66 साल पुरानी फिल्म ‘चौदहवीं का चांद' का टाइटल सॉन्ग आज भी मोहब्बत की सबसे खूबसूरत तस्वीर पेश करता है. ‘चौदहवीं का चांद हो या आफताब हो' जैसे बोल सुनते ही प्रेमिका की खूबसूरती की तारीफ आंखों के सामने आने लगती है. चांद, सूरज, फूल और नूर से सजी यह तारीफ मोहम्मद रफी की नरम आवाज में और भी खास हो जाती है. 1960 में रिलीज हुई इस फिल्म के गाने ने न सिर्फ श्रोताओं का दिल जीता, बल्कि रफी, संगीतकार रवि और गीतकार शकील बदायूनी की जोड़ी को भी यादगार बना दिया.
गुरु दत्त की फिल्म में मोहब्बत का अंदाज
‘चौदहवीं का चांद' का निर्देशन एम. सादिक ने किया था और इसे गुरु दत्त ने बनाया था. फिल्म में गुरु दत्त, वहीदा रहमान और रहमान मुख्य भूमिकाओं में थे. कहानी लखनऊ के मुस्लिम समाज की पृष्ठभूमि में दोस्ती और मोहब्बत के रिश्ते को दिखाती है. फिल्म में गुरु दत्त ने असलम, वहीदा रहमान ने जमील और रहमान ने नवाब प्यारे मियां का किरदार निभाया था.
फिल्म की कहानी के साथ इसके गानों ने भी दर्शकों पर गहरी छाप छोड़ी. टाइटल सॉन्ग में प्रेमिका की खूबसूरती की तुलना चांद और सूरज से की गई है. शकील बदायूनी के शब्दों में यह तारीफ इतनी सादगी से आती है कि गाना सुनने वाला खुद को उसी प्रेम के माहौल में महसूस करने लगता है.
रवि और रफी की जोड़ी ने रचा जादू
इस गाने का संगीत रवि ने दिया था और बोल शकील बदायूनी ने लिखे थे. गाने को मोहम्मद रफी ने अपनी आवाज दी. इसकी धुन में राग पहाड़ी का इस्तेमाल किया गया था, जिससे गाने में पहाड़ी लोकधुन जैसी मिठास और भावनाओं की नरमी महसूस होती है.
फिल्म को बाद में मॉस्को इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में भी दिखाया गया. इसके टाइटल सॉन्ग के लिए शकील बदायूनी को बेस्ट लिरिसिस्ट और मोहम्मद रफी को बेस्ट प्लेबैक सिंगर मेल का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला. इस तरह एक खूबसूरत प्रेमगीत ने न सिर्फ लोगों के दिलों में जगह बनाई, बल्कि हिंदी सिनेमा के इतिहास में भी अपनी खास पहचान बना ली.