माई, हम मुख्यमंत्री बन गईनी..जब लालू ने मां को सुनाई थी खुशखबरी, जवाब मिला- सरकारी नौकरी ना नु मिलल...
बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर NDTV के सियासी किस्सों की फेहरिस्त में आज चर्चा उस कहानी की जब 46 साल की उम्र में मुख्यमंत्री बनने के बाद लालू पहली बार अपने गांव पहुंचे थे.
माई, हम मुख्यमंत्री बन गयीनी..
इ का होला..
इ जे हथुआ महाराज बाड़न, उनको से बड़.
अच्छा ठीक बा जाय दे, लेकिन तहरा सरकारी नौकरी ना नु मिलल...
(मुख्यमंत्री बनने के बाद लालू यादव की अपनी मां मरछिया देवी से ये पहली बातचीत थी)
बात आज से 25 साल पहले की है. साल था 1990. बिहार की राजनीति में बदलाव की बयार बह रही थी. कांग्रेस पतन की ओर थी. भागलपुर दंगे ने उसकी ताबूत पर आखिरी कील ढोकने का काम किया था. जेपी आंदोलन से उभरे नेताओं का कद बढ़ रहा था.
बिहार विधानसभा चुनाव 1990: कांग्रेस का पतन, जनता दल का उभार
तब बिहार-झारखंड एक राज्य था. प्रदेश में कुल 324 विधानसभा सीटें थी. 1990 के विधानसभा चुनाव में जनता दल 122 सीटों पर जीत कर सबसे बड़ी पार्टी बनी. 323 सीटों पर लड़ने वाली कांग्रेस को मात्र 71 सीटों पर जीत मिली. भाजपा ने 237 सीटों पर लड़कर 39 पर जीत हासिल की. नतीजे बता रहे थे कि बिहार अब बदलाव की ओर है.

बिहार विधानसभा चुनाव 1990 का रिजल्ट.
1990 में सीएम के 3 दावेदार थे- लालू, राम सुदंर दास और रघुनाथ झा
1990 के चुनावी नतीजों को बाद बिहार में मुख्यमंत्री के तीन बड़े दावेदार थे- लालू यादव, राम सुंदर दास और रघुनाथ झा. तब के प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह राम सुंदर दास को सीएम बनाना चाहते थे. उप-प्रधानमंत्री देवीलाल लालू यादव के पक्ष में थे. नीतीश भी लालू यादव के पक्ष में ही थे.उस समय केंद्र की राजनीति में चंद्रशेखर और विश्वनाथ प्रताप सिंह दो प्रमुख केंद्र थे. लेकिन दोनों में बनती नहीं थी. बिहार के चुनावी नतीजों के बाद चंद्रशेखर ने अपना दबदबा दिखाने के लिए रघुनाथ झा का नाम आगे कर दिया.
राम सुंदर दास और रघुनाथ झा को पीछे छोड़ कैसे सीएम बने लालू
पद एक, दावेदार तीन... फिर तय हुआ कि वोटिंग के जरिए नेता का चुना जाए... जैसी ही बात वोटिंग की हुई, विधायकों की लाइजनिंग शुरू हो चुकी थी. तय समय पर विधायकों एकजुट कर वोटिंग कराया गया. यूं तो सीएम रेस की सीधी फाइट लालू और राम सुंदर दास में थी. लेकिन रघुनाथ झा की एंट्री ने लालू को मामूली वोटों के अंतर से जीत दिला दी. रघुनाथ झा को तब राजपूत विधायकों के कुछ मिले, जिससे लालू मात्र 3 वोट के अंतर से मुख्यमंत्री पद के लिए चुने गए.

1990 में लालू की सभा की एक तस्वीर, भैंस पर बैठकर भाषण सुनते लोग.
10 मार्च 1990 को 46 साल की उम्र में सीएम बने लालू यादव
10 मार्च को 1990 को मात्र 46 साल की उम्र में लालू प्रसाद ने बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. शपथ ग्रहण समारोह पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में आयोजित हुआ. जहां लोगों की भारी भीड़ लालू में बिहार के नए नायक का अक्श देखने के लिए उमड़ी थी. इस रोज बिहार को एक ऐसा मुख्यमंत्री मिला, जो पटना के पशु चिकित्सालय महाविद्यालय में अपने चपरासी भाई के क्वार्टर में रहता था.
सीएम बनने के बाद जब पहली बार अपने गांव पहुंचे लालू
अब आते है, उस किस्से पर जिसका जिक्र हमने इस कहानी की शुरुआत में किया है. मतबल सीएम बनने के बाद लालू और मां से हुई पहली बातचीत. ये कहानी 1990 की है. गोपालगंज के फुलवरिया गांव में सामान्य परिवार में जन्मे लालू राज्य के मुख्यमंत्री बनकर पहली बार अपने गांव आ रहे थे.
गांव की सड़कें कच्ची थीं, सड़क किनारे गाय-भैंस बंधे थे, सामने खप्परपोस कच्चे मकानों की कतार. चौर-चाचड़ में हाफ पैंट-गंजी पहने हाथों में लाठी लिए भैंस चराते लोग नजर आ रहे थे. दिन का खाना बनाने के बाद महिलाएं गोईठा (उपले) बनाने में मशगूल थी. बच्चे टायर गाड़ी और गुल्ली-डंडा खेलते में व्यस्त थे.

सीएम बनने के बाद पहली बार अपने गांव पहुंचे लालू यादव.
माई हम मुख्यमंत्री बन गयीनी...
लालू का काफिला गांव में आते ही गांव के कुछ बड़े-बुजुर्ग यह जान गए कि हमारे गांव का बेटा राज्य का सीएम बनकर आया है. लेकिन लालू की मां मरछिया देवी बेटे की कामयाबी से अंजान अपने घर के काम में व्यस्त थी. अपने घर पहुंचने पर लालू ने अपनी मां को प्रणाम किया. फिर कहा- माई, हम मुख्यमंत्री बन गयीनी.. लालू की मां ने पूछा- इ का होला..
फिर लालू की मां ने जो कहा वो बिहार के गार्जियन को सोच को स्पष्ट करता है. लालू की मां ने कहा- अच्छा ठीक बा जाय दे, लेकिन तहरा सरकारी नौकरी ना नु मिलल...
मतलब तु मुख्यमंत्री तो बन गईल लेकिन तोहरा के सरकारी नौकरी नहीं मिला. मां की इस बात को सुनते ही लालू जोर-जोर से हंसने लगे. फिर उन्हें अपने स्तर से समझाया कि उनके बेटे ने बिहार में क्या ओहदा हासिल कर लिया है?

अपनी मां मरछिया देवी के साथ लालू यादव.
2015 में लालू ने खुद बताया मां से मुलाकात का यह रोचक किस्सा
लालू और उनकी मां से बातचीत का यह किस्सा खुद लालू प्रसाद यादव ने साल 2015 में फेसबुक पर लिखा था. 10 मार्च को हर साल मदर्स डे मनाया जाता है. उसी दिन 2015 में लालू ने सीएम बनने के बाद मां के साथ हुई पहली बातचीत का ये रोचक किस्सा फेसबुक पर साझा किया था. लालू ने लिखा था, "माँ को महज प्रतीकात्मकता के तौर पर एक दिन के लिए मैं याद नहीं करता. वो हर क्षण हर पल मेरे अंग-संग रहती है. जो कुछ आज हूँ वो सब माँ के प्यार एवं दुआओं का असर है."
लालू ने आगे लिखा, "हाँ, आज एक वाक्या याद आ गया. 10,मार्च,1990 को बिहार का मुख्यमंत्री बनने के बाद माँ से आर्शीवाद लेते हुए मैंने कहा कि "माँ आपका बेटा मुख्यमंत्री बन गया है तो माँ ने कहा ये बता तुझे सरकारी नौकरी मिली की नहीं". जिन विषम परिस्थितियों में उन्होंने मेरा पालन पोषण किया,वो सोचकर रूह काँप जाती है. एक अनपढ़ एवं बेहद गरीब परिवार में जन्में होने के कारण मैंने गरीबी को बेहद नजदीक से देखा है.

CM बनने के बाद अपने जन्मदिन पर केक काटते लालू यादव. तस्वीर में उनके दोनों बेटे तेज प्रताप और तेजस्वी भी नजर आ रहे हैं.
बिहार की राजनीति पर लिखी किताब में भी इस किस्से का जिक्र
लालू और मां के बीच हुई इस बातचीत का किस्सा बिहार के वरिष्ठ पत्रकार संतोष सिंह ने अपनी किताब "लालू-नीतीश का बिहार कितना राज कितना काज" में भी जिक्र किया है.
आज कितना बदला है लालू का पैतृक गांव
आज भी लालू प्रसाद यादव के पैतृक गांव फुलवरिया में उनकी मां स्व. मरछिया देवी की आदमकद प्रतिमा है. वहीं मीरगंज में मरछिया देवी के नाम से चौक है और लालू प्रसाद यादव के गांव में उनकी मां के नाम से मरछिया देवी हॉस्पिटल भी है. आज फुलवरिया एक विकसित गांव बन चुका है. क्योंकि उसी गांव से निकले एक करिश्माई नेता ने बिहार की राजनीति में वो मुकाम पाया, जो किसी ने कभी सोचा भी नहीं होगा.
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