पापा बनाना चाहते थे पहलवान, बेटे ने बजाई बांसुरी- सिलसिला और डर जैसी फिल्मों में दिया यादगार म्यूजिक

पहलवान बनने के सपने को छोड़कर बांसुरी की दुनिया में छाए महान संगीतकार की संघर्ष, मेहनत और उपलब्धियों की पूरी कहानी.

विज्ञापन
Read Time: 3 mins
मशहूर बांसुरी वादक पंडित हरिप्रसाद चौरसिया की प्रेरणादायक कहानी
Social Media
नई दिल्ली:

महान बांसुरी वादक पंडित हरिप्रसाद चौरसिया ने अपनी जिद, कड़ी मेहनत और अटूट समर्पण से संगीत जगत में एक अनुपम पहचान बनाई. 1 जुलाई 1938 को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद (वर्तमान प्रयागराज) में जन्मे हरिप्रसाद का परिवार उन्हें पहलवान बनाना चाहता था, लेकिन उनके मन में संगीत की धुनें बस चुकी थीं. बचपन में ही मां के निधन के बाद उनका पालन-पोषण पिता ने किया. घर में सख्त अनुशासन था. पिता की इच्छा थी कि बेटा कुश्ती की दुनिया में नाम कमाए, इसलिए वे नियमित रूप से उन्हें अखाड़े में ट्रेनिंग के लिए ले जाते थे. लेकिन हरिप्रसाद का दिल संगीत की ओर खिंचता था. अखाड़े की मिट्टी और पहलवानों की सांसों के बीच भी उनकी आत्मा बांसुरी की सुरों में रमी रहती थी.

नहीं मानी पापा की बात

उन्होंने पिता की इच्छा के विरुद्ध जाकर पड़ोसी राजाराम के घर छुप-छुपकर संगीत सीखना शुरू किया. यहीं से उन्हें संगीत की असली बारीकियों का पहला एहसास हुआ. इसके बाद उन्होंने वाराणसी जाकर प्रसिद्ध बांसुरी वादक पंडित भोलानाथ प्रसन्ना से औपचारिक शिक्षा ग्रहण की. यही वह मोड़ था, जिसने उनके जीवन को संगीत की राह पर समर्पित कर दिया.

पंडित हरिप्रसाद चौरसिया

मेहनत और लगन ने उन्हें मात्र 19 वर्ष की उम्र में आकाशवाणी (ऑल इंडिया रेडियो) में जगह दिला दी. वहां उन्होंने कलाकार के साथ-साथ संगीतकार के रूप में भी काम किया. यहीं से उनका सफर पूरे देश तक फैलने लगा.

बॉलीवुड फिल्मों में दिया संगीत

1957 के बाद उनका करियर तेजी से ऊंचाइयों को छूने लगा. उन्होंने फिल्म संगीत में भी अपनी अलग पहचान बनाई. इसी दौरान उनकी मुलाकात संतूर वादक पंडित शिवकुमार शर्मा से हुई और दोनों ने मिलकर 'शिव-हरि' जोड़ी बनाई. इस जोड़ी ने 'सिलसिला', 'चांदनी', 'लम्हे' और 'डर' जैसी फिल्मों में यादगार संगीत रचा, जो आज भी लोगों के दिलों में बसा है.

Advertisement

फिल्मी चमक-दमक के बावजूद पंडित चौरसिया का मुख्य प्रेम शास्त्रीय संगीत से कभी नहीं डिगा. वे बांसुरी को सांस और आत्मा का अनोखा मेल मानते थे. उन्होंने भारत ही नहीं, विदेशों में भी खूबसूरत प्रस्तुतियां दीं और भारतीय शास्त्रीय संगीत को वैश्विक मंच पर गौरवान्वित किया.

अब चला रहे गुरुकुल

आज वे मुंबई और ओडिशा में गुरुकुल चला रहे हैं, जहां नई पीढ़ी को बांसुरी की कला सिखाई जा रही है. उन्हें भारत सरकार के सर्वोच्च सम्मान पद्म भूषण और पद्म विभूषण से नवाजा जा चुका है, साथ ही अनेक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हुए है. पंडित हरिप्रसाद चौरसिया की कहानी सिर्फ संगीत की नहीं, बल्कि सपनों के आगे किसी भी बाधा को पार करने की प्रेरणा है.

Advertisement
Featured Video Of The Day
ओवैसी ने क्यों की एनकाउंटर की बात?
Topics mentioned in this article
Pandit Hariprasad Chaurasia
Silsila
Darr
Bollywood
Entertainment