भारत की पहली हिंदी वाइडस्क्रीन फिल्म, जिसमें हुआ था सिनेमास्कोप टेक्नोलॉजी का यूज, रिलीज होने के बाद हुई डायरेक्टर की मौत

इंडियन सिनेमा ने अपनी शुरुआत मूक और ब्लैक एंड व्हाइट फिल्मों से की थी. धीरे-धीरे संसाधन विकसित हुए तो फिल्मों में नई-नई टेक्निक का इस्तेमाल होने लगा था.

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इस फिल्म ने बदला सिनेमा को देखने का तरीका
नई दिल्ली:

इंडियन सिनेमा ने अपनी शुरुआत मूक और ब्लैक एंड व्हाइट फिल्मों से की थी. धीरे-धीरे संसाधन विकसित हुए तो फिल्मों में नई-नई टेक्निक का इस्तेमाल होने लगा था. इंडियन सिनेमा का स्वर्णिम काल उसे भी कहा जाता है, जब पहली बार कलर और वाइडस्क्रीन फिल्में बनना शुरू हुई थी. भारत की पहली कलर फिल्म किसान कन्या (1937) है. अगर बात करें वाइडस्क्रीन फिल्म की तो यह थी साल 1959 में आई फिल्म कागज के फूल. यह एक रोमांटिक म्यूजिकल ड्रामा फिल्म है, जिसमें गुरुदत्त और वहीदा रहमान लीड रोल में थे. कागज के फूल भारत की पहली वाइडस्क्रीन फिल्म मानी जाती है, जिसके साथ कई किस्से जुड़े हैं.

आज भी पॉपुलर है फिल्म

फिल्म कागज के फूल का निर्देशन खुद गुरुदत्त ने किया था. यह फिल्म 2 जनवरी 1959 को रिलीज हुई थी और यह उनके करियर की आखिरी फिल्म थी. इस फिल्म के पांच साल बाद गुरुदत्त का निधन हो गया था. जैसा कि कागज के फूल भारत की पहली और हिंदी वाइडस्क्रीन फिल्म थी, जिसके लिए सिनेमा स्कोप प्रोसेस का इस्तेमाल किया गया था. फिल्म की बाकी की स्टारकास्ट में जॉनी वॉकर, महमूद और मीनू मुमताज ने अहम भूमिका निभाई थी. कागज के फूल हिंदी सिनेमा की सबसे बेहतरीन फिल्मों में से एक है. यह क्लासिक फिल्म 60 साल पहले के समय से बहुत आगे थी. उस समय इस फिल्म की वजह से गुरुदत्त को बहुत सारा पैसा भी गंवाना पड़ा था. इस फिल्म के बाद गुरुदत्त ने फिल्मों का निर्देशन करना बंद कर दिया था.

फिल्म के गाने भी हिट

इस क्लासिक कल्ट के म्यूजिक की बात करें तो, फिल्म में एस डी बर्मन का म्यूजिक है और फिल्म का सबसे पॉपुलर सॉन्ग 'वक्त ने क्या-क्या हसीं सितम' है. 2006 में इस गाने को 30 मुख्य संगीतकारों, गायकों और गीतकारों के 'अब तक के 20 सर्वश्रेष्ठ हिंदी फिल्मी गाने' की लिस्ट में तीसरा स्थान दिया गया था. फिल्म का मेलोडी सॉन्ग 'हम तुम जिसे कहते हैं शादी' अमेरिकन सिंगर और एक्ट्रेस डोरिस डे के सॉन्ग के सेरा-सेरा से इंस्पायर था, जिसे जे लिविंगस्टोन ने लिखा था, जोकि फिल्म द मैन हू न्यू टू मच (1956) का है. पुराने सिनेमा के शौकीन आज भी गुरुदत्त की फिल्में देखना नहीं छोड़ते हैं.



 

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