द केरल स्टोरी के निर्देशन सुदीप्तो सेन ने हाल ही में अपनी नई फिल्म चरक की घोषणा की है. फिल्म चरक अघोरियों की कहानी पर आधारित है. बीते दिनों फिल्म का ट्रेलर रिलीज हुआ था, जिसने खूब सुर्खियां बटोरीं. ट्रेलर लॉन्च के दौरान सुदीप्तो सेन ने एनडीटीवी से खास बातचीत की. इस दौरान उन्होंने अघोरियों की जिंदगी और उनकी सोच को लेकर बात की. साथ ही सुदीप्तो सेन ने खुलासा किया है कि उन्होंने अघोरियों को श्मशान में साधना करते और शव खाते हुए भी देखा है. नीचे पढ़ें सुदीप्तो सेन की बातचीत के अंश:-
प्रश्न: सुदीप्तो साहब, सबसे पहला सवाल मैं आपसे यह पूछना चाहता हूं कि जब आपने फिल्म ‘चरक' बनाने का सोचा, तो आपने इसकी काफी लंबी-चौड़ी रिसर्च की होगी. कितने साल की रिसर्च की आपने?
सुदीप्तो सेन: इसका दो हिस्सा है. एक हिस्सा तो वह है जब हम बचपन से चरक देखते थे. मेरे अंदर बहुत ज्यादा जिज्ञासा थी.खासकर उनकी डार्क प्रैक्टिस को लेकर. अघोरियों की जिंदगी, नागा साधुओं की जिंदगी और जो तांत्रिक प्रैक्टिस होती है, डेड बॉडी पर बैठकर साधना करना, ह्यूमन स्कल पर बैठना, ये सब मेरे लिए एक तरह का रहस्य था. इसी चक्कर में मैं काफी सारी किताबें और रेफरेंसेज इकट्ठा करता रहता था.
फिर 2021 में मुझे संजय हलदार की लिखी एक छोटी कहानी मिली. वह भी एक फिल्ममेकर हैं. वह कहानी सिर्फ तीन पेज की थी, लेकिन उसने मुझे बचपन की उन बातों की याद दिलाई. उस कहानी में सोशल इम्प्लिकेशन था. बच्चा न होने का दर्द, मां बनने की लालसा, और उसी के चलते दो बच्चों की मौत हो जाना. यह सब उस कहानी का हिस्सा था.
इस कहानी को आगे बढ़ाते-बढ़ाते हमें अंतिम स्क्रिप्ट लिखने में दो साल लगे. इन दो सालों में हमने दुनिया भर में पिछले पचास सालों में जहां-जहां ह्यूमन सैक्रिफाइस (मानव बलि) हुई है, उसका अध्ययन किया. मुख्य हिस्सा यह था कि तांत्रिक प्रैक्टिस कितनी धार्मिक स्वीकृति के साथ होती है और कितना उसमें विकृति आ चुकी है.
रिसर्च के दौरान पता चला कि चरक मूल रूप से हिंदू त्योहार नहीं था. लगभग 1000-1200 साल पहले हिंदू और बौद्धों के बीच के दौर में हिंदू धर्म ने इसे अपनाया. पहले इसे ‘गाजन' या ‘शिवेर गाजन' कहा जाता था. धीरे-धीरे यह हिंदू त्योहार बन गया, जबकि मूल रूप से यह बौद्ध परंपरा से जुड़ा था.
प्रश्न: क्या रिसर्च के दौरान आप कुछ अघोरियों से भी मिले?
सुदीप्तो सेन: सिर्फ अभी नहीं, पहले भी मिला हूं. अघोरियों की जो प्रैक्टिस है, हमारी फिल्म में भी उसका जिक्र है. हां, मिला हूं. सिर्फ अभी नहीं, पहले भी मिला हूं. मैं हरिद्वार गया था. वहां मैंने अघोरियों को श्मशान में साधना करते देखा और शव खाते हुए भी देखा. उनका जो एक्ट होता है, उनका मानना है कि जब तक आपकी पांचों इंद्रियां पूरी तरह निष्क्रिय न हो जाएं, तब तक आप उस आध्यात्मिक अवस्था तक नहीं पहुंच सकते. उनके अनुसार, अगर सारी संवेदनाएं खत्म हो जाएं तो मानव मांस खाना भी आपको गलत नहीं लगेगा.
जहां तक मेरी बात है, मैं व्यक्तिगत रूप से इन चीजों पर विश्वास नहीं करता. मुझे यह एक तरह का साइकोलॉजिकल डिसऑर्डर लगता है. हजारों साल पहले इन प्रथाओं की जो भी वास्तविकता रही हो, आज के समय में इसकी कोई प्रासंगिकता नहीं है. धर्म के नाम पर जो भी होता है, वह अक्सर एक धारणा बन जाती है.
मेरी शिक्षा और रिसर्च में कहीं भी हिंदू धर्म में इन प्रथाओं की मान्यता नहीं मिली. यह एक स्व-निर्मित प्रैक्टिस है. हमारे देश में सवाल पूछना अक्सर टैबू माना जाता है, इसलिए इस पर खुलकर चर्चा नहीं होती.
प्रश्न: जब आप रिसर्च के लिए गए, तो क्या उनसे मिलना आसान था?
सुदीप्तो सेन: मेरा एक अलग संसार था. मैंने बंगला उपन्यास ‘अमृत कुंभ' के अधिकार लिए थे और उसके लिए भी रिसर्च करता था. उस पर पहले भी फिल्म बनाने की कोशिश हुई थी. हर साल मैं कुंभ मेले में जाता था, खासकर बंगाल में.
मानव व्यवहार में मेरी रुचि रही है, धार्मिक कारणों से नहीं, बल्कि सच्चाई जानने के लिए. एक बार मैं चार दिन पहाड़ों में घूमकर लौटा तो देखा कुछ साधु एक ही जगह बैठे-बैठे गिर रहे थे, उनका शरीर सिकुड़ चुका था. मैं वहां था, उनसे बात की, काफी बातचीत हुई. बहुत कुछ देखा, लेकिन सब कुछ प्रत्यक्ष अनुभव नहीं किया.