19 साल का लड़का रातोंरात बना स्टार, फिल्म ने जीते अवार्ड पे अवार्ड, फिर भी नहीं चला करियर, 60 साल बाद भी याद आता है ये एक्टर

एक फिल्म ने सुशील कुमार को रातोंरात स्टार बना दिया था. राजश्री प्रोडक्शंस ने उन्हें तीन साल के कॉन्ट्रैक्ट पर साइन किया, लेकिन चमकदार शुरुआत के बावजूद उन्होंने फिल्मों से दूरी बना ली और बाद में एयर इंडिया में नौकरी करने लगे.

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सुशील कुमार एक फिल्म से बन गए थे स्टार

अभिनेता सुशील कुमार ने एक ही फिल्म से ऐसी पहचान हासिल की कि आज भी उनका नाम उसी किरदार के साथ याद किया जाता है. 1964 में रिलीज हुई फिल्म 'दोस्ती' ने उन्हें घर-घर में पहचान दिलाई. हालांकि, उनकी सफलता के पीछे वर्षों का संघर्ष छिपा था. दिलचस्प बात यह है कि उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर राजश्री प्रोडक्शंस ने उनके साथ तीन साल का कॉन्ट्रैक्ट साइन किया था, जो उस दौर में किसी नए कलाकार के लिए बड़ी उपलब्धि मानी जाती थी. 

सुशील कुमार का जन्म 4 जुलाई 1945 को कराची में एक सिंधी परिवार में हुआ था. देश के विभाजन के बाद उनका परिवार सबकुछ छोड़कर भारत आ गया. पहले परिवार गुजरात के नवसारी में बसा, लेकिन वहां कारोबार नहीं चल पाया. इसके बाद 1953 में परिवार मुंबई पहुंच गया. यहां चेंबूर में रहकर उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी. बचपन से ही उन्हें डांस का शौक था. वह स्कूल और त्योहारों में होने वाले कार्यक्रमों में हिस्सा लेते थे. परिवार के एक परिचित, जो फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े थे, उन्होंने उनकी मां को सलाह दी कि सुशील को फिल्मों में काम करने दिया जाए. परिवार में आर्थिक जरूरत के चलते उनकी मां ने इसकी अनुमति दे दी.

इसके बाद सुशील कुमार ने 1958 में सिंधी फिल्म 'अबाना' से अभिनय करियर की शुरुआत की. इसके बाद उन्होंने बाल कलाकार के रूप में 'फिर सुबह होगी', 'धूल का फूल', 'काला बाजार', 'श्रीमान सत्यवादी', 'दिल भी तेरा हम भी तेरे', 'संपूर्ण रामायण', 'एक लड़की सात लड़के' और 'फूल बने अंगारे' जैसी फिल्मों में काम किया.

सुशील कुमार की जिंदगी का सबसे बड़ा मोड़ तब आया, जब राजश्री प्रोडक्शंस के मालिक ताराचंद बड़जात्या अपनी नई फिल्म 'दोस्ती' के लिए दो युवा कलाकारों की तलाश कर रहे थे. बताया जाता है कि उनकी बेटी राजश्री ने फिल्म 'फूल बने अंगारे' में सुशील कुमार का अभिनय देखा था और वह उनसे काफी प्रभावित हुईं. उन्होंने अपने पिता से सुशील कुमार का नाम सुझाया.

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इसके बाद राजश्री प्रोडक्शंस ने सुशील कुमार को तीन साल के कॉन्ट्रैक्ट पर साइन किया. उन्हें हर महीने 300 रुपए वेतन दिया जाने लगा. आज के समय के हिसाब से यह रकम छोटी लग सकती है, लेकिन उस समय यह एक नए कलाकार के लिए बड़ी बात थी. इससे उनके परिवार को भी आर्थिक सहारा मिला.

1964 में रिलीज हुई 'दोस्ती' में सुशील कुमार ने बैसाखी के सहारे चलने वाले रामनाथ का किरदार निभाया, जबकि सुधीर कुमार ने उनके नेत्रहीन दोस्त मोहन की भूमिका निभाई. दोनों कलाकारों की सादगी भरी अदाकारी ने दर्शकों का दिल जीत लिया. फिल्म का संगीत लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने तैयार किया और मोहम्मद रफी की आवाज में गाए गीत आज भी पसंद किए जाते हैं. फिल्म को बड़ी सफलता मिली और इसे हिंदी की सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला. 

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इसके अलावा, 1965 के फिल्मफेयर पुरस्कारों में फिल्म ने सर्वश्रेष्ठ फिल्म, सर्वश्रेष्ठ कहानी, सर्वश्रेष्ठ संवाद, सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशन और सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायन सहित कई बड़े सम्मान अपने नाम किए. फिल्म को मॉस्को अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में भी प्रदर्शित किया गया था.

'दोस्ती' की जबरदस्त सफलता के बाद सुशील कुमार के पास कई फिल्मों के प्रस्ताव आए, लेकिन अलग-अलग कारणों से फिल्में आगे नहीं बढ़ सकीं. उन्होंने धीरे-धीरे फिल्मों से दूरी बना ली और अपनी पढ़ाई पूरी की. इसके बाद, उन्होंने एयर इंडिया में नौकरी की और 2003 में सेवानिवृत्त हुए. नौकरी के दौरान, 1973 में देव आनंद की फिल्म 'हीरा पन्ना' की विमान में हुई शूटिंग के एक सीन में, वह अपने वास्तविक पद, यानी फ्लाइट पर्सर, के रूप में भी दिखाई दिए.

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Sushil Kumar
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