हिंदी फिल्म संगीत के इतिहास में कुछ गाने ऐसे हैं, जो दशकों बाद भी लोगों की जुबान पर बने रहते हैं. 'चाहूंगा मैं तुझे सांझ सवेरे' भी ऐसा ही एक गीत है. इस गाने के बोल इतने भावुक और गहरे हैं कि पहली बार सुनने वाला अक्सर इसे प्रेम गीत समझ बैठता है. लेकिन दिलचस्प बात यह है कि फिल्म में यह गाना किसी प्रेमी-प्रेमिका के लिए नहीं, बल्कि दो दोस्तों के अटूट रिश्ते और समर्पण को दर्शाता है. यही वजह है कि 1964 में रिलीज हुई फिल्म 'दोस्ती' का यह गीत आज भी दोस्ती की मिसाल माना जाता है.
लोग इसे रोमांटिक गाना क्यों समझते हैं?
'चाहूंगा मैं तुझे सांझ सवेरे' के बोल सुनने पर ऐसा लगता है जैसे कोई प्रेमी अपनी प्रेमिका से अपने प्यार का इजहार कर रहा हो. लेकिन फिल्म 'दोस्ती' की कहानी दो ऐसे दोस्तों के इर्द-गिर्द घूमती है, जिनमें एक नेत्रहीन है और दूसरा चल नहीं सकता. दोनों हर मुश्किल में एक-दूसरे का सहारा बनते हैं. ऐसे में यह गीत दोस्ती, भरोसे और त्याग का प्रतीक बन जाता है, न कि नायक-नायिका के प्रेम का.
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इस गाने ने बदल दी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की किस्मत
संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के करियर में यह गीत मील का पत्थर साबित हुआ. मजरूह सुल्तानपुरी के लिखे बोल और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के संगीत ने ऐसा जादू किया कि दोनों को फिल्म 'दोस्ती' के संगीत के लिए पहला फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला. इसी फिल्म ने संगीतकार जोड़ी को हिंदी सिनेमा में नई पहचान दिलाई.
मोहम्मद रफी ने क्यों ली सिर्फ 1 रुपए फीस?
इस गीत से जुड़ा एक बेहद मशहूर किस्सा भी है. बताया जाता है कि जब फिल्म से इस गाने को हटाने की बात चली तो मोहम्मद रफी इसके पक्ष में खड़े हो गए. उन्हें गीत पर इतना भरोसा था कि उन्होंने इसे गाने के लिए सिर्फ 1 रुपए फीस ली. बाद में यही गीत फिल्म की सबसे बड़ी पहचान बन गया और रफी साहब को इसके लिए सर्वश्रेष्ठ पुरुष पार्श्वगायक का फिल्मफेयर अवॉर्ड भी मिला.
आज भी क्यों है इतना खास?
करीब छह दशक बाद भी 'चाहूंगा मैं तुझे सांझ सवेरे' सिर्फ एक गीत नहीं, बल्कि सच्ची दोस्ती की मिसाल माना जाता है. यही वजह है कि यह गाना आज भी रेडियो, स्टेज शो और संगीत प्रेमियों की प्लेलिस्ट में बराबर जगह बनाए हुए है. इसके बोल, संगीत और मोहम्मद रफी की आवाज ने इसे हिंदी सिनेमा के उन चुनिंदा सदाबहार गीतों में शामिल कर दिया है, जिनकी लोकप्रियता समय के साथ और बढ़ती गई.