यूपी-बिहार के लोगों का फेवरेट है ये सोहर गीत, बच्चा पैदा होने पर गाती हैं औरतें, बुआ-फूफा वाला गाना हुआ वायरल

आज हम आपको एक भोजपुरी सोहर गीत के बारे में बताने जा रहे हैं. ये गीत सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है और इसकी वजह है इसके मजाकिया बोल. गाने में बुआ के पति यानी कि फूफा को काला रसगुल्ला बताया गया है.

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पंवरिया शैली का सोहर गीत यूट्यूब पर 6 मिलियन पार, भोजपुरी में सुपरहिट
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नई दिल्ली:

भारत की संस्कृति रंग-रंगीली है. रीति-रिवाजों और त्योहारों की बात हो तो दुनिया से कोई मुकाबला ही नहीं. बच्चे के जन्म से लेकर नामकरण, मुंडन, जन्मदिन, शादी-ब्याह, दिवाली, होली तीज त्योहार पर ना जाने कितने तरह के गाने बने हैं. आज हम आपको यूपी में गाए जाने वाले कुछ खास गीतों के बारे में बताएंगे जिन्हें सोहर नाम से जाना जाता है. ये गीत बच्चा पैदा होने के शुभ अवसर पर गाए जाते हैं. हम आपको ठेठ भोजपुरी सोहर गीत के बारे में बताने जा रहे हैं जो कि खूब चर्चा में है. इस गाने का नाम है ‘भुअर भुअर बाल रे होरिलवा के'. यह गीत वायरल इसलिए हुआ क्योंकि इसे पारंपरिक सोहर से थोड़ा अलग अंदाज में गाया गया है. ये असल में पंवरिया शैली से जुड़ा है. आमतौर पर सोहर गीतों में सास-बहू, ननद या पति-पत्नी के रिश्तों की बातें ज्यादा होती हैं. लेकिन इस गाने में बुआ-फूफा, दादा-दादी और चाचा-चाची जैसे रिश्तों पर बातें की गई हैं. यही बात इस गाने को खास बनाती है और लोगों को पसंद भी आ रही है.

क्या है पंवरिया शैली?

पंवरिया उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड के गांवों की एक पुरानी नाच-गाने से जुड़ी परंपरा है. पहले बच्चे के जन्म, मुंडन या शादी जैसे मौकों पर गांव के लोग यही शैली अपनाकर गीत गाते थे. माना जाता है कि इसका कनेक्शन रामायण काल से भी है. कहा जाता है कि भगवान राम के जन्म के समय पंवरिया गाने-बजाने वाले राजा दशरथ के महल पहुंचे थे. आज भी कुछ गांवों में यह परंपरा जिंदा है. सोशल मीडिया पर इस गीत का वायरल होना इस शैली को नई पहचान दिलाने में मदद कर रहा है.

मजाकिया अंदाज का है ये गीत

‘होरिलवा' का मतलब नवजात बच्चा है. गीत की शुरुआत बच्चे के भूरे-भूरे बालों और फूल जैसे गालों से होती है. इसके बाद मां को महलों की रानी और पिता को रंगदार बताया गया है. दादा को थानेदार और दादी को मुखिया का दर्जा दिया गया है. इसका सबसे मजेदार हिस्सा बुआ और फूफा का है. बुआ को छैना और फूफा को काला रसगुल्ला कहकर नोंक-झोंक वाले अंदाज में पेश किया गया है. यह गाना मंगल गीत के लिए पहचाने जाने वाले कवि और कहानीकार नीलोत्पल मृणाल ने लिखा और गाया है. ठेठ भोजपुरी भाषा और हल्के-फुल्के हंसी के रंगों के चलते यह गीत शहरों तक पहुंच रहा है और लोक संस्कृति को नई पीढ़ी तक ले जा रहा है.

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