मार्वल जैसी एक्शन फिल्मों और यूरोपीयन रोमांस के पीछे भागते-भागते अब भारतीय सिनेमा वापिस से अपनी जड़ों की तरफ लौट रहा है. भारतीय सिनेमा में अब दादी-नानी की कहानियों, देवता और भूत-प्रेतों की किंवदंतियों पर फिल्में बनाई जा रही हैं. स्त्री, तुम्बाड और कंतारा जैसी फिल्मों ने भारतीय सिनेमा को एक नई दिशा दिखाई है और अब आयुष्मान खुराना और रश्मिका मंदाना की दिवाली पर रिलीज हुई फिल्म थम्मा भी उसी दिशा में आगे बढ़ रही है. इस फिल्म की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसकी कहानी किसी एक ग्रंथ से नहीं ली गई, इस फिल्म में देवी काली और राक्षस रक्तबीज की लड़ाई से लेकर विक्रम-बेताल की कहानियों और अश्वत्थामा की अमरता की गाथा तक बताई गई है
महाकाली और रक्तबीज का संघर्ष
मार्कंडेय पुराण के देवी महात्म्य में वर्णित है कि रक्तबीज नामक राक्षस को वरदान था कि उसके रक्त (खून) की हर बूंद से नया राक्षस जन्म लेगा. उसे हराने करने के लिए देवी काली ने युद्ध में उतरकर उसका रक्त ज़मीन पर गिरने से पहले ही पी लिया जिससे उनका पुनर्जन्म रुक गया. लेकिन असुर के विनाश के बाद भी, काली का क्रोध शांत नहीं हुआ; उन्होंने अपना विनाशकारी नृत्य जारी रखा, जिससे पूरी दुनिया का विनाश होने की धमकी दी गई. उन्हें शांत करने के लिए, उनके पति भगवान शिव उनके मार्ग में युद्ध भूमि में लेट गए. जब काली ने उन पर पैर रखा, तो उन्हें अचानक एहसास हुआ कि वे अपने ही पति पर खड़ी हैं. इस एहसास में उनके क्रोध को खत्म कर दिया और उन्होंने पश्चाताप में अपनी जीभ काट ली, जो अंधे क्रोध के बाद लौटती आत्म-चेतना का प्रतीक था. इस तरह विनाश सुरक्षा में बदल गया. हिंसा मोक्ष में बदल गई. अराजकता ब्रह्मांडीय व्यवस्था में बदल गई.
फिल्म की कहानी
थम्मा में देवी काली बुराई के प्रसार को रोकने के लिए बेतालों का निर्माण करती हैं — ऐसे दिव्य प्राणी जो पिशाच नहीं हैं, बल्कि संतुलन के रक्षक हैं. इन बेतालों के राजा यक्षसन कभी काली के भक्त थे, लेकिन विभाजन के अत्याचार देखकर मानवता से निराश हो जाते हैं और मनुष्यों को ही शिकार बनाना शुरू कर देते हैं. उनके विद्रोह के कारण उन्हें सदियों के लिए कैद कर दिया जाता है.
नया थम्मा: आयुष्मान खुराना
आयुष्मान खुराना फिल्म में पत्रकार आलोक गोयल की भूमिका में हैं, जो इस प्राचीन कथा के रहस्य में उलझ जाते हैं. उन्हें काटे जाने के बाद वे खुद एक बेताल बन जाते हैं — एक ऐसा अस्तित्व जिसमें मानवता की करुणा और दैवीय शक्ति दोनों समाई हैं. यही उन्हें नया थम्मा बनाता है, एक ऐसा योद्धा जो शक्ति और विवेक के बीच संतुलन का प्रतीक है.
अश्वत्थामा और बेताल से जुड़ाव
फिल्म का शीर्षक थम्मा, महाभारत के अमर योद्धा अश्वत्थामा से प्रेरित है — जो शक्ति, अमरता और प्रायश्चित का प्रतीक माने जाते हैं. वहीं विक्रम और बेताल की गाथा की तरह, थम्मा भी नैतिकता और निर्णयों के गहरे प्रश्नों को उठाती है.
थम्मा के रिलीज के पीछे बड़ा कारण
थम्मा को दिवाली पर रिलीज करने के पीछे एक बड़ा कारण था. भारत के कई हिस्सों में, दिवाली काली पूजा के साथ मनाई जाती है, खासकर पश्चिम बंगाल और असम में, जहाँ महाकाली को बुराई का नाश करने वाली और भूले हुए लोगों की रक्षक के रूप में पूजा जाता है.
रक्तबीज, काली और बेताल की अनसुनी कथा ने कैसे बनाया ‘थम्मा’ को ब्लॉकबस्टर ?
इस फिल्म में देवी काली और राक्षस रक्तबीज की लड़ाई से लेकर विक्रम-बेताल की कहानियों और अश्वत्थामा की अमरता की गाथा तक बताई गई है
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अनसुनी कथाओं ने कैसे बनाया ‘थम्मा’ को ब्लॉकबस्टर
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