1970 के दशक में फिल्मों के गानों की कुछ अलग ही बात हुआ करती थी. ये गाने बहुत ही डीप हुआ करते थे. मतलब कि इनके बोल सीधे तो होते थे लेकिन जब समझने बैठ जाएं तो ऐसे गहरे मतलब निकल आते थे कि कलेजा छलनी हो जाए. गानें चाहें प्यार के हों या प्यार के दर्द के हर गीत ने सुनने वालों का दिल छुआ. यही वजह है कि इन गानों के दीवाने आज इतने साल बाद भी इन्हें याद करते हैं और गुनगुनाते हैं. आज हम आपको 1975 के एक ऐसे ही गीत के बारे में बताने जा रहे हैं. ये गाना साल 1975 में आई फिल्म डाकू में था.
इस फिल्म में कबीर बेदी डाकू राजू के किरदार में थे, जो अपने पिता की हत्या का बदला लेने के लिए निकलता है. पिता का हत्यारा था क्रूर डाकू पन्ना (अमरीश पुरी). डाकू पन्ना चंपा (बिंदू) के परिवार की हत्या कर उसे उठा ले जाता है और वैश्यालय की क्रूर जिंदगी में धकेल देता है. एक दिन अचानक चंपा की मुलाकात बचपन के दोस्त राजू से हो जाती है. खतरों के बीच उनका प्यार खिलता है, शादी होती है और बेटी पैदा होती है. फिर भी दुख और जुदाई का सिलसिला चलता रहता है, जब तक कि अंत में न्याय नहीं हो जाता.
इस खून-खराबे और प्यार के बीच एक दर्द भरा गाना गूंजा “कभी गम से दिल लगाया”. इसे नरेंद्र चंचल ने गाया था. उनकी आवाज में एक अलग ही ताकत और इमोशन था. फिल्मी गानों और भजनों में उनकी गायकी अपनी पहचान रखती है. चंचल की गहरी आवाज ने गाने के हर शब्द को जीते-जागते दर्द में बदल दिया. रात भर रो-रोकर गुजारना, चांद-तारों को गिनना और यादों के सहारे दिन काटना. इस गाने का संगीत श्यामजी-घनश्यामजी दिया था की जोड़ी ने.
इस जोड़ा का सरल लेकिन दिल को छू लेने वाला म्यूजिक फिल्म के कठोर और भावुक माहौल से पूरी तरह मेल खाता था. गाने के बोल चमन लाहौरी ने लिखे जो कि गम को गले लगाने, आंसुओं में सुकून ढूंढ़ने और जुदाई के दर्द को चुपचाप सहने की बात करते हैं. डाकू कोई बड़ी हिट फिल्म नहीं बनी, लेकिन कबीर बेदी की मजबूत लीड एक्टिंग, बिंदू और अमरीश पुरी के दमदार किरदार और नरेंद्र चंचल के इस यादगार गाने ने इसे यादगार बना दिया. “कभी गम से दिल लगाया” आज भी एक अनमोल गाना है जो बताता है कि संगीत कैसे व्यक्तिगत दुख को सबके दिलों से जोड़ देता है.
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