टीवी और वेब सीरीज के धमाकेदार हिट शो बड़े पर्दे पर लाने का पुराना ट्रेंड रहा है. लेकिन ज्यादातर मामलों में यह ट्रेंड सिनेमाघरों के लिए गुड न्यूज लेकर नहीं आया है. अकसर सिनेमाघरों में सन्नाटा पसरा रहा और दर्शकों ने मुंह मोड़ लिया. अब अमेजन प्राइम वीडियो की धांसू वेब सीरीज 'मिर्जापुर' की फिल्म 'मिर्जापुर द मूवी' 4 सितंबर 2026 को थिएटर्स में रिलीज होने जा रही है. पंकज त्रिपाठी, अली फाजल, दिव्येंदु और रसिका दुग्गल जैसे स्टार्स के साथ यह फिल्म बिग स्क्रीन पर 'भौकाल' मचाने का वादा कर रही है, लेकिन इतिहास गवाह है कि ऐसे प्रयोग अभी तक फ्लॉप रहे हैं. आइए जानते हैं क्या रहा है इतिहास.
खिचड़ी पर बनी दो फिल्में, दोनों ही पस्त
सबसे पहले बात करें 'खिचड़ी' की. स्टार प्लस का यह कल्ट कॉमेडी शो परिवार का दिल जीत चुका था. 2010 में 'खिचड़ी: द मूवी' आई, जो हिंदी सिनेमा की पहली टीवी सीरीज आधारित फिल्म थी. प्रणीत, टिना और अन्य किरदारों की मस्ती बड़े पर्दे पर आई, लेकिन दर्शक घर बैठे टीवी पर ही देखने के आदी थे. फिल्म औसत रही, ज्यादा कमाई नहीं कर पाई. फिर 2023 में 'खिचड़ी 2' आई. जेडी माजेठिया और आतिश कपाड़िया की मेहनत, लेकिन बॉक्स ऑफिस पर खस्ता हाल. कुल मिलाकर उम्मीद से काफी कम.
'भाभीजी घर पर हैं' कब आई, कब गई, पता ही नहीं चला
अब बात आती है 'भाभीजी घर पर हैं' की. एंड टीवी का यह शो सालों से हंसी का तड़का लगाता रहा. 2026 में 'भाभीजी घर पर हैं! फन ऑन द रन' रिलीज हुई. आसिफ शेख, रोहिताश्व गौड़, शुभांगी आत्रे और रवि किशन जैसे पॉपुलर फेस भी दिखे. लेकिन ओपनिंग डे सिर्फ 25 लाख, और लाइफ टाइम कमाई 1.5 करोड़ रुपये के आसपास रही. बजट 8-10 करोड़ का था, फिल्म को 'डिजास्टर' का तमगा मिल गया. टीवी शो के फैंस थिएटर तक नहीं पहुंचे.
'ऑफिस ऑफिस' का भी हुआ बुरा हश्र
'ऑफिस ऑफिस' का भी यही हश्र हुआ. पंकज कपूर और संजय मिश्रा की यह सीरीज ऑफिस की हकीकत पर तीखा व्यंग्य करती थी. 2011 में फिल्म आई 'चला मुसद्दी...ऑफिस ऑफिस'. फिल्म वर्जन में भी वही मजा था, लेकिन दर्शकों ने नाक-भौंह सिकोड़ ली. छोटे-छोटे एपिसोड वाले शो को दो घंटे की फिल्म में ढालना आसान नहीं. हॉल खाली रहे, फिल्म साइलेंटली गायब हो गई.
क्यों बार-बार ऐसा होता है?
कारण साफ हैं. टीवी और वेब सीरीज के दर्शक फ्री में, घर बैठे एपिसोड देखने के आदी हो चुके हैं. शो के 20-30 मिनट वाले फॉर्मेट को 2.5 घंटे की फिल्म में पचा नहीं पाते हैं. बड़े पर्दे पर विजुअल्स तो अच्छे होते हैं, लेकिन वह 'वाह' वाली फीलिंग मिस हो जाती है जो साप्ताहिक एपिसोड में आती है. फिर घर के सोफे में आराम से बैठने का लुत्फ ही कुछ और होता है.
'मिर्जापुर' जैसी डार्क, इंटेंस सीरीज का केस थोड़ा अलग है. इसमें एक्शन, रिवेंज और पावर गेम्स हैं, जो थिएटर में दमदार लग सकते हैं. लेकिन इतिहास दोहराने की आशंका बनी हुई है. अब सवाल यही बनता है कि 'मिर्जापुर' का फैन बेस बड़ा है, लेकिन क्या वे टिकट खरीदकर हॉल जाएंगे?