29 अप्रैल… ये वो तारीख है जो हर साल दिल को हल्का सा चुभ जाती है. यही वो दिन है जब बॉलीवुड के बेहतरीन एक्टर इरफान खान हमें छोड़कर चले गए, लेकिन सच कहें तो वो कभी गए ही नहीं. उनकी आवाज, उनकी आंखों की वो गहराई और उनकी एक्टिंग आज भी हर फ्रेम में जिंदा है. उनकी जिंदगी किसी सीधी लाइन की कहानी नहीं थी, बल्कि उतार-चढ़ाव, छोटे-छोटे मोड़ों और बड़े सपनों से भरी एक फिल्म थी. और उसी फिल्म का एक सीन ऐसा भी था, जब वो एक आम इलेक्ट्रिशियन बनकर सुपरस्टार राजेश खन्ना के घर AC ठीक करने पहुंचे थे, और किस्मत चुपचाप उन्हें उनकी मंजिल की तरफ धकेल रही थी.
AC रिपेयर का काम, लेकिन कहानी कुछ और थी
दरअसल एक्टिंग से पहले इरफान खान इलेक्ट्रिशियन का काम करते थे. ट्रेनिंग के दौरान वो जयपुर से मुंबई पहुंचे. एक दिन उन्हें राजेश खन्ना के घर AC ठीक करने भेजा गया. उस वक्त ये बस एक छोटा सा काम था, लेकिन जिंदगी ने उसी दिन उनके लिए एक खास याद लिख दी.
जब सामने खड़े थे राजेश खन्ना
दरवाजा खुला और सामने थे हिंदी सिनेमा के पहले सुपरस्टार राजेश खन्ना. इरफान के लिए वो पल जैसे थम सा गया. वो इंडस्ट्री का हिस्सा नहीं थे, लेकिन उस चेहरे की चमक हर किसी के दिल में थी. अपने सामने उन्हें देखकर इरफान कुछ सेकेंड के लिए बस देखते रह गए. बाद में उन्होंने बताया कि वो पल उनके लिए किसी सपने जैसा था.
यहीं बदली सोच, यहीं जगा सपना
राजेश खन्ना के घर काम करते हुए इरफान के मन में एक ख्याल आया कि अगर वो एयर कंडीशनिंग सीख लें तो अच्छी कमाई कर सकते हैं. लेकिन दिल के अंदर एक्टिंग का सपना और जोर से दस्तक देने लगा. मुंबई से लौटकर जब वो जयपुर गए, तो पिता ने उन्हें पंखों की दुकान पर बैठा दिया. लेकिन उनका मन वहां नहीं रुका, क्योंकि उनका सपना दुकान से बड़ा था.
टीवी से फिल्मों तक, और फिर दिलों तक
इरफान खान ने दूरदर्शन के शो ‘श्रीकांत' से शुरुआत की. इसके बाद ‘भारत एक खोज', ‘चाणक्य' और ‘चंद्रकांता' जैसे शोज में नजर आए. फिल्म ‘सलाम बॉम्बे' से उन्होंने फिल्मों में कदम रखा. फिर ‘हासिल', ‘पान सिंह तोमर' और ‘साहिब बीवी और गैंगस्टर रिटर्न्स' जैसी फिल्मों ने उन्हें वो पहचान दी, जो आज भी लोगों के दिलों में बसती है.
वो गए नहीं, बस यादों में बस गए
मार्च 2018 में इरफान को न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर का पता चला. दो साल तक लड़ते हुए 29 अप्रैल 2020 को उन्होंने दुनिया को अलविदा कहा. लेकिन सच ये है कि इरफान जैसे कलाकार कभी जाते नहीं, वो बस कहानियों, किरदारों और यादों में बस जाते हैं. और शायद यही उनकी सबसे बड़ी जीत है.