यह एक नेशनल गेम बन गया है. रूल्स बिल्कुल आसान हैं: हर किसी को इसे खेलना ही है, चाहे वे इसे पसंद करें या नहीं. कुछ लोग चुपचाप खेलने वाले होते हैं, तो कुछ बहुत एग्रेसिव लेकिन कोई भी इससे बच नहीं पाता. आप कैटरीना कैफ जैसी दिख सकती हैं फिर भी 'अंकलजी' और 'आंटीजी' की जमात को लगेगा कि नौ महीने तक बच्चे को पेट में रखने के बाद आपको वजन कम करने की जरूरत है. आप ऐश्वर्या राय बच्चन की तरह 'मिस वर्ल्ड' चुनी जा सकती हैं, फिर भी आपको क्रिटिसाइज किया जा सकता है कि आप वैसी नहीं दिखतीं जैसी 32 साल पहले खिताब जीतने के समय दिखती थीं. स्वरा भास्कर की तरह आपके राजनीतिक विचार तीखे हो सकते हैं, लेकिन आप पाएंगी कि कोई भी आपसे राजनीति पर बहस नहीं करना चाहता, बल्कि आपके लुक्स में कमियां निकालना चाहता है.
पिछले हफ्ते कैटरीना की प्रेग्नेंसी के बाद की बॉडी को लेकर काफी चर्चा रही. पिछले साल नवंबर में मां बनीं इस एक्ट्रेस ने उन लोगों को नाराज कर दिया जो दूसरों की बॉडी के ठेकेदार बने फिरते हैं. इससे कही बहसें छिड़ गईं जिनका कोई अंत नहीं था. वह अकेली नहीं हैं. बहुत मोटी, बहुत बूढ़ी, बहुत ज्यादा दिखने वाली, बहुत ज्यादा बोलने वाली. ट्रोल तो ऐसी महिलाओं को पसंद करते हैं जो 'अच्छे लुक्स' के नेशनल एवरेज को किसी तरह बिगाड़ देती हैं और भारत जैसे विविधता वाले देश में, जहां गोरे और सांवले, हल्की और काली आंखें, बड़े या छोटे नैन-नक्श वाले लोग हैं, वहां यह एवरेज आखिर है क्या?
सच तो यह है कि हर समाज और संस्कृति में सुंदरता का आदर्श बदलता रहता है. जो पहले 'रूबेनेस्क' माना जाता था, उसे अब 'ओवरवेट' माना जाता है. जिसे कभी सही प्रपोर्शन वाला माना जाता था, उसे अब सिम्पल या नॉन इम्प्रेसिव माना जाता है.
इस वीकेंड 'बिग बॉस' में अपनी टीशर्ट उतारकर, अपना मेकअप पोंछकर, सलमान ने इस बात पर ध्यान खींचा कि 60 की उम्र में भी वह कितने अच्छे दिखते हैं. यहां तक कि उन्होंने अपनी हैट भी उतार दी. सलमान ने कहा कि लोग कह रहे हैं गंजा है, हेयर वीव करवा रहा है बल्कि यह उनकी आने वाली फिल्म का लुक है. सलमान ने पैपराजी को भी लताड़ लगाई जो एक्ट्रेसेज और सेलेब्स के बैकशॉट लेते हैं. जाहिर सी बात है हमें फेमिनिज्म के मशहूर चैंपियन की जरूरत है जो महिलाओं को बताए कि उन्हें 'ऑब्जेक्ट' की तरह देखा जा रहा है. अपनी एक्स-गर्लफ्रेंड से जुड़े विवाद का इस्तेमाल करके अपने कमबैक को जोर-शोर से लॉन्च करने के लिए इससे बेहतर और क्या हो सकता है.
बॉडी शेमिंग से लड़ना ऐसा काम है जिसे महिलाएं सलमान की मदद के बिना भी कर सकती हैं. उनकी शिकायतों के बावजूद, पुरुषों को शायद ही कभी महिलाओं की तरह बुरी तरह आंका जाता है. वे स्क्रीन पर उम्र कम दिखाने वाले फिल्टर का इस्तेमाल कर सकते हैं, फिल्म के लिए अपना वजन बढ़ा सकते हैं और अपनी लंबी हीरोइनों के बराबर दिखने के लिए स्टूल पर खड़े हो सकते हैं.
महिलाओं को ऐसी आजादी नहीं है. यह आलोचना सिर्फ इसलिए नहीं होती कि लोग सोशल मीडिया पर ज्यादा समय बिताते हैं और पब्लिक और प्राइवेट जिंदगी के बीच का फर्क मिट गया है. इसका कनेक्शन इस बात से भी है कि 'ओजेम्पिक' के दौर में परफेक्ट शरीर पाना कितना आसान हो गया है. 1992 की कॉमेडी-फैंटेसी फिल्म 'डेथ बिकम्स हर' में उम्र कम करने के लिए जिस जादुई दवा की जरूरत थी, वही 2024 की हॉरर फिल्म 'द सब्सटेंस' में ब्लैक मार्केट में मिलने वाली दवा बन गई. इसे पाना आसान है, इस्तेमाल करना और भी आसान है, चाहे नतीजे कुछ भी हों.
असल जिंदगी भी इसी राह पर चल पड़ी है. हर जगह 'ओजेम्पिक बॉडी' और 'आईफोन फेस' दिखाई देते हैं. एकदम सही बनावट वाले शरीर और ऐसे चेहरे जिनमें कोई हलचल नहीं दिखती. समय की मार और ग्रेविटी के असर को अब छिपा दिया जाता है- कभी एक इंजेक्शन से, तो कभी कॉस्मेटिक सर्जरी से.
हमें यह भ्रम दिया जाता है कि हमेशा जवान और खूबसूरत बने रहने की कोई कीमत नहीं चुकानी पड़ती. लेकिन सच यह है कि इसकी कीमत चुकानी पड़ती है और हर दौर में चुकानी पड़ी है. चाहे वह चीन में 'लोटस फीट' पाने के लिए पैरों को कसकर बांधने का चलन हो, जो हजारों साल तक 20वीं सदी की शुरुआत तक चली या विक्टोरियन इंग्लैंड में कॉर्सेट पहनना, जिससे कम से कम सांस लेने में तो दिक्कत होती ही थी.
एक ऐसे हफ्ते में जब 20वीं सदी के आखिर की सबसे मशहूर खूबसूरत महिलाओं में से एक की मौत के बाद फिर से चर्चा हो रही है, तो इससे मिलने वाला सबक पहले से कहीं ज्यादा साफ है. दिवंगत प्रिंसेस डायना अपनी खूबसूरती और आकर्षण के लिए दुनिया भर में पसंद की जाती थीं, लेकिन उन्हें इन दोनों चीजों के लिए भारी कीमत चुकानी पड़ी. महल में रहने के दौरान उन्हें बुलीमिया (खाने-पीने से जुड़ी बीमारी) और खुद से नफरत जैसी मेंटल कंडिशन से जूझना पड़ा. जैसा कि उनके भाई अर्ल स्पेंसर ने अपनी सनसनीखेज किताब 'स्वान सॉन्ग: डायना, माई सिस्टर' में लिखा है, सगाई की अनाउंसमेंट के कुछ ही दिनों बाद चार्ल्स ने डायना की कमर पकड़कर कहा, "ओह, यहां थोड़ी चर्बी है, है ना?" यह बात उनके लिए बहुत दुखद थी और उन्हें एक ऐसे मुश्किल हालात में धकेलने के लिए काफी थी जिससे निकलना मुश्किल हो गया. स्पेंसर लिखते हैं, "बाद में उन्होंने मुझे बताया कि सगाई और शादी के बीच उनकी कमर का साइज 29 इंच से घटकर 23½ इंच हो गया था."
अगर कोई ऐसी महिला, जो कभी दुनिया में सिर्फ एक नाम से जानी जाती थी, अपनी खूबसूरती के लिए इतनी तकलीफ झेल सकती है, तो आम लोगों का क्या होगा?
बिल्कुल कोई उम्मीद नहीं, इसीलिए हर कोई हमेशा जवान बने रहने की चाहत से अछूता नहीं है. सिर्फ ब्रायन जॉनसन जैसे लोग ही अपने शरीर को अलग-अलग नुस्खों और तरीकों के लिए लैब की तरह इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं, बल्कि हम सभी, कम या ज्यादा, हमेशा खूबसूरत बने रहने के विचार के शिकार हो गए हैं. यह बात मायने नहीं रखती कि यह कुदरत के नियम के खिलाफ है. अगर शरीर के हर उभार को सपाट कर दिया जाए, हर झुर्री को मिटा दिया जाए, और हर सिर पर अजीबोगरीब बाल उगा दिए जाएं, तो इंसान कैसा दिखेगा? हम पहले से ही एक जैसा सोचने लगे हैं. क्या 'एक जैसे दिखने के दौर' में हमें एक जैसा दिखना भी जरूरी है?
नोरा एफ्रॉन जिनका मानना था कि हर चीज एक कहानी या 'कॉपी' हो सकती है, ने 2006 में एक किताब में अपनी गर्दन को लेकर बुरा महसूस करने पर एक लेख लिखा था. उन्होंने लिखा, "हमारे चेहरे झूठ बोलते हैं और हमारी गर्दन सच बताती है." उन्होंने आगे कहा कि उम्र बढ़ने पर महिलाएं अपनी गर्दन छिपाने के लिए खुले कॉलर वाले कपड़ों की जगह टर्टलनेक, स्कार्फ और मैंडरिन कॉलर वाले कपड़े पहनने लगती हैं. हां वे ऐसा करती थीं और अब भी करती हैं. यहां तक कि डायने कीटन और ग्लोरिया स्टीनम जैसी शानदार महिलाएं भी ऐसा करती हैं.
राखी सावंत ने एक बार बड़ी कमाल की बात कही थी कि जो भगवान उन्हें नहीं दे पाए, वह उनके सर्जन ने दे दिया. लेकिन वह उन कुछ मशहूर हस्तियों में से एक थीं जिन्होंने प्लास्टिक सर्जरी करवाने की बात मानी थी. फिल्म इंडस्ट्री, जो पॉपुलर कल्चर को तय करती है, में लगभग हर किसी ने चाहे पुरुष हो या महिला सर्जरी करवाई है.
शायद हम चार्ली कॉफमैन की डिस्टोपियन एनिमेशन फिल्म 'एनोमेलिसा' (2015) जैसी दुनिया की तरफ बढ़ रहे हैं, जहां हर कोई एक जैसा दिखता और लगता है. इस वजह से फिल्म का हीरो जो एक ब्रिटिश कस्टमर सर्विस एक्सपर्ट है. मानसिक रूप से टूटने की कगार पर पहुंच जाता है. जब वह मानसिक रूप से कमजोर होने लगता है, तो वह खुद से जो सवाल पूछता है, उन पर हमें भी सोचना चाहिए: "इंसान होने का क्या मतलब है? दर्द महसूस करने का क्या मतलब है? जिंदा होने का क्या मतलब है?" और सबसे जरूरी बात, वह क्या चीज है जो हमें दूसरों से अलग बनाती है. वही फर्क हमें आगे चलकर AI-बेस्ड एल्गोरिदम से आगे रखेगा और हमें सर्वाइव करने में मदद करेगा.