आखिर साउथ फिल्मों से सफलता हासिल क्यों नहीं कर पा रहा बॉलीवुड
अक्षय कुमार ने जब भी किसी रीमेक फिल्म को हाथ लगाया वह सुपरहिट बन गई. इसकी मिसाल राउडी राठौर जैसी फिल्म है. लेकिन बच्चन पांडेय उनके लिए वह करिश्माई काम नहीं कर सकी. फिल्म जिगरतांडा का रीमेक थी. लेकिन बॉक्स ऑफिस पर नहीं चल सकी. इस तरह पिछले कुछ समय से देखने को मिला है कि बॉक्स ऑफिस पर साउथ की फिल्मों के रीमेक रंग नहीं जमा पा रहे हैं. इसकी मिसाल बच्चन पांडे के अलावा, शाहिद कपूर की जर्सी (इसी नाम की तेलुगू फिल्म का रीमेक), शिल्पा शेट्टी की निकम्मा (मिड्ल क्लास अबाई) और राजकुमार राव की हालिया रिलीज 'हिट (इसी नाम की तेलुगू फिल्म का रीमेक)' है.
आखिर क्यों साउथ की रीमेक फिल्में हो रही हैं फ्लॉप: जानें 5 वजहें
- खराब एग्जीक्यूशन: सिर्फ किसी सुपरहिट फिल्म की रीमेक बना दिए जाने से ही फिल्म हिट नहीं हो जाती है. उसका एग्जीक्यूशन भी अच्छा होना चाहिए. ऑडियंस के साथ कनेक्शन पॉइंट भी होना चाहिए और फिर रीमेक में कुछ ऐसा होना चाहिए जो उसे ओरिजिनल से अलग करे और दर्शकों को थिएटर तक लाने का काम करे.
- स्टारकास्ट में चूक: किसी भी फिल्म के लिए उसके स्टार ही सबकुछ होते हैं. अब निकम्मा को ही लीजिए, यह तेलुगू फिल्म मिड्ल क्लास अबाई का रीमेक थी. फिल्म में साउथ के बड़े स्टार नानी थे. लेकिन जब बॉलीवुड में बनाया गया तो इसमें भाग्यश्री के बेटे अभिमन्यु दासानी नजर आए. फिल्म में शिल्पा शेट्टी भी थीं. लेकिन एक्टिंग के मोर्चे पर फिल्म बेहद कमजोर रही और इसमें एक वजह स्टारकास्ट भी रही. तड़प भी ऐसी ही फिल्म रही जो आरएक्स 100 की रीमेक थी.
- ऑडियंस के मुताबिक ट्रीटमेंट नहीं: किसी भी फिल्म का रीमेक बनाते समय उसके टारगेट ऑडियंस को ध्यान में रखा जाता है. देखा गया है कि फुलटू एंटरटेनमेंट फिल्म का ही रीमेक धमाल मचा पाता है. राजकुमार राव की हिट तेलुगु फिल्म की रीमेक है, लेकिन वह भाषा में काफी पसंद की गई थी. लेकिन हिंदी दर्शकों ने उसे नकार दिया. इस तरह दर्शकों की चॉइस भी फिल्म को लेकर अहम रहती है.
- डायरेक्टर को लेकर गलत चॉयस: तमिल एक्शन कॉमेडी जिगरतांडा को कार्तिकु सब्बाराज ने डायरेक्ट किया और फिल्म ने धमाल मचा दिया जबकि इसका हिंदी रीमेक बच्चन पांडेय डायरेक्शन के मामले में कमजोर रहा. फिल्म को फरहाद सामजी ने डायरेक्ट किया था. इस तरह अक्षय कुमार जैसे स्टार भी फिल्म को बचा नहीं पाए. इसलिए शिप का कप्तान मजबूत होना जरूरी है.
- कहानी में लापरवाही: फिल्म मतलब एक कहानी. कहानी में जबतक उसके पात्र, घटनाएं और पूरा माहौल दर्शक के दिल में नहीं उतरेगा, वह उस फिल्म को गले नहीं लगाएगा. सिर्फ कहानी गढ़ने से फिल्म कामयाब नहीं हो सकती, उसमें फीलिंग्स को दर्शकों तक पहुंचाने या उन्हें छूने का माद्दा भी होना चाहिए. वर्ना फिल्म का कोई मतलब नहीं.
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