पिता की मर्जी के खिलाफ संगीत में बनाया करियर, मुंबई आकर ऐसी बदली किस्मत 75 रुपये कमाने वाले नौशाद की सैलरी सीधे हो गई 25 हजार

नौशाद के पिता नहीं चाहते थे कि उनका बेटा संगीत में करियर बनाए क्योंकि उस वक्त इस तरह की करियर चॉइस को अच्छी नजर से नहीं देखा जाता था.

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नौशाद फिल्मी दुनिया के वो फनकार हैं जिन्होंने संगीत को नया आयम दिया
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नई दिल्ली:

फिल्म संगीत जगत में ऐसे कई कलाकार हुए जो आज भले ही इस दुनिया में न हों मगर उनका संगीत या रचनाएं प्रशंसकों के दिलों में हमेशा बनी रहेंगी. ऐसे ही महान संगीतकार हुए नौशाद अली...जिनके जीवन की कहानी संघर्ष, समर्पण और अद्भुत सफलता की मिसाल है. एक तरफ जहां उनके पिता ने उन्हें संगीत और घर में से एक चुनने की शर्त रख दी थी, वहीं शादी के समय उनके ससुर ने उनके गाने को ‘नई पीढ़ी को बर्बाद करने वाला' बताकर लानतें भेजी थीं.  5 मई को नौशाद की पुण्यतिथि है. नौशाद अली का जन्म 25 दिसंबर 1919 को लखनऊ में हुआ था.

परिवार को नहीं पसंद था संगीत

उस समय देश में रॉलेट एक्ट के खिलाफ स्वतंत्रता आंदोलन जोरों पर था. उनके पिता वाहिद अली अदालत में मुंशी थे. परिवार संगीत को अच्छी नजर से नहीं देखता था. बचपन में नौशाद देवा शरीफ की दरगाह पर कव्वालियां सुनकर मंत्रमुग्ध हो जाते और घंटों वहीं समय बिताया करते थे. उन्होंने लखनऊ में गुरबत अली, युसूफ अली और बब्बन साहिब जैसे उस्तादों से शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ली.

नौशाद ने रॉयल थिएटर में साइलेंट फिल्मों के लिए संगीत तैयार करने वाली टोली के साथ काम करना शुरू किया. यहीं से उन्हें संगीत निर्देशन की असली शिक्षा मिली. उन्होंने हारमोनियम सुधारने का काम भी किया. बाद में वह इंडियन स्टार थिएटर कंपनी के साथ पंजाब, राजस्थान और गुजरात के दौरे पर गए, जहां उन्होंने विभिन्न लोक संगीत शैलियों को सीखा.

पिता ने रखी शर्त संगीत चुनो या घर

जब नौशाद ने संगीत को अपना करियर बनाने का फैसला किया तो उनके पिता ने साफ कह दिया था, “संगीत और घर में से एक चुन लो.” दिल में बगावत का तूफान उठा और 1937 में नौशाद लखनऊ छोड़कर मुंबई आ गए. यहां शुरुआती दिनों में उन्हें बहुत संघर्ष करना पड़ा. कुछ दिनों तक परिचितों के यहां रहे, फिर दादर के ब्रॉडवे थिएटर के सामने फुटपाथ पर सोना पड़ा. मुंबई में उन्होंने उस्ताद झंडे खां से संगीत की बारीकियां सीखीं और न्यू थिएटर के ऑर्केस्ट्रा में पियानो वादक के रूप में काम शुरू कर दिया.

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साल 1940 में फिल्म ‘प्रेम नगर' से स्वतंत्र संगीतकार के रूप में उन्होंने शुरुआत की. गीतकार डी.एन. मधोक ने उनकी प्रतिभा पर भरोसा जताया. 1942 में फिल्म ‘नई दुनिया' और ‘शारदा' ने उन्हें पहचान दिलाई. ‘शारदा' में 13 साल की सुरैया ने नौशाद के संगीत में गाना गाया था. फिल्म ‘रतन' ने तो नौशाद की किस्मत ही बदल दी. उनकी तनख्वाह 75 रुपए से बढ़कर 25 हजार रुपए हो गई.

नौशाद की जिंदगी का एक और किस्सा है, जब नौशाद मुंबई में सफल हो चुके थे, लेकिन परिवार को अभी भी नहीं बताया गया था कि वे फिल्मों में संगीतकार का काम कर रहे हैं. निकाह हो रहा था और लाउडस्पीकर पर उन्हीं का गाना बज रहा था “आंखिया मिला के जिया भरमा के चले नहीं....” नौशाद के ससुर इस गाने को सुनकर नाराज हो गए और कहने लगे कि ऐसे गाने नई पीढ़ी को बर्बाद कर रहे हैं. नौशाद खामोश रहे और उन्होंने यह नहीं बताया कि यह गाना उनका ही है.

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नौशाद ने शास्त्रीय, लोक और पश्चिमी संगीत का सुंदर मेल फिल्मी संगीत में किया. उन्होंने मोहम्मद रफी, लता मंगेशकर और सुरैया जैसे गायकों को नई ऊंचाई दी.

(इस खबर को एनडीटीवी टीम ने संपादित नहीं किया है. यह सिंडीकेट फीड से सीधे प्रकाशित की गई है।)
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