संजय खान की पत्नी, अभिनेत्री, इंटीरियर डिजाइनर और मशहूर सोशलाइट जरीन खान का पिछले साल 7 नवंबर को 81 वर्ष की उम्र में निधन हो गया था. उनके निधन के बाद परिवार ने उनका अंतिम संस्कार हिंदू रीति-रिवाज से किया, जिसे लेकर सोशल मीडिया पर काफी विवाद खड़ा हो गया. जरीन पारसी परिवार में जन्मी थीं और शादी के बाद मुस्लिम परिवार का हिस्सा बनीं. ऐसे में कई लोगों ने उनके अंतिम संस्कार के तरीके पर सवाल उठाए. अब कई महीनों बाद उनकी बेटी फराह खान अली ने इस पूरे विवाद पर चुप्पी तोड़ते हुए बताया है कि हिंदू रीति-रिवाज से अंतिम संस्कार करना उनकी मां की अपनी आखिरी इच्छा थी और परिवार ने केवल उसी का सम्मान किया.
मां की आखिरी इच्छा थी हिंदू रीति-रिवाज से अंतिम संस्कार
विक्की लालवानी को दिए इंटरव्यू में फराह खान अली ने बताया कि उनकी मां ने जीवन रहते ही साफ कह दिया था कि उनका अंतिम संस्कार हिंदू परंपरा के अनुसार किया जाए. फराह के मुताबिक, जरीन चाहती थीं कि उनकी अस्थियों को कश्मीर की बहती नदी में प्रवाहित किया जाए. उन्होंने यह भी बताया कि उनकी मां को कब्र में दफनाए जाने का डर था क्योंकि उन्हें क्लॉस्ट्रोफोबिया था. यही वजह थी कि उन्होंने दाह संस्कार की इच्छा जताई थी और परिवार ने उनकी अंतिम इच्छा का सम्मान किया.
हिंदू और मुस्लिम, दोनों तरफ से मिली आलोचना
फराह खान अली ने कहा कि उनकी मां के निधन के बाद सोशल मीडिया पर दोनों समुदायों के लोगों ने परिवार को निशाना बनाया. कुछ मुस्लिम यूजर्स ने सवाल उठाया कि एक मुस्लिम परिवार की सदस्य का दाह संस्कार कैसे किया जा सकता है, जबकि कुछ हिंदू यूजर्स ने भी इसी बात पर आपत्ति जताई. फराह ने कहा कि यह देखकर उन्हें बेहद दुख हुआ क्योंकि उनका परिवार हमेशा सभी धर्मों का सम्मान करता आया है और हर त्योहार को मिलकर मनाता रहा है. उनके मुताबिक, किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद भी धर्म के नाम पर इस तरह की बहस बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है.
‘अब ट्रोल्स को नजरअंदाज करना सीख लिया है'
फराह खान अली ने कहा कि अब उन्होंने ट्रोल्स की बातों पर ध्यान देना छोड़ दिया है. उन्होंने खुद को “इग्नोरिंग क्वीन” बताते हुए कहा कि जिंदगी बहुत छोटी है और इसे उन लोगों के साथ बिताना चाहिए जो वास्तव में मायने रखते हैं. उन्होंने यह भी बताया कि उनकी मां की प्रार्थना सभा बेहद भावुक और खूबसूरत थी, क्योंकि उसमें वही माहौल रखा गया था जो जरीन खान की सोच और जीवन मूल्यों को दर्शाता था. फराह के मुताबिक, उनकी मां हमेशा इंसानियत और सभी धर्मों के सम्मान में विश्वास रखती थीं और परिवार ने उनके जाने के बाद भी उसी सोच को आगे बढ़ाने की कोशिश की.