बॉलीवुड में नेपोटिज्म की बहस पुरानी है, पर ऐसा भी नहीं है कि स्टार किड होने की वजह से काम आपको मिल ही जाए. टैलेंट अहम है. मिथुन चक्रवर्ती हिंदी सिनेमा के सुपरस्टार रहे हैं, लेकिन उनके तीसरे बेटे नमाशी चक्रवर्ती अपने पिता के नाम पर काम नहीं पाना चाहते. एनडीटीवी ने जब नमाशी से पूछा कि बॉलीवुड के मौजूदा खराब हालात की वजह क्या कॉर्पोरेटाइजेशन है, तो उन्होंने कहा—
“हां. हमारे जो मैनेजर हैं. मेरे भी अब हैं, अजय अंकल. वे पचास साल से पिताजी के साथ हैं. तब नरेशन भी नहीं होता था. प्रोड्यूसर आते थे, बोलते थे ऐसा-ऐसा कहानी है, दादा की इतनी रेट्स चाहिए. ओके हो जाता था और वो फिल्म बनती थी, हिट होती थी—यानी जो भी हो.
आज के समय में कहानी के अलावा हर चीज पर जोर है. मैं एक बहुत बड़ी कास्टिंग और मैनेजमेंट एजेंसी के पास गया था. बॉम्बे की नंबर वन है. मैं उनसे आमने-सामने बात कर रहा था. उन्होंने कहा, देखिए हमारे पास दस अभिनेता हैं. उन्होंने दस नाम गिनाए. वही अभिनेता नेटफ्लिक्स, अमेजन, हॉटस्टार और फिल्मों में आज भी दिखते हैं.
तो उन्होंने कहा ‘आप हमारे ग्यारहवें हो सकते हैं, हम पहले ही भरे हुए हैं.' मैंने कहा—‘कोई बात नहीं, लेकिन इसमें आप मुझे क्या दे सकते हो?' तो बोले—‘नहीं, आपको ऑडिशन देना होगा, फिर लुक टेस्ट करना होगा और उसके बाद आपका टैलेंट काम करेगा.'
कुछ समय बाद उनकी कुछ प्रतिभाओं की फिल्म आई और टैलेंट के अलावा उनमें सब कुछ था.
मुझे लगता है इंडस्ट्री अब दुर्भाग्य से ऐसे चल रही है कि अगर यह हमारा अभिनेता है, तो इसे हम किसी भी रोल में डाल देंगे. चाहे वो रोल उस पर सूट करे या न करे, चाहे उसे हिंदी आती हो या न हो. और मैं उस सिस्टम से जुड़ना नहीं चाहता था. मैं स्वतंत्र अभिनेता बनना चाहता था.
अब मैंने ‘बंगाल फाइल्स' में ‘गुलाम' का रोल किया, एक विलेन का रोल. कई लोगों ने कहा—इतनी जल्दी इतना निगेटिव रोल मत करो. लेकिन मेरे लिए वो ऐसा किरदार था जो मुझे आज एक अभिनेता के तौर पर उत्साहित कर रहा था.”
कॉर्पोरेटाइजेशन पर आगे बोलते हुए नमाशी कहते हैं—
“मेरा मानना है कि कॉर्पोरेटाइजेशन आने से इंडस्ट्री बहुत पेशेवर जरूर हो गई है, लेकिन पिछले दस सालों में हमने सबसे खराब फिल्में बनाई हैं. और बहुत बड़ा मसला यह है कि हम नेटफ्लिक्स और अमेजन का जो भारतीय कंटेंट देखते हैं, वो दूसरे भाषाओं में बना हुआ होता है, जिसे हम हिंदी में रीमेक कर देते हैं. या कोई कोरियन फिल्म देखकर उसकी हिंदी रीमेक बना देते हैं. साउथ की फिल्में उठा लेते हैं.
तो हिंदी सिनेमा की अपनी पहचान अब रही ही नहीं. वही सब दोहराया जा रहा है. मैं जहां भी जाता हूं, एक तो यह अंग्रेजी का झंझट है. हमें लगता है ठीक है, अंग्रेजी आनी चाहिए. लेकिन लोग हिंदी में सोच ही नहीं पाते. हिंदी शब्द उच्चारण भी नहीं कर पाते. दो शब्द हिंदी के बोलते हैं और बाकी अंग्रेजी में बात करते हैं.
संस्कृति के स्तर पर भी बॉलीवुड इस समय कहीं न कहीं खोया हुआ है और इसके अलावा वैसे भी खोया हुआ है, क्योंकि अगर हम फिल्मों की सफलता की बात करें तो फिल्में सफल हो रही हैं, लेकिन कितनी हो रही हैं—यह बहुत बड़ी बहस का मुद्दा है.”
नमाशी अपनी आने वाली फिल्म बंगाल फाइल्स के रिलीज के इंतजार में हैं जो 5 सितंबर को सिनेमाघरों में नजर आएगी.