हरी हरा वीरा मल्लु: पवन कल्याण की भारतीय इतिहास की सच्चाई को दिखाने वाली फिल्म

फिल्म हरी हरा वीरा मल्लु उस इतिहास को दिखाती है जिसे अक्सर पर्दे पर नजरअंदाज किया गया है. खासकर औरंगजेब के अत्याचार को.

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ऑडियंस को पसंद आ रही हरी हरा वीरा मल्लु
नई दिल्ली:

पिछले सौ सालों में भारतीय सिनेमा ने हमें कई ऐतिहासिक फिल्में दीं. खासकर मुगल साम्राज्य पर आधारित फिल्मों ने हमेशा पर्दे पर अपनी भव्यता और शाही ठाट-बाट से दर्शकों को मोहित किया. शहंशाह बाबर (1944), हुमायूं (1945), बैजू बावरा (1952), मुगल-ए-आजम (1960) और जोधा अकबर (2008) जैसी फिल्मों ने मुगलों की शान-ओ-शौकत और प्रेम कहानियों को अमर कर दिया. लेकिन इसी दौरान, भारत के अन्य महान राजवंशों जैसे चोल, काकतीय, पांड्य, गुप्त, मौर्य और सातवाहन पर सिनेमा लगभग मौन रहा.

इसी ऐतिहासिक चुप्पी को तोड़ने आई है हरी हरा वीरा मल्लु, जिसमें पवन कल्याण मुख्य भूमिका निभा रहे हैं. यह फिल्म उस इतिहास को दिखाती है जिसे अक्सर पर्दे पर नजरअंदाज किया गया है. खासकर औरंगजेब के अत्याचार. फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे 1658 से 1707 के शासनकाल में उसने जिज्या कर लगाया, मंदिर तोड़े, और जबरन धर्मांतरण कराए. काशी विश्वनाथ और मथुरा का केशव राय मंदिर इसका उदाहरण हैं. 1675 में उसने गुरु तेग बहादुर का भी सार्वजनिक रूप से शहीदी करवाई क्योंकि उन्होंने धर्म बदलने से इनकार किया था.

फिल्म की खासियत यह है कि यह धर्म बनाम धर्म की लड़ाई नहीं दिखाती, बल्कि सत्य बनाम अन्याय की कहानी कहती है. यह किसी धर्म को बदनाम नहीं करती, बल्कि एक तानाशाह के अत्याचार को सामने लाती है. हरी हरा वीरा मल्लु सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि सांस्कृतिक सुधार का प्रयास है. यह हमें याद दिलाती है कि भारत केवल 1947 में पैदा हुआ देश नहीं है, बल्कि हजारों साल पुरानी सभ्यता है. अपनी असली पहचान पाने के लिए हमें अपने इतिहास की सच्चाई को स्वीकार करना होगा, चाहे वह विजय की हो या पीड़ा की. यह फिल्म उसी भूल चुके इतिहास की आवाज है.

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