मैं कर्ण बनना चाहता था अर्जुन नहीं, ये सब पंकज तुम्हारी वजह से था...

महाभारत का कर्ण वो पात्र है जिसका असर मेरे बचपन पर बहुत था. मैं हमेशा कर्ण बनना चाहता था अर्जुन नहीं. लेकिन आज परदे के कर्ण पंकज धीर का निधन हो गया है.

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महाभारत के कर्ण पंकज धीर का निधन

मैं कर्ण बनना चाहता था अर्जुन नहीं. मैं महाभारत का वो किरदार बनना चाहता था जिसके साथ वासुदेव नहीं जो निहत्था था. मैं महाभारत का वो किरदार बनना चाहता था जिसका दर्दनाक अंत तय था. मैं महाभारत के उस किरदार पर फिदा था, जिसकी मां ने एक वरदान को परखा और उसके जन्म पर उसे पानी में बहा दिया. मैं महाभारत के उस किरदार के दर्द के बारे में सोचता था जिसको मिला तो सिर्फ तिरस्कार. मैं महाभारत के उस किरदार जैसा दोस्त बनना चाहता था, जिसने दोस्ती की खातिर खुद को न्यौछावर कर दिया. मैं महाभारत के उस किरदार की तरह योद्धा बनना चाहता था जिसे लेकर रामधारी सिंह दिनकर ने 'रश्मिरथी' लिखी थी. महाभारत का वो किरदार था कर्ण. 

महाभारत के करण और अर्जुन

बचपन में महाभारत के कर्ण को लेकर कई कहानियां सुनी थीं. हमेशा कर्ण का किरदार कमाल का लगता था. फिर अमर चित्रकथा के जरिये उस किरदार की एक झलक देखने को मिली. तस्वीर में कर्ण कमाल का लगा. कहानी में बेमिसाल लगा. फिर वो दिन भी आया जब महाभारत टीवी पर आने वाली थी. बात 1988 की है, उम्र यही 13 साल रही होगी. महाभारत का पहला एपिसोड मजेदार लगा. कहानी पहले दिन से ही बांधकर रखने लगी. लेकिन इंतजार था उस दिन का था जब कर्ण की एंट्री होगी. अब वो दिन भी आ गया, जब कर्ण की एंट्री हुई. आंखों में तेज और चेहरे पर किसी योद्धा जैसी मूंछें लिए एक किरदार आया. पहले दिन से ही कर्ण दिल में उतर गया. बेशक ये परदे का कर्ण था, लेकिन इसने पहली ही नजर में साबित कर दिया कि अगर कर्ण रहा होगा तो ऐसा ही होगा. 

अब 13 साल की उम्र में अपने उस हीरो को परदे पर देखना जिसके बारे में सुना और पढ़ा था, अलग ही अनुभव था. अब हर इतवार को इंतजार होता तो महाभारत का. फिर धीरे-धीरे कर्ण की पीड़ा, दरियादिली, दोस्ती और बहादुरी सब सामने आती चली गई. फिर कुरुक्षेत्र के युद्ध का 17वां दिन भी आया जिस दिन अर्जुन के तीर से कर्ण की मौत हो गई. अर्जुन पर खूब गुस्सा आया कि उसने एक निहत्थे योद्धा को मौत की नींद सुला दिया. वो योद्धा जो सारी जिंदगी लोगों के तानों से निहत्था होता आया था, उसका दर्द भी उतना ही दुखद था. ये बीआर चोपड़ा की महाभारत का 89वां एपिसोड था. इस एपिसोड को देखने के बाद सारी दिन एक खालीपन सा रहा. उस दिन क्रिकेट का बल्ला भी उठाने का मन नहीं किया. मन में यही सवाल उठता रहा कि आखिर कर्ण के साथ ऐसा क्यों हुआ? अर्जुन तो महान योद्धा था, फिर ऐसा क्यों किया? कृष्ण तो भगवान थे रोक सकते थे, फिर क्यों ना किया? बालमन के अपने सवाल रहे, और वो सारे दिन गूंजते रहे. 

अब मेरे लिए महाभारत लगभग खत्म सी हो गई थी. लेकिन वो कर्ण हमेशा मेरे साथ रहा. ये पंकज धीर थे, जिन्होंने कर्ण की एक तस्वीर जेहन में रची और ऐसी रची जो आज भी नहीं निकल पाई. जब भी पंकज धीर नजर आए तो यही बात जुबान से निकली अरे महाभारत के कर्ण आ गए. बेशक कई महाभारत आईं, कई कर्ण आए, लेकिन पंकज धीर जैसा कोई नहीं....

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