राहुल गांधी कांग्रेस में बदलाव तो कर रहे हैं, लेकिन क्या इसकी कीमत पार्टी चुका रही है?
नए संगठन की तलाश में राहुल गांधी यह बड़ी भूल कर रहे हैं कि वे विरासत में मिली कांग्रेस को एक बोझ की तरह देख रहे हैं.
राहुल गांधी जिस तरह कांग्रेस को अपनी सोच के हिसाब से बदल रहे हैं, उसमें दशकों से पार्टी में मौजूद नेताओं, जिनके पास प्रभाव, मजबूत राजनीतिक समीकरण, प्रशासनिक अनुभव और बड़ा नेटवर्क है, उन्हें दूर रखना पार्टी के लिए नुकसानदायक हो सकता है. कांग्रेस के अंदर और बाहर यह धारणा बन रही है कि राहुल गांधी के कुछ बड़े नारों और अभियानों, जैसे हाल का ‘पितृसत्ता खत्म करो' अभियान, या Gen Z और जाति आधारित आरक्षण के समर्थन को पार्टी के कई पुराने नेताओं, खासकर पूर्व मुख्यमंत्रियों ने पूरी तरह पसंद नहीं किया है.
निजी बातचीत में कुछ पूर्व मुख्यमंत्रियों का मानना है कि Gen Z से जुड़े मुद्दों पर बहुत ज्यादा ध्यान देने से महंगाई, रोजगार और मध्यम वर्ग की आर्थिक परेशानियों जैसे बड़े मुद्दे पीछे छूट सकते हैं. कांग्रेस में एक पुरानी बात कही जाती है जिसे मौजूदा नेतृत्व को याद रखना चाहिए, कोई मुख्यमंत्री वास्तव में कभी ‘पूर्व मुख्यमंत्री' नहीं बनता. भले ही बंगला चला जाए, सुरक्षा कम हो जाए और अधिकारियों का व्यवहार बदल जाए. लेकिन सत्ता में रहते हुए जो राजनीतिक ताकत और संबंध बनते हैं, वे आसानी से खत्म नहीं होते.
कांग्रेस के कई नेताओं का पूरी क्षमता का उपयोग नहीं हो रहा है
एक पूर्व मुख्यमंत्री के पास विधायकों, पूर्व विधायकों, जिला नेताओं, कारोबारियों, पत्रकारों, अधिकारियों, सामाजिक नेताओं, धार्मिक व्यक्तियों और पार्टी कार्यकर्ताओं का बड़ा नेटवर्क होता है. यही उसकी असली राजनीतिक पूंजी होती है. कांग्रेस के पास आज ऐसे कई नेता हैं, लेकिन उनकी पूरी क्षमता का उपयोग नहीं हो रहा है. दिग्विजय सिंह, कमलनाथ, अशोक गहलोत, भूपिंदर सिंह हुड्डा, भूपेश बघेल, सिद्धारमैया, पृथ्वीराज चव्हाण, चरणजीत सिंह चन्नी, सुशील कुमार शिंदे और राजिंदर कौर भट्टल जैसे नेताओं ने बड़े राज्यों में सरकार चलाई है.
ए.के. एंटनी और सुशील कुमार शिंदे जैसे नेता अब सक्रिय राजनीति से दूर हैं. लेकिन वे उस दौर के नेता हैं जिन्हें संकट के समय उनकी विश्वसनीयता और अनुभव के कारण याद किया जाता था. हालांकि, सभी नेताओं की स्थिति एक जैसी नहीं है और यह कहना सही नहीं होगा कि सभी को किनारे कर दिया गया है. उदाहरण के लिए भूपेश बघेल पंजाब के प्रभारी महासचिव हैं, चन्नी को पंजाब चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बनाया गया है और हुड्डा हरियाणा में विपक्ष के नेता हैं.
फिर भी कुल मिलाकर ऐसा लगता है कि ये पूर्व मुख्यमंत्री राहुल गांधी के आसपास बन रही नई राजनीतिक धारा से धीरे-धीरे दूर हो रहे हैं. यह पीढ़ीगत बदलाव का हिस्सा हो सकता है, लेकिन अगर इसे सावधानी से नहीं संभाला गया तो यह पार्टी की संस्थागत याददाश्त के कमजोर होने का कारण बन सकता है.
कांग्रेस पहले अपने पूर्व मुख्यमंत्रियों की अहमियत समझती थी. ए.के. एंटनी मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद रक्षा मंत्री बने और सोनिया गांधी के सबसे भरोसेमंद सलाहकारों में रहे. दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री रहने के बाद संगठन में बड़ी जिम्मेदारियां संभालते रहे. अशोक गहलोत भी मुख्यमंत्री पद के अलावा संगठन में कई अहम भूमिकाएं निभाते रहे. शिंदे मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद राज्यपाल, केंद्रीय मंत्री और गृह मंत्री तक बने. पूर्व मुख्यमंत्रियों को अक्सर राज्यों में पर्यवेक्षक बनाकर भेजा जाता था, क्योंकि वे सत्ता और संगठन की राजनीति को अच्छी तरह समझते थे. वे महत्वाकांक्षा, असंतोष और संभावित बगावत को जल्दी पहचान लेते थे.
इसके विपरीत आज की कांग्रेस कई बार यह दिखाने की कोशिश करती नजर आती है कि कोई भी नेता अपरिहार्य नहीं है. यह सोच कुछ हद तक सही भी है क्योंकि कुछ क्षेत्रीय नेता संगठन पर बहुत ज्यादा नियंत्रण जमा लेते हैं राहुल गांधी एक ऐसी पार्टी बनाना चाहते हैं जो युवा हो, विचारधारा पर आधारित हो और कम समझौतावादी राजनीति करें, लेकिन समस्या यह है कि चुनाव आज भी बड़े पैमाने पर राजनीतिक समीकरणों, नेटवर्क और प्रबंधन पर निर्भर करते हैं.
दिग्विजय सिंह पार्टी के लिए क्यों अहम हैं?
BJP इस बात को बेहतर तरीके से समझती है. वह कई वरिष्ठ नेताओं को सक्रिय राजनीति से दूर करती है, लेकिन उससे पहले उनके नेटवर्क और अनुभव का पूरा इस्तेमाल कर लेती है. कांग्रेस कई बार नेता के साथ-साथ उसका पूरा नेटवर्क भी अलग कर देती है. दिग्विजय सिंह इसका उदाहरण हैं. वे कई बार ऐसे बयान देते हैं जिनसे पार्टी को मुश्किल होती है. लेकिन मध्य प्रदेश की राजनीति की उनकी समझ बहुत गहरी है. वर्षों में बने उनके संबंध कांग्रेस के लिए आज भी महत्वपूर्ण हैं.
कमलनाथ भी कांग्रेस की ताकत का अलग रूप हैं. 9 बार सांसद रहना, लंबे समय तक केंद्रीय मंत्री रहना और दिल्ली व कारोबार जगत में मजबूत संपर्क उन्हें संसाधन जुटाने और बातचीत करने में सक्षम बनाते हैं. भले ही उनका राजनीतिक प्रभाव पहले जैसा न रहा हो, लेकिन उनके संबंध अभी भी मूल्यवान हैं.
अशोक गहलोत के पास संगठन का व्यापक अनुभव है. भले ही राजस्थान में उनके और नए नेताओं के बीच टकराव रहा हो, लेकिन वे संगठन, सहयोगी दलों और राजनीतिक संतुलन को अच्छी तरह समझते हैं. भूपिंदर सिंह हुड्डा हरियाणा में अब भी सबसे प्रभावशाली कांग्रेस नेताओं में गिने जाते हैं. 2024 की हार के बाद कांग्रेस को अपना आधार बढ़ाने की जरूरत जरूर है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हुड्डा को किनारे कर दिया जाए.
भूपेश बघेल के पास कांग्रेस की पसंदीदा कई खूबियां हैं, जैसे ओबीसी पहचान, प्रशासनिक अनुभव और जनता से जुड़ने की क्षमता. वे पार्टी को सामाजिक न्याय और कल्याणकारी राजनीति को राष्ट्रीय स्तर पर समझाने में मदद कर सकते हैं.
सिद्धारमैया भी महत्वपूर्ण नेता हैं. उन्होंने कर्नाटक में AHINDA सामाजिक गठबंधन बनाया और पिछड़े वर्गों की राजनीति को मजबूती दी. भले ही वे आगे चुनाव न लड़ें, लेकिन उनकी राजनीतिक समझ कांग्रेस के लिए उपयोगी बनी रहेगी.
पृथ्वीराज चव्हाण प्रशासन और नीतियों की गहरी समझ रखने वाले नेता हैं. सरकार कैसे काम करती है, इसकी उनकी जानकारी कांग्रेस को भाजपा के खिलाफ संस्थागत और प्रशासनिक बहस में मदद कर सकती है.
चरणजीत सिंह चन्नी पंजाब में अब भी महत्वपूर्ण राजनीतिक ताकत बने हुए हैं. वहीं राजिंदर कौर भट्टल जैसे वरिष्ठ नेता सलाहकार, मार्गदर्शक और सुलह कराने वाले की भूमिका निभा सकते हैं.
सुशील कुमार शिंदे और ए.के. एंटनी जैसे नेताओं की सबसे बड़ी ताकत उनका अनुभव और विश्वसनीयता है, जिसे किसी नए नेता में तुरंत नहीं बनाया जा सकता. यह सब इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि 2029 की लड़ाई 2029 में शुरू नहीं होगी. उससे पहले कई राज्यों के चुनाव कांग्रेस की ताकत और कमजोरियों की परीक्षा लेंगे.
मजबूत राजनीतिक ढांचे और अनुभवी लोगों की जरूरत
राहुल गांधी ने कांग्रेस को संविधान, जाति जनगणना, असमानता और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों पर एक स्पष्ट वैचारिक भाषा दी है. लेकिन विचारधारा को जमीन पर उतारने के लिए मजबूत राजनीतिक ढांचे और अनुभवी लोगों की जरूरत होती है. समाधान यह नहीं है कि पार्टी फिर से पूरी तरह पुराने नेताओं के हाथ में दे दी जाए, न ही राहुल गांधी को क्षेत्रीय नेताओं का बंधक बनना चाहिए. बेहतर तरीका यह होगा कि पूर्व मुख्यमंत्रियों की एक सलाहकार परिषद बनाई जाए, उन्हें राज्य इकाइयों के मेंटर बनाया जाए, उम्मीदवारों के चयन में शामिल किया जाए, संगठनात्मक विवाद सुलझाने में उनकी मदद ली जाए और उनके सामाजिक, राजनीतिक व प्रशासनिक नेटवर्क का उपयोग किया जाए.
राहुल गांधी की सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ भाजपा को हराना नहीं है. उनकी असली चुनौती कांग्रेस को फिर से एक मजबूत राष्ट्रीय संगठन बनाना है. इसके लिए उन्हें युवा नेताओं की जरूरत है, लेकिन साथ ही ऐसे अनुभवी पूर्व मुख्यमंत्रियों की भी, जिन्हें पता है कि राजनीति का रास्ता किस दिशा में जाता है.
(रशीद किदवई पत्रकार, लेखक और राजनीतिक विश्लेषक हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)
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