Manoj Bajpayee Interview: गांव की लालटेन वाली जिंदगी से लेकर बॉलीवुड की चकाचौंध वाली जिंंदगी से होते हुए बॉलीवुड के सबसे दमदार एक्टर्स में शुमार होने तक, मनोज बाजपेयी का सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है. अपनी नई फिल्म में वो गवर्नर का किरदार निभा रहे हैं. एक स्पाई के रोल के बाद वो इस रोल में भी परफेक्ट नजर आएंगे. ऐसी ही उम्मीद की जा रही है. इस फिल्म के प्रमोशन में बिजी मनोज बाजपेयी ने NDTV से खास बातचीत में एक्टिंग के मुश्किल पहलुओं, ओटीटी, सबसे चैलेंजिंग रोल, अमिताभ बच्चन से पहली मुलाकात और अपने स्ट्रगल के दिनों को याद किया. बातचीत के दौरान उन्होंने ये भी बताया कि किसी किरदार में पूरी तरह उतरने के लिए उन्हें कितनी मेहनत करनी पड़ती है.
सवाल: सबसे पहले ये बताइए कि कोई ऐसी सरकारी पोस्ट है जो आप छोड़ेंगे प्रोफेसर, इंस्पेक्टर, ठीक है? इंटेलिजेंस ऑफिसर और अब गवर्नर. तो क्या अगली नजर पीएम की पोस्ट पे है?
मनोज बाजपेयी: नहीं. जो स्क्रिप्ट आती है जो स्क्रिप्ट अच्छी लगती है और मुझे लगता है कि इससे कुछ नया दर्शकों के पास जाएगा और वो स्क्रिप्ट बहुत इंगेजिंग है. इसमें दर्शकों का मन लगेगा तो उस फिल्म को या उस सब्जेक्ट को करने में बुराई ही क्या है? ऐसे लोगों की कहानी जाए जो जिनके बारे में लोग कम जानते हों. खास करके आज के समाज में जब एक नई जनरेशन पूरी तैयार हो चुकी है और उनको यह पता तो चलना चाहिए कि हम पहले क्या थे अभी क्या हैं, किस दौर में पहुंचे हैं. हम लोग एक ऐसी स्क्रिप्ट के जरिए उन तक पहुंचे जो ना सिर्फ इकोनॉमिस्ट की बात कर रही है बल्कि एक मेन स्ट्रीम तरीके से उस विषय को लेकर आ रही है, जिससे कि एक ऑटो रिक्शा वाले से लेकर एक मजदूर और आपके स्टूडियो में बैठे हुए सारे लोगों को बात समझ में आएगी. उनको रोचक लगेगी.
सवाल: मैंने कहीं पढ़ा था कि आप मैथ से बहुत घबराते हो?
मनोज बाजपेयी: कौन नहीं घबराता?
सवाल: गवर्नर में आप देश को दिवालिया होने से बचा रहे हैं. इस किरदार को आपने कैसे समझा और कैसे इसमें उतरे आप?
मनोज बाजपेयी: हमारा तो काम है. पहली बात लेकिन एक हर किरदार को तैयार करने का एक नया तरीका होता है, नया प्रोसेस होता है क्योंकि इतने सालों से हम काम कर रहे हैं और थिएटर किए हुए हैं तो हमारे पास में वो तरीके बहुत सारे हैं और बहुत सारे हम नया ईजाद भी करते हैं. जी और एक कैरेक्टर के साथ रहना और उसके बारीकियों को समझना उसकी जो बारीकियां हैं लोगों तक ले आने के लिए स्क्रिप्ट पर हम लोग बहुत काम करते हैं. हम लोग काफी पढ़ते हैं. उसको हम बहुत सारा डिस्कस करते हैं और धीरे-धीरे आप कैरेक्टर के साथ होना शुरू करते हैं. जब कैरेक्टर के साथ रहते हैं तो और भी बारीकियां आपको समझ में आती हैं और उसको जिम्मेदारी से ले आने में एक जो है एक आसानी भी होती है. लेकिन आसान तब तक नहीं हो पाता जब तक पूरा काम खत्म नहीं हो जाता क्योंकि एक्टिंग अपने आप में बड़ा डिफिकल्ट सा काम है. क्योंकि हमारे हमारे देश में ज्यादातर लोग एक्टिंग को बड़ा इजी मानते हैं. डायलॉग बोलना है. जैसे कई बार मैं आपके जैसे आप समुदाय में जाता हूं या किसी सरकारी लोगों के पास जाता हूं तो सब के सब कहते हैं थोड़ा सा हमको भी दे दीजिए काम. लेकिन ये कितना कितना मुश्किल काम है. इसके लिए एक पूरी विधा है. पहले तो लोगों तक ये समझा पाना कि एक विधा है जिसको सीखी जाती है, उसकी बारियां सीखने में एक उम्र गुजरती है. किसी भी रोल को तैयार करने में पूरी जान खपानी पड़ती है. समय देना पड़ता है, ऊर्जा देनी पड़ती है. तब जाकर के कहीं एक किरदार जो है जीवंत हो पाता है या उसको आप एक पर्दे पे ढाल पाते हैं.
सवाल: ये तो अब आपने बताया कि इसमें समय लगता है, लेकिन मनोज कोई खाली तो बैठे नहीं है. कई प्रोजेक्ट हैं, कई फिल्में आप कर रहे हैं. तो उस बीच कितना समय आपने गवर्नर के इस कैरेक्टर को दिया और सबसे मुश्किल पक्ष क्या था इस कैरेक्टर का?
मनोज बाजपेयी: देखिए 4 साल पहले मुझे ये स्क्रिप्ट मेरे पास आई थी. और उसके बाद जब तक मैंने हां नहीं बोला तब तक मैं तीन बार पढ़ चुका था. वो एक हमारा एक तरीका होता है कि आप जितनी बार पढ़ें, जितनी बार समझें, जितनी बार उसको मार्क आउट करें. कैरेक्टर के अपने जो पहलू हैं उस पर काम करें. इकोनॉमिक्स के जानकार हैं तो जाहिर सी बात है कि बहुत सारे रिसर्च आपको करने पड़ते हैं क्योंकि आप इकोनॉमिस्ट तो है नहीं. तो उस दिमाग को समझने के लिए उस तक पहुंच उसके तह तक पहुंचने के लिए जितनी सारी कोशिश हो सकती है हम लोग करते हैं और उसको इतनी बार करना पड़ता है ताकि लोगों को मैं सिंपलीफाई तरीके से परफस के जरिए समझा सकूं. लेकिन वो एक बैक बैकग्राउंड है. एक बैक ड्रॉप है सब चीजों का. आरबीआई बिल्डिंग आरबीआई बैक ड्रॉप है. बट मूलत जो कहानी है ना कि कैसे एक आदमी ने और उसके निर्णय ने हमारे देश को एक नई दिशा दी. यह एक थ्रिलर के फॉर्मेट में है. कम समय है और इसी में निर्णय लेना है और इसी में सब काम को खत्म करना है. उस कम समय में अचीव करने की जो भागादौड़ी है, जो जद्दोजहद है, जो द्वंद है, जो लड़ाई है, वो सारी चीजें आपको इस फिल्म में दिखाई देगी.
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सवाल: किसी फिल्म से जुड़ी कोई यादगार घटना या वाकया?
मनोज बाजपेयी: गंभीर किरदारों में मैं बहुत भीतर चला जाता हूं. शूटिंग के दौरान कम बोलता हूं. ताकि किरदार का टोन न टूटे. इसलिए हल्की फुल्की फिल्मों की तरह मजेदार किस्से कम याद रहते हैं.
सवाल: क्या किरदार घर तक पहुंच जाते हैं?
मनोज बाजपेयी: बिल्कुल. ऐसा नहीं होता कि स्विच ऑन किया और ऑफ हो गया. जब आप महीनों तैयारी करते हैं, तो दिमाग अगले दिन के सीन के बारे में भी सोचता रहता है. परिवार के साथ रहते हुए भी किरदार पूरी तरह दिमाग से नहीं जाता.
सवाल: फिल्म चुनते समय आप अभिनेता होते हैं या दर्शक?
मनोज बाजपेयी: मैं पहले दर्शक होता हूं. अगर कहानी मुझे उत्साहित नहीं करती, बांधकर नहीं रखती, तो उसे करने का अर्थ नहीं है.
सवाल: आपको शूटिंग के दौरान गुस्सा कब आता है?
मनोज बाजपेयी: जब मैं परफॉर्म कर रहा होता हूं और कोई कैमरे के सामने या पीछे अनावश्यक मूव करता है. उस समय एक अलग दुनिया रची जा रही होती है, और ऐसी एक्टिविटी उस भ्रम को तोड़ देती है.
सवाल: आज आपको OTT का बड़ा चेहरा माना जाता है. इस प्लेटफॉर्म ने आपके करियर को कैसे बदला?
मनोज बाजपेयी: OTT से मुझे बहुत फायदा हुआ. द फैमिली मैन के बाद नई पीढ़ी की ऑडियंस भी मेरे काम तक पहुंची. लॉकडाउन के दौरान लोगों ने पुराने और नए दोनों काम देखे, जिससे दर्शक वर्ग बढ़ा.
सवाल: सबसे कठिन किरदार कौन सा रहा?
मनोज बाजपेयी: गली गुलियां का किरदार. उसमें मानसिक रूप से बहुत डिस्टर्ब्ड किया, उस अवस्था को लगातार जीना पड़ता था. 30-35 दिन तक उस स्टेट ऑफ माइंड में रहना बेहद कठिन था.
सवाल: क्या कभी आपने फिल्म सिर्फ अभिनेता के तौर पर चुनी, दर्शक के तौर पर नहीं?
मनोज बाजपेयी: बहुत कम. कुछ फिल्में सिर्फ मजे के लिए करता हूं, जैसे कॉमेडी. वहां तैयारी का स्वरूप अलग होता है और सेट पर ही बहुत कुछ बनता है. इसमें सत्यमेव जयते का नाम लिया जा सकता है. इसके अलावा सूरज पर मंगल भारी भी वैसी ही फिल्म है.
सवाल: आपकी आने वाली फिल्में कौन सी हैं?
मनोज बाजपेयी: पुलिस स्टेशन में भूत नाम की हॉरर-कॉमेडी आ रही है. इसके अलावा एक नई नेटफ्लिक्स फिल्म और द लास्ट मैन इन टॉवर नॉवेल पर बेस्ड फिल्म भी है. आगे चलकर मैं सुधीर मिश्रा की फिल्म पर फोकस करने वाला हूं.
सवाल: आपको अभिनय की प्रेरणा किससे मिली?
मनोज बाजपेयी: बचपन में अमिताभ बच्चन का बड़ा प्रभाव था. बाद में थिएटर करते समय नसीरुद्दीन शाह और ओम पुरी के काम से बहुत सीखा. थिएटर और विश्व सिनेमा ने अभिनय की गहराइयों को समझाया.
सवाल: अमिताभ बच्चन से पहली मुलाकात कैसी रही?
मनोज बाजपेयी: बहुत अविश्वसनीय अनुभव था. बचपन के नायक अचानक सामने खड़े हों और आपके काम की बात करें, तो शब्द नहीं निकलते. बाद में उनके साथ काम करके सीखा कि इतनी बड़ी हस्ती होने के बावजूद वो आज भी एक साधारण अभिनेता की तरह मेहनत और रिहर्सल करते हैं.
सवाल: अगर आप सचमुच गवर्नर हों और अपने गांव के लिए एक फैसला लेना हो, तो क्या करेंगे?
मनोज बाजपेयी: सबसे पहले रोजगार, शिक्षा और सुरक्षा पर ध्यान दूंगा. अगर लोगों का पेट भरा होगा, बच्चों को शिक्षा मिलेगी और युवा सुरक्षित होंगे, तो वो सपने देख पाएंगे और देश को आगे ले जाएंगे.