AI का सटीक लेखन क्यों उतना सटीक नहीं? सबमें एक जैसा असर, सब एक से आते नजर
दरअसल AI लेखन खराब नहीं है, बल्कि यह जरूरत से ज्यादा परफेक्ट है. AI लेखन सपाट है, कोई फंबल नहीं, इसमें कोई अहसास नहीं. जब कोई शख्स खुद से सोच विचार कर लिखता है तो अपनी तमाम कमियों खूबियों के साथ ये मानवीय बन जाता है.
बात कुछ दिनों पहले की है. मैं एक बिजनेस कॉन्फ्रेंस में था, जहां भारत के कुछ प्रतिभाशाली लोग बोल रहे थे. आमतौर पर ऐसी जगहों पर स्पीच सुनकर या तो आपको उबासी आने लगती है या मुंह से निकलता है 'वाह'. तो जहां मैं गया था वहां स्पीकर आते रहे और बोलते रहे. सबकी बातों में वही कॉरपोरेट वाले भारी-भरकम शब्द थे. मैं उस लम्हे का इंतजार करता रह गया कि कोई ऐसी बात कही जाए, जो याद रखने लायक हो.
लेकिन इस बार मैं काफी जल्दी बोर हो गया. ऐसा इसलिए नहीं था कि स्पीकर अच्छे नहीं थे, बल्कि इसलिए कि मुझे अहसास हुआ कि हर भाषण का पैटर्न लगभग एक ही था. हर स्पीकर पहले की तुलना में एक-दूसरे से कहीं ज्यादा मिलते-जुलते लगे.
मैंने पैटर्न पर ध्यान देना शुरू किया. भाषण, लेख, सोशल मीडिया पोस्ट यहां तक कि दशकों के अनुभव वाले और वेरिफाइड अकाउंट रखने वाले लोगों की बातें भी एक जैसी थीं. सबमें एक जैसी लय थी, मानो कोई टेम्पलेट हो.
बात की गंभीरता को समझाने का एक ही तरीका. एक ही तरह के निष्कर्ष. तब मैंने वही किया जो आजकल हम सब किसी विचार के मन में आते ही करते हैं. मैंने ChatGPT से पूछा कि ऐसा क्यों हो रहा है?
ChatGPT का जवाब मेरी उम्मीद से ज्यादा ईमानदार था. इसने माना कि वाक्यों में विरोधाभास पैदा करने की जिद है. कुछ शब्दों का दोहराव है ताकि सुनने वाले पर वजन पड़े.
AI अब लेखन का एक उपयोगी साधन बन चुका है. यह व्याकरण की गलतियों को सुधारता है, तर्कों को मजबूत बनाता है और विचारों को व्यवस्थित करने में मदद करता है. जो लोग दूसरी या तीसरी भाषा में लिखते हैं, उनके लिए यह और भी उपयोगी है, क्योंकि यह उस दूरी को पाट देता है जिसे पहले वर्षों की मेहनत या किसी धैर्यवान संपादक की मदद से ही पाटा जा सकता था. यह वास्तव में एक बड़ा लाभ है, लेकिन इसके साथ एक ऐसी समस्या भी है, जो लिखते समय मुश्किल से दिखाई पड़ती है लेकिन पढ़ते या सुनते समय आसानी से पकड़ में आ जाती है- ये बुद्धिमान लोगों को भी एक जैसा बना रही है.

इसके सबूत उन वाक्यों में हैं जिन्हें अब हम सभी पहचानने लगे हैं. जैसे- 'यह कोई चुनौती नहीं है, बल्कि अवसर है.'
'भारत कोई बाजार नहीं है, एक मिशन है.'
'इमिग्रेशन का वास्ता बॉर्डर से नहीं, पहचान से है.'
'AI तकनीक नहीं, ताकत है.'
'निर्माण कारखानों के बारे में नहीं है, यह संप्रभुता के बारे में है.'
'सवाल क्या नहीं, बल्कि कैसे है.
एक बार आप पैटर्न पकड़ने लेते हैं, तो फिर इन्हें हर जगह देखने लगते हैं. भाषण, लेख, सालाना रिपोर्ट, सोशल मीडिया थ्रेड्स और टीवी डिबेट, हर जगह इसे पहचानने लगते हैं. शुरुआत में यह असरदार लगता है, लेकिन लगातार सुनने पर ये सिर्फ सजावटी फर्नीचर जैसे लगने लगते हैं.
और अब तो स्थिति इससे भी आगे बढ़ गई है. AI से लिखी गई सामग्री अब केवल पहचानी ही नहीं जा रही, बल्कि उसका मजाक भी उड़ाया जाने लगा है. और अक्सर उसे लिखने वाले लोगों को इसका पता सबसे आखिर में लगता है.
दरअसल AI लेखन खराब नहीं है, बल्कि यह जरूरत से ज्यादा परफेक्ट है. AI लेखन सपाट है, कोई फंबल नहीं, इसमें कोई अहसास नहीं. जब कोई शख्स खुद से सोच विचार कर लिखता है तो अपनी तमाम कमियों-खूबियों के साथ ये मानवीय बन जाता है. मानवीय चिंतन और लेखन दोनों ही संघर्षों का परिणाम हैं. कभी-कभार कोई गलती हो जाना, कोई वाक्य गलत दिशा में चला जाना, कोई तर्क जो अपनी अनिश्चितता को स्वीकार कर लेता है, AI लेखन में ये सब नहीं होता.
AI लेखन में हर वाक्य पूरी तरह से तैयार होकर आता है. हर समस्या एक स्पष्ट विरोधाभास बन जाती है. हर पैराग्राफ में उतनी ही गहराई, चाहे जरूरत हो या ना हो. पाठकों ने इस सहजता को एक संकेत के रूप में महसूस करना शुरू कर दिया है, और एक बार जब वे इसे महसूस कर लेते हैं, तो उसका मजाक बनना स्वाभाविक रूप से शुरू हो जाता है. इस समस्या के पीछे सोच भी एक बड़ी समस्या है.

AI लेखन सिर्फ लेखन की आदतें नहीं दिखाता, बल्कि बौद्धिक आदतें भी उजागर करता है. जिसके पास मजबूत विचार हैं, वह AI का उपयोग उन्हें और अधिक व्यवस्थित और प्रभावी बनाने के लिए करेगा, इससे परिणाम बेहतर होगा. लेकिन जिसके विचार कमजोर हैं, वह AI से उन्हें आकर्षक बनाने की कोशिश करेगा. लेकिन यह दिखावटी चमक ज्यादा देर तक टिक नहीं पाएगी.
मशीन केवल वही बढ़ाती है जो पहले से मौजूद होता है. यदि मूल विचार कमजोर हैं, तो रोबोट द्वारा चढ़ाई गई भाषाई चमक उन्हें लंबे समय तक नहीं संभाल सकती.
ChatGPT ने बहुत ईमानदारी से मुझे बताया कि भाषणों की यह पूर्णता AI के काम करने के तरीके का हिस्सा है और इसे केवल प्रॉम्प्ट्स के माध्यम से पूरी तरह बदला नहीं जा सकता, भले ही कुछ लिंक्डइन इन्फ्लुएंसर ऐसा दावा करते हों.
इसका कारण गणित है. बड़े भाषा मॉडल मूलतः भविष्यवाणी करने वाली मशीन हैं. हर चरण पर वे अरबों उदाहरणों के आधार पर यह अनुमान लगाते हैं कि अगला सबसे संभावित शब्द कौन-सा होगा. यदि लाखों भाषणों में “सिर्फ X नहीं, बल्कि Y भी” जैसे वाक्य इस्तेमाल हुए हैं, तो मॉडल सीख लेता है कि प्रभावशाली दिखने का यह एक भरोसेमंद तरीका है.
यदि हजारों लेख 'असली सवाल यह है कि...' जैसी पंक्ति पर समाप्त होते हैं, तो मॉडल इसे लेखों का स्वाभाविक अंत मान लेता है. 'ट्रांसफॉर्मेशन', 'उद्देश्य' और 'फ्यूचर-रेडी' जैसे शब्द लगातार अधिक संभावित विकल्प बन जाते हैं, क्योंकि प्रभावशाली लोग उनका इस्तेमाल करते रहते हैं और मॉडल उन्हें बार-बार दोहराता रहता है.
वह मौलिक बनने की कोशिश नहीं कर रहा होता. वह सिर्फ गणित लगाता है कि 'सही' क्या है?
आप किसी सम्मेलन में इस उम्मीद से जाते हैं वहां किसी व्यक्ति से उसके मौलिक विचार, अनुभव सुनेंगे, लेकिन यहीं AI फेल हो जाता है.
बड़े विचारक और लेखक हमेशा गणित के मुताबिक जो सही है, उसके उलट काम करते रहे हैं.
वे चौंकाने वाले विवरण चुनते हैं, सच्ची भावनाओं को व्यक्त करते हैं. जो सच उन्होंने देखा है उसे सुनाते हैं ना कि किसी मशीन की भविष्यवाणी बताते हैं. ये AI नहीं कर सकता. वह केवल पहले से कही गई बातों को पहले से अधिक सुगमता से दोहरा सकता है.
इसीलिए जो लोग AI का समझदारी से उपयोग करते हैं, वे उसे अपने लिए बोलने नहीं देते; वे उसे केवल सहायक बनाते हैं, चालक नहीं. AI एक संपादक, शोधकर्ता, विचारों को व्यवस्थित करने वाला उपकरण और सही शब्द खोजने में मददगार साथी हो सकता है. लेकिन जो लोग उसे सोचने का काम भी सौंप देंगे, वे जल्द ही उसकी सीमाओं से टकराएंगे. उन्हें पता भी नहीं चलेगा और उनके श्रोता या पाठक उनपर भरोसा करना बंद कर देंगे.
“Generate” बटन दबाने से पहले एक सवाल पूछना चाहिए— मैं ऐसा क्या जानता हूं, देखता हूं या समझता हूं, जिसे मशीन कभी नहीं जान सकती? बस यही मौलिक है. बाकी सब पुराना है, बासी है. AI के घिसे-पिटे वाक्य.
लेखक परिचयः संजय पुगलिया AMG मीडिया नेटवर्क के CEO हैं.
डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं.
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