जब भी बात हिंदी गीतों और कविताओं की आती है तो सबसे पहला ध्यान जाता है उसकी धुन पर जाता है. यही धुन होती है जिस पर कई बार यूं ही बेतरतीब बोल बैठा लिए जाते हैं और ये कमाल कर जाते हैं. ऐसा ही एक गीत आया था साल 1955 में आई फिल्म आजाद में. अब हम इस गाने के लिरिक्स बता देंगे तो आप तुरंत ही समझ जाएंगे क्योंकि आपने अपने दादा-नाना के मुंह से ये बोल जरूर सुने होंगे. ये गाना है 'अपलम चपलम'. 1955 में आई फिल्म आजाद के इस गाने ने अपने अतरंगी लिरिक्स की वजह से हमेशा ही लोगों का ध्यान अपनी तरफ खींचा है.
बात करें इस गाने को लिखने वाली हस्ती की तो वो नाम है राजेंद्र कृष्ण. राजेंद्र ने इस गीत को अपलम चपलम में उठाकर ऐसा आगे बढ़ाया कि दिल का हाल भी कह दिया और गाने को एक नई तरह की फील भी दी. राजेंद्र ने केवल यही नहीं मेरे सामने वाली खिड़की में, पल पल दिल के पास, एक चतुर नार, मन डोले मेरा तन डोले, सुख के सब साथी दुख में ना कोय जैसे सदाबहार गाने लिखे हैं.
दो बहनों ने मिलकर गाया था 'अपलम चपलम'
बात करें अपलम चपलम की तो इस गाने को आज भी चर्चा इसिलए मिलती है क्योंकि इसके लिरिक्स थोड़े अलग किस्म के थे और हर किसी के मन में यही सवाल उठता है कि आखिर इस अपलम चपलम का मतलब क्या है? अगर आप भी उन्हीं लोगों में से एक हैं तो चलिए हम बता देते हैं कि आखिर इन शब्दों का मतलब क्या होता है. इस शब्द का कोई तय शाब्दिक अर्थ नहीं है लेकिन इसे आप चुलबुले गीत या नटखट बातों के तौर पर देख सकते हैं. इस तरह के शब्द गानों में तुकबंदी और मस्तीभरा माहौल बनाने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं. इसका मतलब सीधे नटखटपन से जुड़ा होता है.
यह सदा बहार गाना लता मंगेशकर और उनकी छोटी बहन उषा मंगेशकर ने मिलकर गाया था. सुर से सुर मिलाती दोनों की आवाज आज भी कानों में पड़ जाए ये गाना मूड पूरी तरह बदल देता है. गाने का म्यूजिक सी.रामचंद्र ने तैयार किया. वे तेज और अट्रैक्टिव धुनें बनाने के लिए जाने जाते थे.
दो जुड़वा बहनों ने किया डांस
जिस तरह पर्दे के पीछे दो बहनों ने अपनी आवाज से गाने को यादगार बनाया वहीं स्क्रीन पर भी दो बहनों की जोड़ी थी. इस गाने में पॉपुलर डांसिंग जोड़ी साई और सुब्बुलक्ष्मी नजर आई थीं. वे भरतनाट्यम में ट्रेन्ड डांसर थीं. 1950-60 के दशक में साउथ सिनेमा और हिंदी सिनेमा में अपनी स्पीड, एक्युरेसी और सिंक्रोनाइज्ड मूवमेंट्स और एक्सप्रेशन के लिए जानी जाती थीं. गाने की कोरियोग्राफी हीरालाल की थी.