फौज में नौकरी करके बॉलीवुड में आया ये दिग्गज, कई पीढियों के साथ किया काम, गाने हैं खूब पॉपुलर

रोजमर्रा की छोटी-छोटी घटनाओं को गीतों में बदलने वाले गीतकार आनंद बक्शी ने शब्दों में ढाला जिंदगी का दर्द और प्यार. 

विज्ञापन
Read Time: 3 mins
रोजमर्रा की छोटी-छोटी घटनाओं को गीतों में बदलने वाले गीतकार
नई दिल्ली:

सिनेमा जगत में ऐसे कई सितारे हुए जो आज भले ही इस दुनिया में न हों मगर उनके काम आज भी प्रशंसकों के दिलों में जिंदा हैं और हमेशा रहेंगे. ऐसे ही कलाकार थे आनंद बक्शी "कुछ तो लोग कहेंगे…” जैसे अमर गीतों के रचयिता, गीतकार आनंद बक्शी की आज पुण्यतिथि है. अपने हजारों गीतों के जरिए लोगों के दिलों में जीवित हैं. आनंद बक्शी का जन्म 21 जुलाई 1930 को रावलपिंडी (अब पाकिस्तान) में हुआ था. बंटवारे के समय वह सिर्फ 17 साल के थे. अपनी जन्मभूमि छूट जाने का दर्द उन्होंने जीवन भर महसूस किया. वर्षों बाद उन्होंने ‘रावलपिंडी' नाम की एक नज्म लिखी, जो उनकी भावनाओं को बयान करती है.

फौज में की नौकरी

फौज में नौकरी करने के बाद आनंद बक्शी मुंबई आए. यहां उन्होंने संघर्ष की शुरुआत की. बतौर गायक काम करने का सपना था, लेकिन किस्मत ने उन्हें गीतकार बना दिया. साल 1962 में फिल्म ‘मेहंदी लगी मेरे हाथ' से उन्हें पहली बड़ी सफलता मिली. 1965 उनका सबसे यादगार साल रहा, जब ‘जब जब फूल खिले', ‘हिमालय की गोद में' और ‘चांद सी महबूबा' जैसे सुपरहिट गाने आए. 1967 में फिल्म ‘मिलन' के गाने “हम तुम युग युग से…” आज भी लोकप्रिय हैं.

ये भी पढे़ं- 40 साल में लिखे 4000 गाने, 'अंधा कानून' में अमिताभ के लिए लिखे गीत के लिए क्यों आनंद बक्शी पड़ा पछताना, बोले- मुझसे गलती हो गई... 

रोजमर्रा के घटनाओं को गानों में बदला

आनंद बक्शी की खासियत थी कि वह रोजमर्रा की छोटी-छोटी घटनाओं को गीतों में बदल देते थे. एक बार ट्रक के पीछे लिखे “मेरे हमसफर” को देखकर उन्होंने “मेरे हमसफर” गाना लिखा. एक बार वॉशबेसिन पर हाथ धोते हुए सुभाष घई की फिल्म ‘सौदागर' के लिए गाना लिख डाला. ‘मेरा गांव मेरा देश' में “मार दिया जाए, छोड़ दिया जाए…” वाली लाइन उन्होंने राजा पोरस और सिकंदर की कहानी से प्रेरित होकर लिखी. ‘अच्छा तो हम चलते हैं' गाने की पूरी कहानी भी बेहद दिलचस्प है. लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के साथ जब गाना नहीं बन पा रहा था, तभी यह आइडिया आया.

Advertisement

बच्चों को दी सीख

आनंद बक्शी ने संगीतकारों की कई पीढ़ियों के साथ काम किया, एस.डी. बर्मन, आर.डी. बर्मन, चित्रगुप्त, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, कल्याणजी-आनंदजी, राजेश रोशन, अनु मलिक और विजू शाह तक. ‘रूप तेरा मस्ताना', ‘आदमी मुसाफिर है', ‘एक दूजे के लिए' जैसे सैकड़ों गीत उन्होंने लिखे. वे खुद भी कुछ गाने गा चुके थे, जैसे ‘बालिका वधू' का “जगत मुसाफिर खाना….” उनके बेटे राकेश बख्शी बताते कि पिता के रूप में वे बहुत प्यारे थे. रात को देर से आने पर भी बच्चों को थपथपा कर देखते थे. खाने की बर्बादी न करने की सीख उन्होंने बच्चों को मां के त्याग की कहानी सुनाकर दी. आनंद बक्शी फिल्मफेयर पुरस्कार समेत कई सम्मानों से नवाजे गए. उन्होंने गीतों के जरिए प्यार, दर्द, खुशी और जिंदगी का पूरा दर्शन दिया.  

ये भी पढे़ं- करिश्मा कपूर को किया इस 25 साल पुरानी फिल्म के लिए साइन, शाहरुख खान ने करवा दिया था रिप्लेस, प्रेग्नेंसी में शूट किया गाना

Advertisement
(इस खबर को एनडीटीवी टीम ने संपादित नहीं किया है. यह सिंडीकेट फीड से सीधे प्रकाशित की गई है।)
Featured Video Of The Day
किस नारियल में होगा ज्यादा पानी? सोशल मीडिया पर वायरल इस ट्रिक से पहचानें
Topics mentioned in this article