आज के दौर में बॉलीवुड जिस तरह जेन जी (Gen Z) के रिश्तों, कॉलेज रोमांस, लाइव इमोशन्स और टॉक्सिक लव स्टोरीज को दिखा रहा है, उसी कड़ी में "चांद मेरा दिल" भी एक ऐसी फिल्म बनकर सामने आती है जो सिर्फ प्यार नहीं, बल्कि प्यार के बाद आने वाली जिम्मेदारियों, ईगो, गुस्से, मां बनने के अहसास और आत्म-सम्मान की बात भी करती है. इस फिल्म में अनन्या पांडे और लक्ष्य की जोड़ी पर्दे पर नई है. यह फिल्म कहीं-कहीं 'कबीर सिंह', 'धड़क' और हाल के दौर के दूसरे सीरियस लव ड्रामाज की याद दिलाती है.
कॉलेज रोमांस से लेकर टूटते रिश्तों तक
फिल्म की शुरुआत एक आम इंजीनियरिंग कॉलेज के रोमांस से होती है. आरव और चांदनी की केमिस्ट्री शुरुआत में बेहद प्यारी, नेचुरल और जानी-पहचानी लगती है. कैंपस के वो पल, दोस्ती, देर रात तक होने वाली बातें और जवानी का वो बागी प्यार. लेकिन कहानी सिर्फ लड़के और लड़की के मिलने तक सीमित नहीं रहती. अचानक प्रेगनेंसी की बात सामने आने के बाद फिल्म एक गहरी इमोशनल करवट लेती है. चांदनी का एबॉर्शन न करवाकर बच्चे को रखने का फैसला दिखाया गया है.
अनन्या पांडे की परफॉर्मेंस
अनन्या पांडे ने अपने अब तक के करियर से अलग एक परिपक्व और भावनात्मक रूप से चुनौतीपूर्ण किरदार निभाने का प्रयास किया है. हालांकि कई भावुक दृश्यों में उनके हाव-भाव और संवाद अदायगी थोड़ी अस्थिर महसूस होती है, जिसके कारण कुछ स्थानों पर भावनाएं उतनी गहराई से दर्शकों तक नहीं पहुंच पातीं.
लक्ष्य का कमियों से भरा किरदार
लक्ष्य का किरदार कहीं-कहीं दर्शकों को शाहिद कपूर के 'कबीर सिंह' वाले आक्रामक प्रेमी की याद दिला सकता है. फर्क बस इतना है कि यहां फिल्म उनके गुस्से या वायलेंस को सही ठहराने की बजाय उसके बुरे नतीजों को दिखाने की कोशिश करती है. लक्ष्य यानी आरव का किरदार प्यार तो करता है, लेकिन उसके एंगर इश्यूज और बचकाना व्यवहार उसके रिश्ते को तोड़ देते हैं. सेकेंड हाफ में उसका पछतावा, गिल्ट और लगातार की जाने वाली कोशिशें दर्शकों को बांधकर रखती हैं, हालांकि कुछ जगहों पर स्क्रीनप्ले थोड़ा रिपीटिटिव महसूस होता है .
आज के रिश्तों का सिनेमाई आईना
पिछले कुछ सालों में बॉलीवुड ने युवाओं की लव स्टोरीज़ को नए तरीके से दिखाना शुरू किया है. चाहे 'धड़क' हो, 'कबीर सिंह' हो या कॉलेज पर बेस्ड दूसरे इमोशनल ड्रामाज सभी फिल्मों में प्यार अब सिर्फ गानों और हैप्पी एंडिंग्स तक सीमित नहीं रहता. "चांद मेरा दिल" भी उसी ट्रेंड का हिस्सा है जहाँ रिश्तों में: इमोशनल डिपेंडेंसी, अचानक प्रेगनेंसी, टॉक्सिक अटैचमेंट, शादी का प्रेशर, कम उम्र में पेरेंटिंग, और अपनी वैल्यू समझने जैसी बातें खुलकर दिखाई गई हैं.
डायरेक्शन और धर्मा प्रोडक्शंस की पैकेजिंग
डायरेक्टर विवेक सोनी ने फिल्म को दिखने में सॉफ्ट लेकिन इमोशन्स में भारी रखने की कोशिश की है. कॉलेज के हिस्से रंगीन और सपनों जैसे हैं, जबकि फिल्म का दूसरा हिस्सा तुलनात्मक रूप से अधिक रियलिस्टिक और डार्क लगता है. धर्मा प्रोडक्शंस की फिल्मों की तरह यहां भी म्यूजिक, लुक्स और इमोशनल डायलॉग्स पर काफी ध्यान दिया गया है. हालांकि डायलॉग्स काफी बेहतरीन नहीं लिखे गए हैं. गाने कहानी को आगे बढ़ाने में मदद करते हैं.
क्या फिल्म टॉक्सिक लव को सही ठहराती है?
यह सबसे बड़ा सवाल है. फिल्म कहीं-कहीं ऑडियंस को कन्फ्यूज कर सकती है, क्योंकि बुरे बर्ताव के बावजूद एक इमोशनल जुड़ाव बना रहता है. दूसरी तरफ चांदनी की जिंदगी में किसी दूसरे लड़के का आ जाना चांदनी के चरित्र पर भी सवाल खड़ा कर देता है. जहां एक तरफ वो सेल्फ रिस्पेक्ट और अपनी बच्ची के भविष्य के लिए सिंगल पैरेंट बनने को तैयार हैं तो वहीं दूसरी तरफ किसी और लड़के को अपनी जिंदगी में लाना और पति के रूप में चुनना उनकी खुद की छवि को खराब करता है, हालांकि ये दूसरी शादी होती नहीं है.
चांद मेरा दिल का फाइनल वर्डिक्ट
"चांद मेरा दिल" एक परफेक्ट फिल्म नहीं है, लेकिन यह निश्चित रूप से आज की जनरेशन की फिल्म है जो प्यार को सिर्फ एक परियों की कहानी नहीं मानती. इसमें रोमांस है, कड़वाहट है, पछतावा है, मदरहुड है और सबसे ज़रूरी, इमोशनल नतीजे हैं. अगर आपको गहरे और संजीदा रिश्ते देखना पसंद है और आप ऐसी कहानियों के शौकीन हैं जो कॉलेज रोमांस से शुरू होकर रियल लाइफ स्ट्रगल्स तक जाती हैं, तो यह फिल्म आपको कनेक्ट करेगी.