करियर का सबसे भावुक मोड़ 7 अक्टूबर 2022 को लिखा गया. इसी दिन उनकी फिल्म ‘गुडबाय' सिनेमाघरों में रिलीज हुई और उसी दिन अरुण बाली का निधन हो गया. एक कलाकार के लिए इससे बड़ा संयोग शायद ही कुछ हो कि जिस दिन उसका काम दर्शकों तक आखिरी बार पहुंच रहा हो, उसी दिन वह खुद हमेशा के लिए पर्दे के पीछे चला जाए.

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अरुण बाली आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके निभाए किरदार उनकी मौजूदगी का एहसास कराते हैं. टीवी के गंभीर पात्रों से लेकर फिल्मों के सहज और प्रभावशाली चरित्रों तक, उन्होंने साबित किया कि अभिनय में भूमिका की लंबाई नहीं, बल्कि उसे निभाने की गहराई मायने रखती है. यही वजह है कि उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें याद करना सिर्फ एक अभिनेता को याद करना नहीं, बल्कि उस दौर और उस अदाकारी को सलाम करना है, जिसने बिना शोर किए दर्शकों के दिलों में अपनी जगह बना ली.

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