कॉरपोरेट सिस्टम ने छीन ली संगीत की आत्मा? एआर रहमान के बयान से मचा हड़कंप

भारतीय संगीत जगत में छिड़ गई है एक नई बहस, जिसके तहत रचनात्मकता और फैसले लेने वालों की सोच को लेकर बड़ा मुद्दा सामने आया है.

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एआर रहमान फोटो

भारतीय संगीत जगत में छिड़ गई है एक नई बहस, जिसके तहत रचनात्मकता और फैसले लेने वालों की सोच को लेकर बड़ा मुद्दा सामने आया है. यह बहस ऑस्कर विजेता संगीतकार ए.आर. रहमान द्वारा बीबीसी को दिए गए एक इंटरव्यू के बाद शुरू हुई, जिसमें उन्होंने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के बदलते म्यूज़िक इकोसिस्टम पर खुलकर बात की. बीबीसी से बातचीत में ए.आर. रहमान ने कहा कि पिछले करीब आठ वर्षों में उनके पास आने वाला काम पहले के मुकाबले कम हुआ है. रहमान ने इस बदलाव की वजह इंडस्ट्री में बदले हुए पावर स्ट्रक्चर को बताया. उन्होंने कहा, “आज फैसले ऐसे लोग ले रहे हैं, जो खुद रचनात्मक नहीं हैं.”

रहमान ने यह भी इशारा किया कि इस बदलाव के पीछे एक सामुदायिक सोच का पहलू भी हो सकता है, हालांकि यह कभी खुलकर सामने नहीं आता. उन्होंने कहा, “यह बात सीधे नहीं कही जाती, लेकिन मुझे ‘चाइनीज़ व्हिस्पर्स' के ज़रिए पता चलता है कि आपको बुक किया गया था, लेकिन म्यूज़िक कंपनी ने आगे बढ़कर अपने पांच कंपोज़र्स रख लिए.”

दक्षिण भारत से हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखने वाले और वहां अपनी जगह बनाने वाले पहले बड़े संगीतकारों में शामिल रहमान ने इस पूरे अनुभव को बेहद शांत तरीके से लिया. उन्होंने कहा, “मैंने कहा, ‘अच्छा है, मेरे लिए आराम, मैं अपने परिवार के साथ वक्त बिता सकता हूं". रहमान के इस इंटरव्यू के सामने आते ही इंडस्ट्री में यह सवाल उठने लगा कि क्या आज का म्यूज़िक सिस्टम रचनात्मक सोच से ज़्यादा कॉरपोरेट फैसलों पर चल रहा है. इसी मुद्दे पर संगीतकार और गायक लेस्ली लुईस की प्रतिक्रिया भी सामने आई.

लेस्ली लुईस ने कहा कि म्यूज़िक इंडस्ट्री में आया यह बदलाव किसी एक व्यक्ति या समूह की वजह से नहीं है, बल्कि यह समय के साथ स्वाभाविक रूप से हुआ है. उन्होंने कहा, “म्यूज़िक इंडस्ट्री में खुद बदलाव आया है. अब सिर्फ पुराने लोग नहीं हैं. नए लोग आए हैं, नई सोच आई है और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स ने पूरे पैमाने बदल दिए हैं.” लेस्ली के मुताबिक यूट्यूब और इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म्स ने कलाकारों को खुद का लेबल बनने का मौका दिया है. उन्होंने कहा, “आज कलाकार खुद अपना संगीत रिलीज़ कर सकता है, लेकिन इसके साथ फैसले लेने की प्रक्रिया ज़्यादा कॉरपोरेट हो गई है.”

लेस्ली ने मौजूदा सिस्टम पर सवाल उठाते हुए कहा, “पहले जिन लोगों के हाथ में फैसले होते थे, उनके पास अनुभव और क्रिएटिव समझ होती थी. आज जो फैसला ले रहा है, वह ज़्यादातर यह देखता है कि उसकी नौकरी सुरक्षित रहे. म्यूज़िक से प्यार होना और सही कलाकार को चुनने का अनुभव होना, दोनों अलग बातें हैं.” इसके बाद इस बहस में दिग्गज गायक हरिहरन की आवाज़ भी जुड़ी. हरिहरन ने मौजूदा हालात को संतुलित नज़रिये से देखा. उन्होंने कहा, “यह मामला न पूरी तरह काला है और न पूरी तरह सफेद. यह एक ग्रे एरिया है.”

हरिहरन ने ज़ोर देकर कहा कि संगीत जैसे रचनात्मक क्षेत्र में संवेदनशीलता सबसे अहम है. उन्होंने कहा, “आपको पहले क्रिएटिविटी के बारे में सोचना चाहिए और पैसे के बारे में बाद में. अगर कला में सिर्फ पैसे को प्राथमिकता दी जाएगी, तो भविष्य को लेकर चिंता होना तय है.” इन तमाम बहसों के बीच संगीत जगत में एक सकारात्मक पहल भी सामने आई है. कलाकारों की अगुवाई में शुरू किया गया नया म्यूज़िक प्लेटफॉर्म ‘गूंगूनालो' इसी चर्चा के बीच उम्मीद की एक नई किरण बनकर उभरा है.

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मुंबई में लॉन्च हुए इस प्लेटफॉर्म का मकसद कलाकारों को उनके संगीत पर मालिकाना हक देना है. गूंगूनालो की शुरुआत 100 ओरिजिनल गानों के साथ हुई है, जहां संगीतकार, गायक और गीतकार बराबरी के हिस्सेदार के तौर पर काम कर सकते हैं. जावेद अख्तर और शंकर महादेवन जैसे वरिष्ठ कलाकारों ने इस पहल का स्वागत करते हुए कहा है कि ऐसे प्लेटफॉर्म्स ही संगीत इंडस्ट्री में रचनात्मक आज़ादी और भरोसे को दोबारा मजबूत कर सकते हैं.

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