हर लड़की की प्लेलिस्ट में शामिल है राजस्थान का ये 35 साल पुराना गाना, श्रीदेवी ने बनाया था सुपरहिट

35 साल पहले श्रीदेवी पर फिल्माया गया यह लोकप्रिय गीत आज भी हर लड़की की पहली पसंद है. इस एवरग्रीन गीत का जादू शादियों, डांस परफॉर्मेंस और संगीत प्रेमियों के दिलों पर कायम है.

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सुपरहिट है श्रीदेवी की फिल्म लम्हे का यह गाना

हिंदी सिनेमा के इतिहास में कुछ गाने ऐसे हैं जो सिर्फ फिल्मी गीत बनकर नहीं रह जाते, बल्कि एक संस्कृति, परंपरा और भावनाओं का प्रतीक बन जाते हैं. साल 1991 में रिलीज हुई यश चोपड़ा की सुपरहिट फिल्म लम्हे का मशहूर गीत ‘मोरनी बागा मा बोले' भी ऐसा ही एक गाना है. 35 साल पहले इस गीत पर श्रीदेवी ने अपनी अदाओं और शानदार नृत्य से जान डाल दी थी, लेकिन इसकी लोकप्रियता आज भी वैसी ही बनी हुई है. आज भी शादी-ब्याह, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और डांस परफॉर्मेंस में यह गीत खूब सुनाई देता है. खासकर लड़कियों के बीच यह गाना बेहद लोकप्रिय माना जाता है. इसकी मधुर धुन, लोक रंग और भावनात्मक बोल इसे पीढ़ियों तक पसंद किए जाने वाले गीतों की सूची में शामिल करते हैं.

राजस्थान की मिट्टी से निकला अमर लोकगीत

बहुत कम लोग जानते हैं कि ‘मोरनी बागा मा बोले' की जड़ें राजस्थान की लोक संस्कृति में हैं. यह गीत राजस्थान के बंजारा समुदाय और वहां की लोक परंपराओं से प्रेरित माना जाता है. सदियों पहले जब पुरुष रोजगार और व्यापार के लिए दूर-दराज के इलाकों में चले जाते थे, तब पीछे रह गई महिलाएं अपने मन की भावनाएं लोकगीतों के जरिए व्यक्त करती थीं.

यह गीत भी विरह और इंतजार की उसी भावना को दर्शाता है. बाग में बोलती मोरनी यहां प्रेमिका के अकेलेपन और अपने प्रिय की याद का प्रतीक बन जाती है. यही भाव इस गीत को आज भी दिलों के करीब रखता है.

मांड गायकी ने बढ़ाई खूबसूरती

इस गीत की सबसे बड़ी ताकत इसकी मांड गायकी शैली है, जो राजस्थान की शान मानी जाती है. लोक और शास्त्रीय संगीत के अनूठे संगम से बनी यह शैली वर्षों से राजस्थानी संगीत की पहचान रही है. मांड गायकी में प्रेम, विरह और राजस्थानी जीवन की झलक देखने को मिलती है, और ‘मोरनी बागा मा बोले' इसका बेहतरीन उदाहरण है.

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श्रीदेवी की अदाओं ने बना दिया यादगार

फिल्म लम्हे के लिए गीतकार आनंद बख्शी ने इसके बोल लिखे थे, जबकि संगीतकार जोड़ी शिव-हरि ने इसे संगीत से सजाया. गाने को स्वर कोकिला लता मंगेशकर और इला अरुण ने अपनी आवाज दी. वहीं, रेगिस्तान में नीले ड्रेस में डांस करती श्रीदेवी की छवि इस गीत की सबसे बड़ी पहचान बन गई. यही वजह है कि 35 साल बाद भी यह गाना न सिर्फ राजस्थानी संस्कृति का गौरव माना जाता है, बल्कि हर पीढ़ी की पसंदीदा संगीत विरासत का हिस्सा बना हुआ है.

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