अनु कपूर के दिल में आज भी बसती है दिल्ली, फिल्मों में कबसे दिखाई जा रही है दिल्ली

इस महीने की 24 तारीख को रिलीज होने वाली फिल्म 'उत्तर का पुत्तर' में अनु कपूर ने वास्तु को पसंद करने वाले एक ऐसे शिक्षकी की भूमिका निभाई है जो फिजिक्स पढ़ाता है. एक बातचीत में उन्हें बताया कि किस बात ने उन्हें इस फिल्म को करने की प्रेरणा दी.

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नई दिल्ली:

दिल्ली में फिल्म की शूटिंग चल रही है. ब्रेक के वक्त अनु कपूर एक शांत कोने में आराम से बैठे हैं. जिस फिल्म की शूटिंग हो रही है, उसका नाम है 'उत्तर दा पुत्तर'. यह एक कॉमेडी फिल्म है. इसके पोस्टर में अनु कपूर एक विशाल वास्तु चक्र के ऊपर टॉयलेट पर बैठे उत्तर दिशा में दिख रहे हैं. चारों तरफ कलाकार और वे खुशी-खुशी उलझन में उत्तर दिशा की तरफ ताक रहे हैं. देखते ही हंसी छूट जाती है.

फिल्म में अनु कपूर एक अनुभवी फिजिक्स टीचर की भूमिका में हैं. वे स्टूडेंट्स को आईआईटी प्रवेश परीक्षा क्रैक करने की तैयारी करवाते हैं. लेकिन खुद वास्तु के बड़े भक्त हैं.उनका सपना है कि कोई परफेक्ट नॉर्थ फेसिंग घर मिल जाए, तो किस्मत खुद-ब-खुद संवर जाएगी. दिशाएं बदलते-बदलते उनकी जिंदगी हंसी-मजाक भरी हो जाती है.

इंसान के जीवन में कहां से आता है बदलाव

अनु कपूर बताते हैं कि इस फिल्म की स्क्रिप्ट पढ़ते ही कहानी दिल को छू गई थी. यह फिल्म हम जैसे आम लोगों के बारे में है,जो अपने जीवन से जुड़े सवालों के जवाब दिशाओं में, तारों में, घर के खास कमरों में तलाश करते हैं. लेकिन असली बदलाव तो अंदर से आता है. इस फिल्म में अनु कपूर का किरदार एक विज्ञान टीचर का है, जो वास्तु की दुनिया से अपने को जोड़ता है. 

आपको ये कहानी क्यों छू गई? इस सवाल का जवाब अनु कपूर मुस्कुराते हुए देते हैं. वो बताते हैं,''थीम बहुत कमाल की है. हम सब कभी-कभी खुद से बाहर जवाब तलाशते हैं. मेरा किरदार वास्तु के नियमों और असली जिंदगी के बीच उलझता है. फिल्म इसे ह्यूमर और दिल से दिखाती है. ये आस्था का मजाक नहीं उड़ाती, बल्कि नरमी से कहती है कि वास्तु सद्भाव
बना सकता है, लेकिन सच्चा बदलाव हमारे कर्म से आता है.ईमानदार मेहनत और सही फैसलों से आता है. यही बैलेंस मुझे सबसे ज्यादा पसंद आया.''

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अनु कपूर फिल्मी दुनिया में 44 साल का सफर तय कर चुके हैं.'मिस्टर इंडिया', 'डर', 'विकी डोनर', 'स्लमडॉग मिलियनेयर', 'रेनकोट', 'जॉली एलएलबी 2' जैसी फिल्मों में अलग-अलग रोल किए. वे कहते हैं,''मुझे ऐसी कहानियां पसंद हैं, जो मनोरंजन के साथ सोचने पर मजबूर करें.'उत्तर दा पुत्तर' ठीक यही करती है. ये कॉमेडी है, लेकिन गहरा मैसेज भी देती है.''

उम्मीदें, संघर्ष और छोटी-छोटी खुशियां

फिल्म बनाते वक्त सबसे यादगार क्या रहा? इस सवाल पर अनु कपूर कहते हैं कि कहानी रोजमर्रा की भारतीय जिंदगी जैसी लगती है- उम्मीदें, संघर्ष और छोटी-छोटी खुशियां.

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इस फिल्म का प्रोड्यूस किया है संदीप कपूर ने. इससे पहले उन्होंने 'जुगाड़', 'अनारकली ऑफ आरा' और नेशनल अवॉर्ड विनिंग 'भोंसले' जैसी फिल्में बनाईं हैं. फिल्म के लेखक और डायरेक्टर रविंदर सिवाच हैं. प्रोमोडोम मोशन पिक्चर्स के बैनर तले संदीप और प्रिया कपूर ने इस फिल्म को बनाया है.

फिल्म की शूटिंग दिल्ली करोल बाग के 108 फीट ऊंची हनुमान जी की मूर्ति वाले मंदिर, कनॉट प्लेस, इंडिया गेट, कुतुब मीनार जैसी जगहों पर हुई है. दिल्ली की इन जगहों ने फिल्म को बहुत असली और घर जैसा एहसास दिया है. दिल्ली या देश के किसी भी छोटे-बड़े शहर के लोग आसानी से इस कहानी से खुद को जोड़ लेंगे.

'अब दिल्ली दूर नहीं' से 'उत्तर दा पुत्तर'

इस फिल्म में दिल्ली की छवियां नजर आएंगी. माना जाता है कि बॉलीवुड फिल्मों में दिल्ली की छवियां बीआर चोपड़ा की 1954 में आई फिल्म 'चांदनी चौक' से देखने को मिलनी शुरू हुई थीं. फिल्म का क्लाइमेक्स मुंबई में बने चांदनी चौक के नकली सेट पर फिल्माया गया था, जहां उर्दू-इंग्लिश बोर्ड पर इसका नाम है. उसके बाद 1956 में 'न्यू डेल्ही' फिल्म आई. इसमें किशोर कुमार,वैजयंतीमाला, नाजिर हुसैन, नाना  पलसीकर मुख्य किरदार में थे. इसकी कुछ शूटिंग बोट क्लब पर हुई थी.  मिहिर पंड्या ने अपनी किताब 'शहर और सिनेमा, वाया दिल्ली' में लिखा है कि सामुदायिक वफादारियों से बंधे समाज में आधुनिक राष्ट्र-राज्य द्वारा सार्वभौम नागरिक की अवधारणा स्थापित करने का प्यास 'न्यू डेल्ही' के मूल में है.

'न्यू डेल्ही' 1956 में रीलिज हुई. उसके अगले ही साल 'अब दिल्ली दूर नहीं' रिलीज हो गई. इसके निर्माता राज कपूर थे. 'अब दिल्ली दूर नहीं' में लोहे का पुराना पुल, दरियागंज और कनॉट प्लेस को दर्शक देखते हैं.इसके बाद 1965 में 'टार्जन कम्स टू डेल्ही' आई थी. इसमें कनॉट प्लेस और पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन को दिखाया गया था. इसके बाद तो दिल्ली दर्जनों फिल्मों में आई.

दिल्ली अनु कपूर के दिल में बसती है. वे दिल्ली स्थित नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (एनएसडी) के छात्र रहे हैं. एनएसडी के दिन आज भी उनके सबसे कीमती यादों में शुमार हैं. बंगाली मार्केट, रिफ्यूजी मार्केट, मंडी हाउस, वकील लेन से जुड़ी यादें उनके दिल में बसती हैं. वो बताते हैं कि एनएसडी ने उन्हें अनुशासन, शब्दों की ताकत और लोगों से दिल से जुड़ने का हुनर सिखाया. वो याद करते हुए कहते हैं कि एनएसडी में केवल एक्टिंग ही नहीं, बल्कि आसपास की जिंदगी को गौर से देखना भी सीखा. इंसानी भावनाओं को समझने की ये गहराई आज भी हर रोल में काम आती है. 'उत्तर दा पुत्तर' पर काम करते हुए उन्हें फिर से साबित करने का मौका मिला और मजा भी आया. अनु कपूर बताते हैं कि दिल्ली में हुई इस फिल्म की शूटिंग ने मस्ती को और बढ़ा दिया. शहर की एनर्जी स्क्रीन्स पर साफ दिखेगी. यह फिल्म 24 जुलाई को रिलीज हो रही है.  

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(डिस्क्लेमर: लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, वो देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में अलग-अलग विषयों पर लेख लिखते हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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