सनी देओल हिंदी सिनेमा में लंबे समय से बतौर एक्शन हीरो अपनी पारी खेल रहे हैं. ‘गदर' और ‘बॉर्डर' जैसी फिल्मों ने बड़े पर्दे पर उनकी एक बेहद शक्तिशाली छवि बनाई है. खासतौर पर ‘गदर' के तारा सिंह के बाद सनी देओल की पहचान ऐसे हीरो के तौर पर मजबूत हुई, जो अपने संवाद और एक्शन से दुश्मन को चुनौती देता है और दर्शकों को सीटियां और तालियां बजाने पर मजबूर कर देता है. पाकिस्तान के खिलाफ उनका गुस्सा और देशभक्ति पर्दे पर एक अलग ही असर पैदा करती है.
पिछले कुछ वक्त से सनी देओल का करियर उतार-चढ़ाव से गुजर रहा था, लेकिन ‘गदर 2' ने उन्हें एक बार फिर बॉक्स ऑफिस पर मजबूत स्थिति में ला खड़ा किया. फिल्म की जबरदस्त सफलता के बाद दर्शकों की उम्मीदें भी उनसे बढ़ गईं. लोगों को एक बार फिर वही सनी देओल नजर आने लगे, जो पाकिस्तान के खिलाफ अपने गुस्से और दमदार संवादों के जरिए सिनेमाघरों में माहौल बना देते हैं. शायद यही उम्मीद उनकी हालिया फिल्म ‘बंटवारा 1947' के लिए उलटी साबित हुई.
सनी देओल का पाकिस्तानी किरदार दर्शकों को नहीं आया रास?
‘बंटवारा 1947' में सनी देओल एक पाकिस्तानी व्यक्ति का किरदार निभा रहे हैं. उनका किरदार एक हिंदू महिला की मदद करता है, उसे बचाता है और इंसानियत को सबसे ऊपर रखता है. वह कहता है कि मजहब बुरा नहीं होता, लोग बुरे होते हैं और वे किसी भी मजहब के हो सकते हैं. फिल्म का संदेश अपनी जगह बेहद महत्वपूर्ण है. आमिर खान, सनी देओल और राजकुमार संतोषी ने इस कहानी के जरिए इंसानियत और सांप्रदायिक सौहार्द की बात कहने की कोशिश की है. लेकिन शायद सनी देओल की बनी-बनाई छवि के सामने यह संदेश कमजोर पड़ गया.
यहां सवाल संदेश के सही या गलत होने का नहीं, बल्कि कास्टिंग और दर्शकों की अपेक्षाओं का है. सनी देओल को लंबे समय से जिस तरह की देशभक्ति और पाकिस्तान विरोधी भूमिकाओं में दर्शकों ने पसंद किया है, उसके बिल्कुल विपरीत उन्हें पाकिस्तानी किरदार में देखना उनके एक बड़े वर्ग के लिए सहज नहीं रहा. यह प्रयोग गलत नहीं था, लेकिन शायद सनी देओल की लोकप्रिय छवि को ध्यान में रखते हुए इसे ज्यादा सावधानी से पेश करने की जरूरत थी.
बदले माहौल में पाकिस्तान को लेकर दर्शकों की सोच भी बदली
‘बंटवारा 1947' की मुश्किल सिर्फ फिल्म की कहानी या सनी देओल की कास्टिंग तक सीमित नहीं है. पिछले कुछ समय में भारत-पाकिस्तान के रिश्तों और पाकिस्तान की ओर से सामने आई घटनाओं को लेकर देश में माहौल भी बदला है. कश्मीर से लेकर देश के अलग-अलग हिस्सों में हुई घटनाओं ने लोगों के मन में पाकिस्तान को लेकर गुस्सा और नाराजगी पैदा की है.
ऐसे माहौल में जिस सनी देओल की छवि दर्शकों के मन में एक बेहद आक्रामक और देशभक्त नायक की है, उन्हें पाकिस्तानी किरदार में देखना और उस किरदार के प्रति भावनात्मक हमदर्दी महसूस करना दर्शकों के एक वर्ग के लिए मुश्किल रहा. शायद यही वजह है कि सनी देओल की वह छवि, जो ‘गदर' और ‘गदर 2' में फिल्म की सबसे बड़ी ताकत बनी थी, ‘बंटवारा 1947' में उसके कमजोर पक्षों में से एक बन गई.
‘जिस लाहौर नहीं वेख्या…' को पर्दे पर उतारने में चूका स्क्रीनप्ले
फिल्म के पक्ष में एक और बात नहीं गई. ‘बंटवारा 1947' जिस चर्चित नाटक ‘जिस लाहौर नहीं वेख्या ओ जम्या ही नहीं' से प्रेरित है, उसकी अपनी एक मजबूत भावनात्मक जमीन है. लेकिन नाटक को फिल्म में बदलते वक्त पटकथा और स्क्रीनप्ले पर उतनी गहराई से काम होता नजर नहीं आया, जितनी इस कहानी को जरूरत थी. खासकर फिल्म के पहले हाफ में वे भावनाएं दर्शकों तक उस मजबूती से नहीं पहुंच पातीं, जिनकी इस कहानी से उम्मीद की जाती है. नतीजा यह हुआ कि कहानी के साथ भावनात्मक जुड़ाव बनने में वक्त लगा और शुरुआती हिस्से में दर्शकों को निराशा महसूस हुई.
बॉक्स ऑफिस पर भी नहीं चला सनी देओल का जादू
‘बंटवारा 1947' पिछले शुक्रवार को सिनेमाघरों में रिलीज हुई. सोमवार तक फिल्म ने कुल 28.50 करोड़ रुपये नेट का कारोबार किया है. शुरुआती आंकड़ों को देखते हुए फिल्म के लिए अपनी लागत निकालना भी मुश्किल नजर आ रहा है. दरअसल, ‘बंटवारा 1947' से सनी देओल की पिछली फिल्मों की लोकप्रियता को देखते हुए बेहतर शुरुआत और मजबूत प्रदर्शन की उम्मीद थी. लेकिन फिल्म उस तरह का असर पैदा नहीं कर पाई, जिसकी उम्मीद ‘गदर' के हीरो से की जा रही थी.