1968 में आई फिल्म ‘नील कमल' का गीत ‘बाबुल की दुआएं लेती जा' आज भी हिंदी सिनेमा के सबसे भावुक विदाई गीतों में गिना जाता है. मोहम्मद रफी की दर्दभरी आवाज, साहिर लुधियानवी के भावुक शब्द और संगीतकार रवि की धुन ने इस गाने को ऐसा रूप दिया कि यह सिर्फ एक फिल्मी गीत नहीं रहा, बल्कि बेटियों की विदाई का एहसास बन गया. शादी में जब बेटी अपने मायके से विदा होती है, तो इस गीत के बोल सुनकर अक्सर पिता और बेटी दोनों की आंखें नम हो जाती हैं. 58 साल बाद भी इसकी भावनात्मक पकड़ पहले जैसी ही कायम है.
बेटी की विदाई और पिता के दिल का दर्द
‘बाबुल की दुआएं लेती जा' में एक पिता अपनी बेटी को विदा करते हुए उसके सुखी जीवन की कामना करता है. गीत में बेटी के बचपन से लेकर उसके ससुराल जाने तक की भावनाओं को बेहद खूबसूरती से पिरोया गया है. पिता की सबसे बड़ी चिंता यही है कि जिस घर में उसकी बेटी जा रही है, वहां उसे भरपूर प्यार और सम्मान मिले.
साहिर लुधियानवी ने इस भाव को सिर्फ दुख तक सीमित नहीं रखा, बल्कि पिता की दुआओं के जरिए बेटी के भविष्य की उम्मीद भी दिखाई. यही वजह है कि गीत सुनते हुए सिर्फ विदाई का दर्द नहीं, बल्कि एक पिता का अपनी बेटी के लिए निस्वार्थ प्यार भी महसूस होता है. सरेगामा के आधिकारिक रिकॉर्ड के मुताबिक इस गीत को मोहम्मद रफी ने गाया, संगीत रवि ने दिया और बोल साहिर लुधियानवी ने लिखे थे.
मोहम्मद रफी की आवाज में उतर आया था दर्द
इस गाने से जुड़ा एक किस्सा भी अक्सर सुनने को मिलता है कि इसे रिकॉर्ड करते समय मोहम्मद रफी भावुक हो गए थे. कई रिपोर्ट्स में भी इस चर्चित किस्से का जिक्र किया गया है कि गीत गाते समय रफी की आंखों में आंसू आ गए थे और उनकी आवाज में वह भावनात्मक असर साफ महसूस किया जा सकता था. रफी की आवाज ने गीत के हर शब्द को पिता की सच्ची दुआ जैसा बना दिया. धीमी और भावुक गायकी के कारण यह गीत सुनने वाले को सीधे उस पल में ले जाता है, जब बेटी अपने घर की चौखट छोड़कर नए संसार की ओर बढ़ती है.
‘नील कमल' से निकला गीत बना विदाई की पहचान
‘बाबुल की दुआएं लेती जा' राम महेश्वरी के निर्देशन में बनी फिल्म ‘नील कमल' का हिस्सा था. फिल्म में वहीदा रहमान, राज कुमार, मनोज कुमार और बलराज साहनी जैसे कलाकार नजर आए थे. फिल्म के संगीत की जिम्मेदारी रवि ने संभाली थी, जबकि इसके गीत साहिर लुधियानवी ने लिखे थे. फिल्म के साउंडट्रैक में रफी के अलावा आशा भोसले की आवाज में भी कई गीत शामिल थे.
इस गीत की सबसे बड़ी खासियत यही है कि समय बदल गया, शादियों का अंदाज बदल गया, लेकिन बेटी की विदाई का भाव आज भी वैसा ही है. यही कारण है कि 58 साल बाद भी ‘बाबुल की दुआएं लेती जा' बजते ही माहौल भावुक हो जाता है. यह गीत किसी एक फिल्म या दौर का नहीं, बल्कि पिता और बेटी के उस रिश्ते का गीत बन चुका है, जिसे शब्दों में पूरी तरह बयां करना शायद मुमकिन नहीं.